
Purushottam Maas Adhyay 17
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य की पावन कथा का सत्रहवाँ अध्याय अत्यंत मार्मिक और भावनात्मक प्रसंग से भरा हुआ है। यह अध्याय हमें जीवन की नश्वरता, कर्मों के रहस्य और भगवान की शरणागति के महत्व का गहन संदेश देता है। बृहन्नारदीय पुराण में वर्णित इस कथा में सुदेव शर्मा और उनकी पत्नी गौतमी के पुत्र शुकदेव की दुखद मृत्यु का वर्णन मिलता है, जिसे सुनकर स्वयं राजा दृढ़धन्वा भी आश्चर्य और करुणा से भर उठते हैं। यह प्रसंग केवल एक परिवार के दुःख की कथा नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए एक आध्यात्मिक शिक्षा है जो संसार के मोह में बंधा हुआ है।
नारदजी ने पूछा राजा दृढ़धन्वा के जीवन का अगला प्रसंग
कथा के आरम्भ में देवर्षि नारद भगवान नारायण से प्रश्न करते हैं कि पूर्व जन्म की कथा सुनकर जागृत हुए राजा दृढ़धन्वा का आगे क्या हुआ। वे विनम्रता से भगवान से अनुरोध करते हैं कि वह पवित्र प्रसंग सुनाएँ जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य के पापों का नाश होता है। भगवान नारायण उत्तर देते हुए बताते हैं कि राजा दृढ़धन्वा अपने पूर्व जन्म के रहस्यों को जानकर अत्यंत आश्चर्यचकित थे और आगे की घटनाओं को जानने की तीव्र इच्छा रखते थे। तब महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें आगे की कथा सुनानी आरम्भ की।
सुदेव शर्मा ने भगवान विष्णु पर रखा अटूट विश्वास
गौतमी के सांत्वनापूर्ण और धैर्य देने वाले वचनों को सुनकर सुदेव शर्मा ने अपने मन को संभाला। उन्होंने यह स्वीकार कर लिया कि संसार में जो कुछ होना है, वह भगवान की इच्छा और भाग्य के अनुसार ही होगा। इसी भावना के साथ वे भगवान हरि के चरणों में अपना मन लगाकर वन में समिधा, कुश, फल और पुष्प एकत्र करने के लिए जाने लगे। वे प्रत्येक कार्य करते समय भगवान विष्णु का स्मरण करते रहते थे। उन्हें यह आभास भी नहीं था कि नियति उनके जीवन में ऐसा तूफान लाने वाली है जो उनके अस्तित्व को झकझोर देगा।
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खेल-खेल में शुकदेव के साथ घट गई दुखद घटना
एक दिन जब सुदेव शर्मा वन में गए हुए थे, उसी समय उनका पुत्र शुकदेव अपने मित्रों के साथ गाँव की बावली में खेलने गया। ग्रीष्म ऋतु का समय था और सभी बालक जल में खेलते हुए अत्यंत प्रसन्न थे। वे एक-दूसरे पर पानी उछालते, हँसी-मज़ाक करते और बालसुलभ आनंद में डूबे हुए थे। खेल-खेल में शुकदेव ने अपने मित्रों को चकमा देने के लिए गहरे जल में गोता लगाया। लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। बावली का जल अथाह था और भीतर पहुँचकर वह व्याकुल हो गया। बाहर निकलने का प्रयास करते हुए अचानक उसकी श्वास रुक गई और वह उसी जल में मृत्यु को प्राप्त हो गया।
मित्रों ने दी शोकपूर्ण सूचना
जब काफी समय तक शुकदेव जल से बाहर नहीं आया तो उसके मित्र भयभीत हो गए। सभी बालक रोते-बिलखते हुए उसकी माता गौतमी के पास पहुँचे और पूरी घटना सुनाई। पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनते ही गौतमी के ऊपर मानो वज्रपात हो गया। वह तत्काल भूमि पर गिर पड़ी। उसी समय वन से लौटे सुदेव शर्मा को भी जब यह समाचार मिला तो वे कटे हुए वृक्ष की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े। एक ही क्षण में उनके जीवन का समस्त सुख समाप्त हो गया।
मृत पुत्र को देखकर फूट पड़ा माता-पिता का दुःख
कुछ समय बाद सुदेव शर्मा और गौतमी बावली के पास पहुँचे। वहाँ अपने प्रिय पुत्र के निर्जीव शरीर को देखकर दोनों का हृदय विदीर्ण हो गया। सुदेव शर्मा ने अपने पुत्र को गोद में उठा लिया और बार-बार उसका आलिंगन करने लगे। वे उसके मुख को चूमते, उसे पुकारते और आशा करते कि शायद वह फिर से उठकर उनसे बात करेगा। उनकी आँखों से अश्रुधारा बह रही थी और उनका कंठ शोक से भर गया था। वे बार-बार अपने पुत्र को संबोधित करते हुए उसे जागने के लिए कह रहे थे।
सुदेव शर्मा का हृदय विदारक विलाप
