अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्तजीविता: | नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदा: || 9 ||
अर्थात दुर्योधन अपनी सेना के महायोद्धा के नाम लेने के बाद द्रोणाचार्य को ऐसा कहता है, उन सब के बावजूद भी दूसरे कितने ही शूरवीर हैं। जिन्होंने मेरे लिए अपनी जीने की इच्छा का भी त्याग कर दिया है। और जो अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र को चलाने वाले हैं। तथा जो सब की सब युद्ध कला में अत्यंत चतुर है।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् | पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् || 10 ||
अर्थात दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहता है यह हमारी सेना पांडवों के ऊपर विजय प्राप्त करने के लिए अपूर्ण है। असमर्थ हैं क्योंकि उनके सरंक्षक (दोनों पक्ष का अच्छा चाहनारे) पितामह भीष्म है। परंतु यह पांडवों की सेना हमारे ऊपर विजय प्राप्त करने में पूर्ण है समर्थ है। क्योंकि उनके सरंक्षक (अपनी ही सेना के पक्ष को खींचने वाले) भीमसेन हैं।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिता: | भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्त: सर्व एव हि || 11||
अर्थात दुर्योधन अपनी सेना को कहता है, आप सब के सब लोग मोर्चे पर अपने अपने स्थान पर दृढ़ता से खड़े रहकर ही पितामह भीष्म का चारों ओर से रक्षण करो।
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्ध: पितामह: | सिंहनादं विनद्योच्चै: शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् || 12 ||
अर्थात संजय कहते हैं दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए कुरुवृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के जैसे गर्जना करके जोर से शंख बजाया।
तत: शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा: | सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् || 13 ||
अर्थात भीष्म जी के शंखनाद के बाद शंख भैरी अर्थात नगाड़े, ढोल, मृदंग और रणसिंगे विगेरे वाजिंत्र एक साथ बजने लगे, और इसका शब्द बड़ा ही भयंकर था।
तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ | माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतु: || 14 ||
अर्थात भीष्म जी के शंखनाद के बाद सफेद अश्व से जुड़ा हुआ महान रथ ऊपर, बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान श्री कृष्ण और पांडु पुत्र अर्जुन ने दिव्य शंखो बहुत ही जोर से बजाएं।
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