काम्पिल्य नगर में सुमेधा नामक ब्राह्मण और उनकी पत्नी पवित्रा रहते थे। गरीबी इतनी थी कि भोजन भी मुश्किल से मिलता था।
दोनों स्वयं भूखे रह जाते थे, लेकिन अतिथि को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे। उनका जीवन संतोष, सेवा और भक्ति से भरा था।
लगातार बढ़ती गरीबी से परेशान होकर सुमेधा ने कहा, "मैं धन कमाने के लिए परदेस जाऊँगा।"
पवित्रा बोलीं, "भाग्य कर्मों से बदलता है, केवल स्थान बदलने से नहीं। धैर्य रखिए और भगवान पर विश्वास बनाए रखिए।"
एक दिन उनकी झोपड़ी में महर्षि कौडिन्य पधारे। दंपत्ति ने अपनी क्षमता से बढ़कर उनकी सेवा की।
उन्होंने कहा, "अधिक मास की परमा एकादशी का व्रत करो और रात्रि में जागरण कर भगवान विष्णु का स्मरण करो।"
महर्षि ने बताया कि इसी व्रत के पुण्य से राजा हरिश्चंद्र को राज्य और कुबेर को धनाध्यक्ष पद प्राप्त हुआ था।
सुमेधा और पवित्रा ने पूर्ण नियम और विश्वास के साथ व्रत रखा। रातभर भजन, कीर्तन और भगवान का स्मरण करते रहे।
सुबह उनकी कुटिया के बाहर एक राजकुमार आया। वह उनके धर्म, त्याग और भक्ति से अत्यंत प्रभावित था।
राजकुमार ने उन्हें सुंदर घर, भूमि और अपार धन-संपत्ति भेंट की। वर्षों की गरीबी समाप्त हो गई।
जब सब रास्ते बंद दिखाई दें, तब भी धैर्य, धर्म और भगवान पर विश्वास मत छोड़िए। सच्ची श्रद्धा कभी खाली हाथ नहीं लौटती।
भक्ति + धैर्य + विश्वास = बदला हुआ भाग्य