1 नवंबर 2025 से पंचक शुरू हो रहा है, जिसका समापन 5 नवंबर को होगा।यह पांच दिवसीय व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक चलता है।
यह व्रत भीष्म पितामह द्वारा बताए गए व्रतों में से एक है। इसे करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी इस व्रत की महिमा का वर्णन किया है।
महाभारत युद्ध के बाद भीष्म पितामह ने शरशय्या पर लेटे हुए भगवान श्रीकृष्ण से मोक्ष प्राप्ति का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिवसीय उपवास और पूजन का उपदेश दिया। इस व्रत को करने से आत्मा शुद्ध होती है और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है।
प्रत्येक दिन का संबंध एक देवता से होता है — 1️⃣ एकादशी: विष्णु पूजा 2️⃣ द्वादशी: लक्ष्मी पूजन 3️⃣ त्रयोदशी: कार्तिकेय पूजा 4️⃣ चतुर्दशी: गणेश पूजा 5️⃣ पूर्णिमा: भगवान श्रीकृष्ण व चंद्र देव की आराधना
व्रती को पांच दिनों तक सात्त्विक आहार रखना चाहिए। फलाहार या एक समय भोजन का नियम सर्वोत्तम माना गया है। प्रतिदिन गंगा जल से स्नान, दीपदान, तुलसी और शालग्राम की पूजा करने से पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है।
तुलसी जी इस व्रत की आत्मा मानी गई हैं। पंचक के दौरान तुलसी के पौधे को स्नान कराकर दीप जलाना और आरती करना अनिवार्य होता है। इससे भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
भीष्म पंचक केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मसंयम, श्रद्धा और ईश्वर भक्ति का पर्व है। इन पांच दिनों में जो व्यक्ति सत्य, करुणा और सेवा में लीन रहता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।