
Purushottam Maas Adhyay 21
पुरुषोत्तम मास में भगवान श्रीपुरुषोत्तम की आराधना का अद्भुत महत्व
सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास को अत्यंत पवित्र और दुर्लभ माना गया है। यह वह दिव्य कालखंड है जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपना स्वरूप प्रदान किया है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इस मास में किया गया जप, तप, दान, व्रत, यज्ञ और पूजा सामान्य समय की अपेक्षा अनंत गुना अधिक फलदायी होता है। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के अध्याय 21 में महर्षि वाल्मीकि ने भगवान श्रीपुरुषोत्तम की प्रतिमा स्थापना, प्राण प्रतिष्ठा और षोडशोपचार पूजन की विस्तृत विधि का वर्णन किया है। यह अध्याय केवल धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन नहीं करता, बल्कि भक्त और भगवान के बीच स्थापित होने वाले आध्यात्मिक संबंध की गहराई को भी प्रकट करता है।
इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि केवल बाहरी पूजा पर्याप्त नहीं होती, बल्कि भगवान को अपने हृदय में स्थापित करने की भावना ही वास्तविक उपासना है। जब श्रद्धा, भक्ति और विधिपूर्वक पूजा का संगम होता है, तब भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है और साधक धीरे-धीरे मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने लगता है।
प्राण प्रतिष्ठा क्यों आवश्यक है?
महर्षि वाल्मीकि इस अध्याय में स्पष्ट करते हैं कि किसी भी देव प्रतिमा की स्थापना के पश्चात उसमें प्राण प्रतिष्ठा अवश्य करनी चाहिए। यदि प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जाती, तो वह प्रतिमा केवल धातु, पत्थर, मिट्टी या अन्य पदार्थ का एक सामान्य स्वरूप मात्र रह जाती है। उसमें देवता का दिव्य निवास नहीं माना जाता।
प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ है भगवान की चेतना और दिव्य शक्ति का आवाहन करके उन्हें प्रतिमा में स्थापित करना। यह प्रक्रिया साधारण मूर्ति को उपासना योग्य दिव्य स्वरूप प्रदान करती है। शास्त्रों के अनुसार जब तक प्राण प्रतिष्ठा नहीं होती, तब तक प्रतिमा में देवत्व का पूर्ण प्राकट्य नहीं माना जाता।
महर्षि वाल्मीकि बताते हैं कि साधक को भगवान पुरुषोत्तम के बीज मंत्र तथा वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए प्रतिमा के मस्तक और हृदय का स्पर्श करना चाहिए। इसके माध्यम से भगवान के प्राण, शक्ति और चैतन्य का आवाहन किया जाता है। यही कारण है कि मंदिरों में किसी भी नई प्रतिमा की स्थापना से पहले प्राण प्रतिष्ठा का भव्य अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है।
भगवान पुरुषोत्तम के दिव्य स्वरूप का ध्यान
प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात भगवान के ध्यान का विधान बताया गया है। ध्यान केवल पूजा का एक भाग नहीं बल्कि सम्पूर्ण साधना का आधार माना गया है। जिस प्रकार मनुष्य किसी प्रिय व्यक्ति को स्मरण करके उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है, उसी प्रकार भगवान के स्वरूप का ध्यान साधक को उनके निकट ले जाता है।
महर्षि वाल्मीकि भगवान पुरुषोत्तम का अत्यंत सुंदर वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि भगवान का वक्षस्थल श्रीवत्स चिन्ह से सुशोभित है। उनका शरीर नील कमल के समान श्याम और आकर्षक है। वे त्रिभंगी मुद्रा में खड़े होकर अनंत सौंदर्य का प्रकाश करते हैं। उनके साथ श्रीराधा विराजमान हैं और उनका मुखमंडल करोड़ों चंद्रमाओं की शीतलता प्रदान करने वाला है।
