
Purushottam Maas Adhyay 26
पुरुषोत्तम मास को सनातन धर्म में भगवान श्रीहरि विष्णु का अत्यंत प्रिय मास माना गया है। इस पवित्र माह में किए गए जप, तप, दान, व्रत और भक्ति का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है। श्रीबृहन्नारदीय पुराण में वर्णित पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के अध्याय 26 में महर्षि वाल्मीकि ने राजा दृढ़धन्वा को व्रत के उद्यापन, नियमों के त्याग, दान की महिमा, एकादशी व्रत के महत्व तथा धर्म के गूढ़ रहस्यों का विस्तार से वर्णन किया है। यह अध्याय बताता है कि पुरुषोत्तम मास में किए गए नियमों का समापन किस प्रकार करना चाहिए और किस प्रकार भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त की जा सकती है।
पुरुषोत्तम मास व्रत का उद्यापन क्या है?
महर्षि वाल्मीकि बताते हैं कि व्रत के अंत में विधिपूर्वक नियमों का त्याग करना ही उद्यापन कहलाता है। उद्यापन का अर्थ केवल व्रत समाप्त करना नहीं है, बल्कि भगवान विष्णु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए दान, ब्राह्मण भोजन और धार्मिक कर्मों द्वारा व्रत को पूर्णता प्रदान करना है।
जो व्यक्ति पुरुषोत्तम मास में विभिन्न प्रकार के नियमों का पालन करता है, उसे व्रत की समाप्ति पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से व्रत पूर्ण फलदायी बनता है और भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
विभिन्न व्रतों के अनुसार दान का विधान
अध्याय 26 में प्रत्येक प्रकार के नियम के अनुसार अलग-अलग दान करने का विधान बताया गया है।
यदि किसी ने नक्तव्रत अर्थात दिनभर उपवास रखकर केवल रात्रि में भोजन करने का नियम अपनाया हो, तो व्रत समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और स्वर्ण का दान देना चाहिए।
जो व्यक्ति अमावस्या के दिन विशेष भोजन नियम का पालन करता है, उसे गोदान करना चाहिए। जो आँवले के जल से स्नान करता है, उसे दही अथवा दूध का दान करना चाहिए।
यदि किसी ने पूरे माह केवल फलों का सेवन किया हो, तो उसे फलों का दान करना चाहिए। जिसने तेल का त्याग किया हो, उसे घी का दान करना चाहिए और जिसने घी का त्याग किया हो, उसे दूध का दान करना चाहिए।
धान्य त्याग करने वाले व्यक्ति को गेहूँ और उत्तम चावल का दान करना चाहिए। भूमि पर शयन करने वाले साधक को गद्दा, बिछौना, तकिया तथा शय्या का दान करना चाहिए। इससे भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
मौन व्रत, दीपदान और अन्य विशेष दान
जो व्यक्ति मौन व्रत का पालन करता है, उसे स्वर्ण, घंटा और तिल का दान करना चाहिए। पत्र में भोजन करने वाले साधक को ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ घी और शक्कर का दान करना चाहिए।
यदि किसी ने नाखून और केश न कटवाने का नियम रखा हो तो उसे दर्पण का दान करना चाहिए। जूते का त्याग करने वाले को जूते का दान करना चाहिए। नमक का त्याग करने वाले को विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट रस और खाद्य पदार्थों का दान करना चाहिए।
दीपक का त्याग करने वाले को पात्र सहित दीपदान करना चाहिए। विशेष रूप से तांबे के पात्र में घी और स्वर्ण की बत्ती रखकर दीपदान करना अत्यंत पुण्यदायक बताया गया है।
पुरुषोत्तम मास में नियम पालन का दिव्य फल
वाल्मीकि मुनि कहते हैं कि जो व्यक्ति अधिक मास में श्रद्धा और भक्ति के साथ नियमों का पालन करता है, वह मृत्यु के बाद वैकुण्ठ लोक में निवास करता है।
यदि कोई व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति के कारण बड़े दान करने में समर्थ न हो, तो भी श्रद्धा और भक्ति के साथ ब्राह्मणों का सम्मान कर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। ब्राह्मणों के संतोष से भी व्रत पूर्ण माना जाता है।
इससे स्पष्ट होता है कि भगवान केवल बाहरी प्रदर्शन नहीं देखते, बल्कि भक्त की श्रद्धा, भावना और समर्पण को स्वीकार करते हैं।
एक अन्न सेवन की महान महिमा
अध्याय 26 में एक अन्न सेवन अर्थात पूरे माह केवल एक प्रकार के अन्न का सेवन करने की विशेष महिमा बताई गई है।
