दत्तात्रेय जयंती भगवान दत्तात्रेय के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है। यह दिन मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को आता है और इसे अत्यंत शुभ व सिद्धिदायक माना गया है।
भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु और महेश—तीनों देवों के संयुक्त अवतार माने जाते हैं। इन्हें ‘त्रिदेव स्वरूप’ भी कहा जाता है। वे ज्ञान, योग, वैराग्य और गुरु-तत्व के प्रतीक हैं।
माता अनसूया तपस्विनी और अत्यंत पवित्रता से युक्त थीं। पिता अत्रि ऋषि महान ऋषि और तपस्वी थे। इनके तप और सतीत्व से प्रसन्न होकर त्रिदेव स्वयं पुत्र रूप में अवतरित हुए और दत्तात्रेय का जन्म हुआ।
देवताओं की पत्नियों ने अनसूया के सतीत्व से ईर्ष्या की। उन्होंने त्रिदेवों से कहा कि वे अनसूया की परीक्षा लें। त्रिदेव भिक्षुक बनकर आए और अनसूया से कहा— “भोजन दो, लेकिन नग्न अवस्था में।” अनसूया ने अपनी तपस्या और सतीत्व से उन्हें बालक बना दिया और फिर उन्हें भोजन कराया। यही तप उन्हें दत्तात्रेय पुत्र के रूप में प्राप्त हुआ।
त्रिदेवों ने अनसूया की भक्ति से प्रसन्न होकर एक ही दिव्य रूप में पुत्र स्वरूप धारण किया— भगवान दत्तात्रेय। इनका जन्म आध्यात्मिक ज्योति, ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरुओं से सीख लेकर संसार को सिखाया कि— “प्रकृति का हर तत्व गुरु है। जो सीखना चाहे, उसके लिए हर अनुभव ज्ञान बन जाता है।” उनकी शिक्षा योग, आंतरिक शांति और वैराग्य पर आधारित है।
– पाप नाश होता है – मन को शांति मिलती है – योग और ध्यान में प्रगति होती है – गुरु शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है – जीवन में ज्ञान और वैराग्य बढ़ता है
– ब्रह्म मुहूर्त में स्नान – दत्तात्रेय मंत्र जप – दत्तात्रेय चालीसा का पाठ – गाय को भोजन – जरूरतमंदों को दान – ध्यान और मौन साधना
“ॐ द्रम् दत्तात्रेयाय नमः” इस मंत्र का जप मन को अत्यंत शांत करता है और दैवी शक्ति प्रदान करता है।
दत्तात्रेय जयंती पर भगवान दत्तात्रेय आप पर ज्ञान, वैराग्य, शांति और शक्ति की कृपा बरसाएँ।