ऐसे राधा-कृष्ण स्वरूप पुरुषोत्तम भगवान का ध्यान करने से मन की चंचलता समाप्त होती है, भक्ति बढ़ती है और साधक को आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
संकल्प और नियम का महत्व
पूजन प्रारम्भ करने से पूर्व साधक को संकल्प करना चाहिए। संकल्प का अर्थ केवल पूजा का उद्देश्य बताना नहीं है, बल्कि अपने मन को एक निश्चित आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर केंद्रित करना है। शास्त्रों में कहा गया है कि बिना संकल्प के किया गया धार्मिक कार्य पूर्ण फल नहीं देता।
संकल्प करते समय साधक देश, काल और अपना नाम आदि बोलकर भगवान के समक्ष यह प्रतिज्ञा करता है कि वह श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ पूजा सम्पन्न करेगा। इसके पश्चात उसे यथासंभव मौन रहना चाहिए और मन को भगवान में स्थिर रखना चाहिए।
षोडशोपचार पूजन की दिव्य परंपरा
अध्याय 21 में भगवान पुरुषोत्तम की षोडशोपचार पूजा का विस्तार से वर्णन किया गया है। षोडशोपचार का अर्थ है भगवान की सेवा के सोलह प्रमुख रूप। जिस प्रकार किसी आदरणीय अतिथि का स्वागत किया जाता है, उसी प्रकार भगवान को भी सम्मानपूर्वक विभिन्न उपचार अर्पित किए जाते हैं।
सबसे पहले भगवान का आवाहन किया जाता है। भक्त भगवान से निवेदन करता है कि वे राधाजी सहित पधारें और उसकी पूजा को स्वीकार करें। इसके बाद रत्नजटित आसन अर्पित किया जाता है ताकि भगवान आरामपूर्वक विराजमान हों।
इसके पश्चात पाद्य अर्पण किया जाता है। पाद्य का अर्थ है भगवान के चरणों को धोने के लिए पवित्र जल अर्पित करना। यह भक्त की विनम्रता और समर्पण का प्रतीक है।
अर्घ्य अर्पण करते समय भगवान का सम्मानपूर्वक स्वागत किया जाता है। आचमन के लिए गंगाजल अर्पित किया जाता है, जो पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है।
पंचामृत स्नान का आध्यात्मिक महत्व
पूजन में पंचामृत स्नान का विशेष स्थान है। पंचामृत पाँच दिव्य पदार्थों—दूध, दही, घी, शहद और शक्कर—से मिलकर बनता है। ये पाँचों पदार्थ जीवन के विभिन्न गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
दूध पवित्रता का प्रतीक है, दही समृद्धि का, घी तेज और शक्ति का, शहद मधुरता का तथा शक्कर आनंद का प्रतीक माना जाता है। भगवान को पंचामृत स्नान कराने का अर्थ है कि भक्त अपने जीवन के सभी श्रेष्ठ गुणों को भगवान के चरणों में समर्पित कर रहा है।
पंचामृत स्नान के पश्चात भगवान को शुद्ध गंगाजल से स्नान कराया जाता है। यह स्नान समस्त दोषों के नाश और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक माना गया है।
वस्त्र, यज्ञोपवीत और अलंकरण का महत्व
स्नान के बाद भगवान को पीताम्बर और अन्य दिव्य वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। पीताम्बर भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का प्रिय वस्त्र माना जाता है। इसके पश्चात यज्ञोपवीत अर्थात जनेऊ अर्पित किया जाता है।
फिर भगवान को चन्दन का लेप लगाया जाता है। चन्दन शीतलता, पवित्रता और सौम्यता का प्रतीक है। इसके बाद केसरयुक्त अक्षत अर्पित किए जाते हैं जो पूर्णता और अखंडता का प्रतीक माने जाते हैं।
सुगंधित पुष्पों की माला अर्पित करके भक्त भगवान के प्रति अपना प्रेम और श्रद्धा व्यक्त करता है। पुष्पों की कोमलता और सुगंध भक्त के निर्मल हृदय का प्रतिनिधित्व करती है।
भगवान के अंगों का पूजन क्यों किया जाता है?