महर्षि वाल्मीकि कहते हैं कि संसार में एक अन्न से बढ़कर कोई पवित्र साधना नहीं है। अनेक ऋषि-मुनियों ने इसी नियम का पालन करके सिद्धि और मोक्ष प्राप्त किया।
जो साधक पुरुषोत्तम मास में एक अन्न का सेवन करता है, वह भगवान की विशेष कृपा प्राप्त कर अंत में परम गति को प्राप्त होता है।
रात्रि भोजन और नक्तव्रत का महत्व
पुरुषोत्तम मास में रात्रि में भोजन करने वाले साधक को विशेष पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार देवता पूर्वाह्न में भोजन करते हैं, ऋषि-मुनि मध्याह्न में और पितृगण अपराह्न में भोजन करते हैं।
इसलिए जो व्यक्ति इन समयों का अतिक्रमण कर चौथे प्रहर अर्थात रात्रि में भोजन करता है, उसके ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।
महर्षि वाल्मीकि बताते हैं कि ऐसा साधक प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त करता है और उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
पुरुषोत्तम मास में उड़द त्याग का महत्व
भगवान विष्णु के प्रिय पुरुषोत्तम मास में उड़द दाल का त्याग विशेष रूप से बताया गया है।
जो व्यक्ति पूरे अधिक मास में उड़द का सेवन नहीं करता, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है। यह नियम आत्मसंयम और सात्त्विक जीवन का प्रतीक माना गया है।
एकादशी व्रत की अद्भुत महिमा
अध्याय 26 में एकादशी व्रत की महिमा का भी अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है।
जो व्यक्ति शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष दोनों एकादशियों का उपवास करता है, वह मृत्यु के बाद गरुड़ पर आरूढ़ होकर वैकुण्ठ लोक जाता है। वहाँ देवता उसका सम्मान करते हैं और अप्सराएँ उसकी सेवा करती हैं।
एकादशी व्रत करने वाले साधक को दशमी और द्वादशी के दिन केवल एक बार भोजन करना चाहिए। इस प्रकार किया गया एकादशी व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है और साधक को स्वर्ग तथा मोक्ष दोनों की प्राप्ति कराता है।
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कुशा की पवित्रता और धार्मिक महत्व
महर्षि वाल्मीकि कुशा घास की पवित्रता का वर्णन करते हुए बताते हैं कि इसके मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में भगवान विष्णु और अग्रभाग में भगवान शिव का निवास माना गया है।
इसी कारण वैदिक कर्मकांड, यज्ञ, पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा का विशेष महत्व है। बिना कुशा के किए गए अनेक धार्मिक कार्य अपूर्ण माने गए हैं।
कुशा को अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ उपयोग करने का निर्देश दिया गया है।
धर्म पालन और गुरुजनों के सम्मान का महत्व
इस अध्याय में महर्षि वाल्मीकि बार-बार यह संदेश देते हैं कि धर्म का पालन सदैव शास्त्रों और विद्वान ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में करना चाहिए। जो व्यक्ति धर्म के नियमों की उपेक्षा करता है और मनमाने ढंग से आचरण करता है, उसे अनेक कष्टों और पापफलों का सामना करना पड़ता है।
वहीं जो व्यक्ति श्रद्धा, विनम्रता और भक्ति के साथ धर्म का पालन करता है, वह इस लोक में सुख और परलोक में श्रेष्ठ गति प्राप्त करता है।
अध्याय 26 का आध्यात्मिक संदेश
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का छब्बीसवाँ अध्याय हमें सिखाता है कि व्रत केवल उपवास का नाम नहीं है, बल्कि आत्मसंयम, दान, सेवा, भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण का मार्ग है। व्रत का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है जब उसका समापन विधिपूर्वक उद्यापन, दान और ब्राह्मण संतोष के साथ किया जाए।
इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि श्रद्धा से किया गया छोटा सा दान भी भगवान को प्रिय होता है, जबकि अहंकार से किया गया बड़ा दान भी निष्फल हो सकता है। पुरुषोत्तम मास में नियम, संयम, एकादशी व्रत, दान और भगवान विष्णु की भक्ति मनुष्य को पापों से मुक्त कर वैकुण्ठ की ओर ले जाती है।
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