विवाह पंचमी वह दिव्य तिथि है जिस दिन भगवान श्रीराम और माता सीता का पावन विवाह हुआ था। यह दिन शुभ, मांगलिक और मनोकामना पूर्ण करने वाला माना जाता है।
इस दिन जो भी भक्त भक्ति, श्रद्धा और सात्विक भाव से व्रत करते हैं, उनके जीवन में सौभाग्य, समृद्धि और वैवाहिक सुख का आगमन होता है।
मिथिला के राजा जनक एक दिन खेतों की जुताई देख रहे थे, तभी उन्हें हल की नोक से एक दिव्य कन्या मिली — वही थीं माता सीता।
राजा जनक ने घोषणा की कि “जो भी भगवान शिव के धनुष को उठा कर चढ़ाएगा, वही सीता का वरण करेगा।” सभी राजा आए, पर कोई धनुष हिला भी न सका।
विश्वामित्र के साथ युवा श्रीराम स्वयंवर में पहुंचे। उन्होंने विनम्रता से धनुष उठाया और सहजता से उसे चढ़ाने लगे।
जैसे ही श्रीराम ने धनुष चढ़ाया, वह दिव्य धनुष टूट गया। पूरा दरबार जय-जयकार से गूंज उठा - “जय श्रीराम!”
फिर माता सीता ने श्रीराम को वरमाला पहनाई। मिथिला नगरी में उत्सव मनाया गया और ब्रह्माण्ड में दिव्यता फैल गई।
इस दिन व्रत रखने से - मनचाहा जीवनसाथी मिलता है दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ता है घर-परिवार में शुभता आती है सभी बाधाएँ दूर होती हैं
• सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लें • प्रभु श्रीराम-सीता का पूजन करें • विवाह प्रसंग का पाठ करें • शाम को दीपदान और भजन-कीर्तन करें
“सीताराम चरित अति पावन, सीताराम बिनु जग न सुखावन।” इस मंत्र का जप करने से व्रत पूर्ण फल देता है।
विवाह पंचमी का व्रत जीवन में प्रेम, सौभाग्य और शांति लाने वाला है। सीता-राम की कृपा सदैव बनी रहे।