अध्याय 21 में भगवान के प्रत्येक अंग के पूजन का भी विधान बताया गया है। चरणों से लेकर शिर तक भगवान के विभिन्न अंगों का पूजन अलग-अलग दिव्य नामों के साथ किया जाता है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह है कि साधक भगवान के सम्पूर्ण स्वरूप का ध्यान करे। जब भक्त चरणों का पूजन करता है तो वह भगवान की शरणागति को स्वीकार करता है। हृदय का पूजन करते समय वह भगवान के प्रेम को स्मरण करता है और मुख का पूजन करते समय भगवान की मधुर वाणी एवं उपदेशों का चिंतन करता है।
इस प्रकार अंग-पूजन साधक के मन में भगवान के प्रति गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करता है।
धूप, दीप और नैवेद्य का आध्यात्मिक रहस्य
धूप समर्पण का अर्थ केवल सुगंध फैलाना नहीं है। धूप वातावरण को पवित्र करती है और यह संकेत देती है कि जैसे धूप की सुगंध चारों दिशाओं में फैलती है, वैसे ही भगवान की महिमा भी सम्पूर्ण संसार में व्याप्त है।
दीप अर्पित करते समय भक्त भगवान को समस्त ज्योतियों का मूल स्रोत मानता है। दीपक अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने वाले ज्ञान का प्रतीक है। इसलिए प्रत्येक पूजा में दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है।
नैवेद्य अर्पित करते समय भक्त भगवान को भोजन अर्पित करता है और उनसे अचल भक्ति, मनोकामना पूर्ति तथा जीवन में सद्गति की प्रार्थना करता है। शास्त्रों के अनुसार प्रेमपूर्वक अर्पित किया गया साधारण भोजन भी भगवान को अत्यंत प्रिय होता है।
JOIN OUR WHATSAPP CHANNEL : CLICK HEAR
ताम्बूल, दक्षिणा और आरती का महत्व
पूजन के अंतिम चरणों में भगवान को ताम्बूल अर्पित किया जाता है। यह सम्मान और आतिथ्य की परंपरा का एक भाग है। इसके बाद दक्षिणा समर्पित की जाती है, जो त्याग और दान की भावना को प्रकट करती है।
फिर भगवान की आरती की जाती है। आरती केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि भक्त के प्रेम की अभिव्यक्ति है। आरती के समय भक्त भगवान की महिमा का गुणगान करते हुए उनकी कृपा की याचना करता है।
प्रदक्षिणा और क्षमा प्रार्थना का महत्व
पूजन के पश्चात भगवान की प्रदक्षिणा की जाती है। इसका अर्थ है कि भगवान ही जीवन का केंद्र हैं और समस्त संसार उनकी परिक्रमा कर रहा है।
इसके बाद भक्त नमस्कार करके भगवान से क्षमा प्रार्थना करता है। यदि पूजा में किसी प्रकार की त्रुटि रह गई हो तो भगवान से उसे क्षमा करने की विनती की जाती है। यह विनम्रता और आत्मसमर्पण का सर्वोच्च स्वरूप है।
पुरुषोत्तम मास में अखण्ड दीप और हवन का विशेष फल
महर्षि वाल्मीकि बताते हैं कि पुरुषोत्तम मास के दौरान प्रतिदिन तिल से हवन करना चाहिए तथा घृत का अखण्ड दीप जलाना चाहिए। यह साधना भगवान पुरुषोत्तम को अत्यंत प्रिय है।
अखंड दीपक निरंतर जलती हुई भक्ति का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि भक्त के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम कभी समाप्त नहीं होना चाहिए। वहीं तिल का हवन पापों का नाश करने वाला और पुण्य बढ़ाने वाला माना गया है।
अध्याय 21 का गूढ़ आध्यात्मिक संदेश
इस अध्याय का वास्तविक संदेश बाहरी पूजा से कहीं अधिक गहरा है। प्राण प्रतिष्ठा केवल प्रतिमा में नहीं, बल्कि अपने हृदय में भगवान को स्थापित करने का प्रतीक है। यदि मन में श्रद्धा, भक्ति और प्रेम नहीं है तो बाहरी पूजा अधूरी मानी जाती है।
जब भक्त अपने हृदय को भगवान का मंदिर बना लेता है, अपने विचारों को पवित्र कर लेता है और जीवन के प्रत्येक कर्म को भगवान को समर्पित कर देता है, तभी वास्तविक प्राण प्रतिष्ठा होती है।
पुरुषोत्तम मास अध्याय 21 की फलश्रुति
महर्षि वाल्मीकि अंत में बताते हैं कि जो व्यक्ति पुरुषोत्तम मास में वैष्णव आचार्य के मार्गदर्शन में राधा सहित भगवान पुरुषोत्तम का प्रतिदिन श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजन करता है, वह इस संसार में दुर्लभ सुखों को प्राप्त करता है। उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और अंततः वह भगवान के परम धाम को प्राप्त करता है।
इस प्रकार पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का अध्याय 21 हमें केवल पूजा-विधि ही नहीं सिखाता, बल्कि यह भी बताता है कि सच्ची भक्ति, समर्पण और श्रद्धा के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन को दिव्य बना सकता है और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है।
Read Also : Purushottam Maas Adhyay 18: श्रीहरि की कृपा से मृत पुत्र हुआ जीवित









