Purushottam Maas Adhyay 18: श्रीहरि की कृपा से मृत पुत्र हुआ जीवित 

Purushottam Maas Adhyay 18

Purushottam Maas Adhyay 18

पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य केवल व्रत, उपवास और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान श्रीहरि की असीम कृपा, भक्तों के दुःखों का नाश और जीवन को मोक्ष की ओर ले जाने वाली दिव्य कथा भी है। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के अध्याय 18 में एक अत्यंत मार्मिक और चमत्कारिक प्रसंग वर्णित है, जिसमें पुत्र-वियोग से व्याकुल सुदेव ब्राह्मण पर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं प्रसन्न होकर प्रकट होते हैं और उसके मृत पुत्र को जीवनदान प्रदान करते हैं। साथ ही भगवान भविष्य में होने वाले अनेक रहस्यों का उद्घाटन भी करते हैं, जो आगे चलकर राजा दृढ़धन्वा के जीवन से जुड़ते हैं।

राजा दृढ़धन्वा की जिज्ञासा और वाल्मीकि मुनि का उत्तर

जब राजा दृढ़धन्वा ने अपने पूर्व जन्म का अद्भुत वृत्तांत सुना, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। उनके मन में यह जानने की तीव्र इच्छा जागी कि आगे क्या हुआ। उन्होंने विनम्रतापूर्वक महर्षि वाल्मीकि से कहा कि आपके अमृत समान वचनों को सुनकर भी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। कृपया आगे की कथा सुनाइए।

राजा की जिज्ञासा देखकर वाल्मीकि मुनि ने उस दिव्य घटना का वर्णन प्रारंभ किया, जो सुदेव ब्राह्मण और उसकी पत्नी गौतमी के जीवन में घटी थी।

पुत्र-वियोग में डूबे सुदेव ब्राह्मण का करुण विलाप

वाल्मीकि मुनि बताते हैं कि जब सुदेव ब्राह्मण अपने पुत्र शुकदेव की मृत्यु पर विलाप कर रहा था, तब प्रकृति भी मानो उसके दुःख में सहभागी बन गई। अचानक आकाश में भयंकर बादल छा गए, गर्जनाओं से दसों दिशाएँ गूंज उठीं और तीव्र वेग से चलने वाली वायु पर्वतों को भी कंपाने लगी।

बिजलियाँ चमकने लगीं और लगातार एक महीने तक वर्षा होती रही। पृथ्वी जलमग्न हो गई, किंतु पुत्र-वियोग की अग्नि में जल रहा वह ब्राह्मण इन सब बातों से अनजान रहा। उसने न भोजन किया और न जल ग्रहण किया। उसके मुख से केवल “हे पुत्र! हे पुत्र!” की पुकार ही निकलती रही।

अनजाने में ही यह पूरा समय पुरुषोत्तम मास का था। इस प्रकार बिना किसी विशेष संकल्प के भी सुदेव ब्राह्मण से पुरुषोत्तम मास का पालन हो गया। भगवान श्रीहरि भक्त की भावना देखते हैं, और इसी कारण इस मास की महिमा से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उसके सामने प्रकट हुए।

पुरुषोत्तम मास की कृपा से भगवान श्रीकृष्ण का प्रकट होना

पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण नूतन मेघ के समान श्याम वर्ण, वनमाला से सुशोभित दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए। जैसे ही भगवान प्रकट हुए, आकाश के बादल और अंधकार समाप्त हो गए।

भगवान के दर्शन पाकर सुदेव और गौतमी अत्यंत भावविभोर हो गए। उन्होंने अपने पुत्र के शरीर को भूमि पर रख दिया और भगवान श्रीकृष्ण को दंडवत प्रणाम किया। हाथ जोड़कर वे भगवान के सम्मुख खड़े हो गए और उन्हें ही अपना एकमात्र रक्षक मानने लगे।

भगवान भी पुरुषोत्तम मास की सेवा से प्रसन्न होकर अमृत के समान मधुर वाणी में उनसे बोले।

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भगवान श्रीहरि का दिव्य वरदान