पुत्र-वियोग के दुःख में डूबे सुदेव शर्मा ने करुण स्वर में कहा कि हे पुत्र, उठो और अपने मधुर वचनों से मेरे हृदय के दुःख को दूर करो। उन्होंने स्मरण कराया कि उसके मित्र और गुरु उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि तुम्हारे बिना मैं घर नहीं जाऊँगा क्योंकि तुम्हारे बिना मेरा घर सूने जंगल के समान हो गया है। उनका प्रत्येक शब्द एक पिता के टूटे हुए हृदय की पीड़ा को व्यक्त कर रहा था। वहाँ उपस्थित सभी लोगों की आँखें नम हो गईं और वातावरण शोक से भर गया।
भाग्य और ब्रह्मा से पूछे अनेक प्रश्न
अत्यधिक दुःख में डूबे सुदेव शर्मा ने अपने भाग्य और स्वयं ब्रह्मा से प्रश्न करना आरम्भ कर दिया। वे कहते हैं कि मैंने कोई निंदनीय कर्म नहीं किया, किसी की हत्या नहीं की, फिर किस कर्म के फलस्वरूप मुझे यह दुःख मिला। वे ब्रह्माजी से पूछते हैं कि वृद्ध माता-पिता का एकमात्र सहारा छीनकर उन्हें क्या प्राप्त हुआ। पुत्र के सुंदर मुख, मधुर वाणी और स्नेह को स्मरण करके उनका हृदय बार-बार टूट रहा था। वे सोचते थे कि अब संसार में ऐसा कौन-सा स्थान है जहाँ से मृत पुत्र वापस मिल सकता हो।
राजा दशरथ का स्मरण कर स्वयं को धिक्कारा
अपने दुःख की तुलना करते हुए सुदेव शर्मा को अयोध्या के महाराज दशरथ की याद आती है। वे कहते हैं कि राजा दशरथ धन्य थे, जो भगवान राम के वनवास के दुःख को सहन न कर सके और अपने प्राण त्याग दिए। परन्तु मैं कितना अभागा हूँ कि अपने पुत्र की मृत्यु के बाद भी जीवित हूँ। यह कथन उनके हृदय की गहराई में छिपी पीड़ा और असहनीय शोक को दर्शाता है।
भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे सुदेव शर्मा
जब संसार का कोई सहारा शेष नहीं रहा, तब सुदेव शर्मा ने भगवान विष्णु को पुकारना आरम्भ किया। वे हे गोविन्द, हे विष्णु, हे यदुनाथ, हे मुरारे, हे गोपाल, हे गोपीश और हे वैकुण्ठनाथ कहकर भगवान से प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा कि पुत्र-वियोग रूपी अग्नि से मेरा हृदय जल रहा है, कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए। यह प्रसंग दर्शाता है कि जब मनुष्य संसार के सभी सहारों को खो देता है, तब वह अंततः भगवान की शरण में ही शांति और आश्रय खोजता है।
श्रीकृष्ण के वचनों की अवहेलना पर हुआ पश्चाताप
अध्याय के अंत में सुदेव शर्मा को अपनी भूल का बोध होता है। वे स्वीकार करते हैं कि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के वचनों की अवहेलना कर पुत्र प्राप्ति की इच्छा की थी। अब उन्हें समझ में आता है कि जो वस्तु भाग्य में नहीं होती, उसे पाने का प्रयास अंततः दुःख का कारण बन सकता है। वे स्वयं को धिक्कारते हुए कहते हैं कि भाग्य में न लिखी हुई वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करने वाला मनुष्य अंततः निराशा ही पाता है। यही पश्चाताप उनके आध्यात्मिक परिवर्तन की शुरुआत बनता है।
अध्याय 17 से मिलने वाली आध्यात्मिक शिक्षा
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का यह अध्याय हमें सिखाता है कि संसार में कोई भी संबंध स्थायी नहीं है। जीवन और मृत्यु दोनों भगवान की इच्छा के अधीन हैं। माता-पिता, पुत्र, धन और वैभव सभी नश्वर हैं, जबकि भगवान की भक्ति और शरणागति ही शाश्वत है। यह कथा हमें यह भी समझाती है कि मनुष्य को अपने कर्म करते हुए भगवान पर विश्वास रखना चाहिए और जीवन के प्रत्येक सुख-दुःख को उनकी इच्छा मानकर स्वीकार करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास का वास्तविक संदेश भी यही है कि मनुष्य मोह-माया से ऊपर उठकर भगवान विष्णु की भक्ति में अपने जीवन को समर्पित करे।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का सत्रहवाँ अध्याय एक अत्यंत भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रसंग है। शुकदेव की मृत्यु ने सुदेव शर्मा और गौतमी को गहरे शोक में डुबो दिया, लेकिन इसी दुःख ने उन्हें भगवान विष्णु की शरण में पहुँचा दिया। यह अध्याय हमें याद दिलाता है कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है और अंततः भगवान का स्मरण ही मनुष्य को दुःखों के महासागर से पार लगाने वाला सच्चा सहारा है। यही कारण है कि पुरुषोत्तम मास की यह कथा आज भी लाखों भक्तों को श्रद्धा, भक्ति और आत्मचिंतन की प्रेरणा देती है।
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