भगवान श्रीहरि ने सुदेव ब्राह्मण से कहा कि तुम वास्तव में धन्य हो। तुम्हारा भाग्य इतना महान है कि तीनों लोकों में कोई उसका वर्णन नहीं कर सकता।

भगवान ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम्हें बारह हजार वर्ष की आयु वाला पुत्र प्राप्त होगा और तुम्हारे जीवन में पुत्र-सुख की कभी कमी नहीं रहेगी। तुम्हारे पुत्र के सौभाग्य और सुख को देखकर देवता, गंधर्व और मनुष्य भी पुत्र-सुख की कामना करेंगे।

इसके बाद भगवान ने एक प्राचीन कथा सुनाई, जो कभी महर्षि मार्कण्डेय ने राजा रघु को सुनाई थी।

धनुर्मुनि और अमर पुत्र की इच्छा की कथा

प्राचीन काल में धनु नामक एक महान मुनि थे। उन्होंने संसार के लोगों को पुत्र की चिंता में दुखी देखा और स्वयं एक अमर पुत्र प्राप्त करने का संकल्प किया। इस उद्देश्य से उन्होंने हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। धनुर्मुनि ने अमर और बुद्धिमान पुत्र की इच्छा व्यक्त की। लेकिन देवताओं ने बताया कि पृथ्वी पर पूर्णतः अमर पुत्र संभव नहीं है।

तब मुनि ने ऐसा पुत्र मांगा जिसकी आयु किसी विशाल पर्वत के अस्तित्व तक बनी रहे। देवताओं ने उनकी यह इच्छा स्वीकार कर ली और कुछ समय बाद उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ।

अहंकार के कारण धनुर्मुनि के पुत्र का विनाश

धनुर्मुनि का पुत्र धीरे-धीरे चंद्रमा की भाँति बढ़ने लगा। जब वह सोलह वर्ष का हुआ, तब उसके पिता ने उसे ऋषियों और ब्राह्मणों का सम्मान करने की शिक्षा दी। लेकिन आयु के अभिमान और अहंकार में डूबे उस युवक ने मुनियों का अनादर करना प्रारंभ कर दिया।

एक दिन महिष नामक तपस्वी मुनि शालग्राम शिला का पूजन कर रहे थे। तभी वह चंचल बालक वहाँ पहुँचा और हँसते हुए शालग्राम शिला को उठाकर जल से भरे कुएँ में फेंक दिया।

यह देखकर महिष मुनि अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने उसे तत्काल मृत्यु का शाप दे दिया। किंतु शाप के बाद भी जब वह जीवित रहा, तब मुनि ने ध्यान लगाया और जाना कि उसकी आयु पर्वत से जुड़ी हुई है।

महिष मुनि ने एक गहरी सांस ली, जिससे असंख्य महिष उत्पन्न हुए। उन महिषों ने उस पर्वत को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। पर्वत के नष्ट होते ही उस बालक की आयु समाप्त हो गई और उसकी मृत्यु हो गई।

हठपूर्वक प्राप्त वस्तु कभी सुख नहीं देती

अपने पुत्र की मृत्यु से धनुर्मुनि अत्यंत दुखी हो गए। उन्होंने बार-बार विलाप किया और अंततः पुत्र के शरीर को लेकर चिता की अग्नि में प्रवेश कर गए।

इस प्रसंग के माध्यम से भगवान श्रीहरि यह शिक्षा देते हैं कि हठ, अभिमान या केवल व्यक्तिगत इच्छा के कारण प्राप्त की गई वस्तु अंततः दुःख का कारण बन सकती है। जीवन में प्राप्त हर वरदान तभी कल्याणकारी होता है जब उसके साथ विनम्रता और धर्म का पालन हो।

सुदेव ब्राह्मण के भविष्य का दिव्य रहस्य

भगवान श्रीहरि ने सुदेव ब्राह्मण को बताया कि गरुड़जी द्वारा दिया गया यह पुत्र संसार में अत्यंत प्रशंसनीय होगा। पुरुषोत्तम मास की महिमा से मैंने इसे चिरस्थायी जीवन प्रदान किया है।

भगवान ने आगे भविष्यवाणी करते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन के सुख भोगने के बाद तुम ब्रह्मलोक जाओगे, वहाँ दिव्य सुख प्राप्त कर पुनः पृथ्वी पर जन्म लोगे। उस जन्म में तुम राजा दृढ़धन्वा के नाम से प्रसिद्ध होगे।

तुम दस हजार वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य करोगे, अपार बल और ऐश्वर्य प्राप्त करोगे और तुम्हारी पत्नी यही गौतमी होगी, जो उस जन्म में गुणसुंदरी नाम से प्रसिद्ध पटरानी बनेगी।

तुम्हें चार पुत्र और सुशीला नाम की एक पुण्यवती कन्या प्राप्त होगी।

शुक पक्षी द्वारा वैराग्य का उपदेश

भगवान ने आगे एक अत्यंत रोचक रहस्य बताया कि भविष्य में जब राजा दृढ़धन्वा सांसारिक सुखों में डूबकर भगवान को भूल जाएंगे, तब यही पुत्र शुक पक्षी के रूप में जन्म लेकर उन्हें वैराग्य का उपदेश देगा।

वट वृक्ष पर बैठकर वह बार-बार ऐसे श्लोकों का पाठ करेगा, जो संसार की नश्वरता और भगवान की शरणागति का संदेश देंगे। उन्हीं वचनों को सुनकर राजा के हृदय में वैराग्य जागृत होगा।

इसके बाद महर्षि वाल्मीकि उन्हें आत्मज्ञान प्रदान करेंगे और अंततः राजा तथा उनकी पत्नी दोनों भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त करेंगे, जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।

मृत शुकदेव का पुनर्जीवन और देवताओं की प्रसन्नता

भगवान श्रीहरि के वचन समाप्त होते ही एक अद्भुत चमत्कार हुआ। मृत पड़ा हुआ ब्राह्मण बालक शुकदेव जीवित होकर उठ खड़ा हुआ।

अपने पुत्र को जीवित देखकर सुदेव और गौतमी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। देवताओं ने भी प्रसन्न होकर आकाश से पुष्पवर्षा की। शुकदेव ने भगवान श्रीहरि और अपने माता-पिता को प्रणाम किया। गरुड़जी भी इस दृश्य को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए।

पूरा वातावरण दिव्य आनंद और भक्ति से भर गया।

सुदेव ब्राह्मण का भगवान से प्रश्न

इस चमत्कार के बाद सुदेव ब्राह्मण के मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उसने भगवान श्रीहरि को प्रणाम करके पूछा कि हे प्रभु! मैंने चार हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, तब आपने स्वयं आकर कहा था कि मुझे पुत्र प्राप्त नहीं होगा।

अब आपने उसी मृत पुत्र को जीवित कर दिया है। कृपया बताइए कि आपके उस पूर्व कथन और आज के इस चमत्कार का रहस्य क्या है?

इसी प्रश्न के साथ पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का अठारहवाँ अध्याय समाप्त होता है और आगे के अध्याय में भगवान इस रहस्य का अद्भुत समाधान प्रस्तुत करते हैं।

अध्याय 18 से मिलने वाली प्रमुख शिक्षाएँ

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का यह अध्याय अनेक गहन आध्यात्मिक संदेश प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि भगवान की कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है। पुरुषोत्तम मास का व्रत और उसका प्रभाव इतना महान है कि अनजाने में किया गया पालन भी भगवान को प्रसन्न कर सकता है। साथ ही यह कथा अहंकार के विनाश, विनम्रता के महत्व, पुत्र-मोह की सीमाओं और अंततः वैराग्य एवं भगवान की भक्ति के मार्ग को अपनाने की प्रेरणा देती है।

भगवान श्रीहरि का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि सांसारिक सुख क्षणिक हैं, जबकि भगवान की भक्ति और पुरुषोत्तम मास का पुण्य जीव को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करके परम शांति और मोक्ष की ओर ले जाता है।

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