Purushottam Maas Adhyay 27 : राजा दृढ़धन्वा की तपस्या और कदर्य ब्राह्मण की कथा

Purushottam Maas Adhyay 27

Purushottam Maas Adhyay 27

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य की कथाओं में अध्याय 27 अत्यंत प्रेरणादायक और जीवन को दिशा देने वाला अध्याय है। इस अध्याय में एक ओर राजा दृढ़धन्वा और उनकी पतिव्रता पत्नी गुणसुन्दरी की भक्ति, वैराग्य और तपस्या का वर्णन मिलता है, वहीं दूसरी ओर लोभ, कृपणता और अधर्म में डूबे कदर्य ब्राह्मण की दुखद कथा प्रस्तुत की गई है। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि पुरुषोत्तम मास में किया गया जप, तप, स्नान और भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण मनुष्य को गोलोक तक पहुंचा सकता है, जबकि लोभ और स्वार्थ से भरा जीवन अंततः दुख और पतन का कारण बनता है।

वाल्मीकि मुनि के उपदेश से राजा दृढ़धन्वा में जागा वैराग्य

कथा के अनुसार जब महर्षि वाल्मीकि ने राजा दृढ़धन्वा को धर्म, भक्ति और पुरुषोत्तम मास का महत्व समझाया, तब राजा ने अत्यंत श्रद्धा के साथ उनकी पूजा की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सायंकाल होने पर वाल्मीकि मुनि सरयू नदी की ओर प्रस्थान कर गए और राजा उन्हें सम्मानपूर्वक सीमा तक छोड़कर अपने महल लौट आए।

महल पहुंचकर राजा ने अपनी पत्नी गुणसुन्दरी से संसार की नश्वरता पर विचार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह संसार राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे छह शत्रुओं से भरा हुआ है। यह शरीर भी मल, मूत्र, रक्त और रोगों से युक्त है, इसलिए इसका वास्तविक महत्व तभी है जब इसे भगवान के स्मरण और आत्मकल्याण में लगाया जाए।

राजा ने निश्चय किया कि वे इस असार संसार को छोड़कर वन में जाकर भगवान पुरुषोत्तम की भक्ति और तपस्या करेंगे।

पतिव्रता गुणसुन्दरी का आदर्श चरित्र

जब गुणसुन्दरी ने अपने पति का निर्णय सुना, तो उन्होंने अत्यंत विनम्रता से कहा कि वे भी उनके साथ वन जाएंगी। उन्होंने बताया कि पतिव्रता स्त्री के लिए उसका पति ही देवता के समान होता है।

गुणसुन्दरी ने कहा कि जो स्त्री पति के बिना जीवन बिताती है, उसे अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। इसलिए वे अपने पति का साथ कभी नहीं छोड़ेंगी। उनकी यह बात सुनकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुए और दोनों ने मिलकर वैराग्य का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया।

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पुत्र का राज्याभिषेक और वनगमन

राजा दृढ़धन्वा ने अपने पुत्र का राज्याभिषेक कर उसे राज्य की जिम्मेदारी सौंप दी। इसके बाद वे अपनी पत्नी के साथ हिमालय के समीप गंगा तट पर स्थित एक पवित्र वन में चले गए, जहां अनेक ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे।

दोनों ने पुरुषोत्तम मास की प्रतीक्षा की और जब यह परम पवित्र महीना आया, तब उन्होंने विधिपूर्वक भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करते हुए कठोर तपस्या आरंभ कर दी।

पुरुषोत्तम मास में राजा की कठोर तपस्या

पुरुषोत्तम मास के दौरान राजा दृढ़धन्वा ने अत्यंत कठिन व्रत और तप का पालन किया। वे दोनों समय गंगा स्नान करते, भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते और निरंतर जप में लीन रहते थे।

राजा ने हाथ ऊपर उठाकर, पैर के अंगूठे पर खड़े होकर, आकाश की ओर दृष्टि लगाकर और निराहार रहकर भगवान श्रीकृष्ण का नाम-जप किया। दूसरी ओर उनकी पतिव्रता पत्नी गुणसुन्दरी उनकी सेवा में सदैव तत्पर रहती थीं।

यह तपस्या केवल शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं थी, बल्कि पूर्ण समर्पण, श्रद्धा और भगवान के प्रति प्रेम का प्रतीक थी।

दिव्य विमान द्वारा गोलोक प्रस्थान

जब पुरुषोत्तम मास पूर्ण हुआ, तब वहां एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। उस विमान में पुण्यशील और सुशील नामक दिव्य पुरुष विराजमान थे।

राजा और रानी ने उन्हें नमस्कार किया। उन दिव्य पुरुषों ने दोनों को विमान में बैठने का आदेश दिया। जैसे ही राजा और रानी विमान में बैठे, उन्होंने दिव्य और नवीन शरीर धारण कर लिया तथा तत्काल गोलोक धाम को प्रस्थान कर गए।

वहां पहुंचकर उन्होंने भगवान श्रीहरि के सान्निध्य में अनंत आनंद का अनुभव किया। इस प्रकार पुरुषोत्तम मास में की गई भक्ति और तपस्या का उन्हें सर्वोच्च फल प्राप्त हुआ।

पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन

भगवान श्रीनारायण ने नारद जी से कहा कि इस संसार में पुरुषोत्तम मास के समान कोई दूसरा महीना नहीं है।

उन्होंने बताया कि हजारों जन्मों तक तपस्या करने से जो फल प्राप्त नहीं होता, वह पुरुषोत्तम मास के व्रत, स्नान, दान और जप से सहज ही प्राप्त हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या अनजाने में भी इस मास में पुण्य कर्म करता है, तो उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

भगवान ने यह भी बताया कि एक दुष्ट वानर ने केवल तीन दिनों तक पुरुषोत्तम मास में स्नान किया था और उसी पुण्य के प्रभाव से उसे भी गोलोक की प्राप्ति हो गई।

नारद जी की जिज्ञासा

भगवान की यह बात सुनकर नारद मुनि अत्यंत आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने पूछा कि वह वानर कौन था, उसने कहां जन्म लिया, क्या भोजन करता था और पुरुषोत्तम मास में ऐसा कौन-सा पुण्य किया जिससे उसे मुक्ति प्राप्त हो गई।

नारद जी ने भगवान से उस वानर की पूरी कथा सुनाने का आग्रह किया।

केरल देश का कृपण ब्राह्मण कदर्य

भगवान श्रीनारायण ने बताया कि केरल देश में चित्रशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। अत्यधिक कृपण और लोभी होने के कारण वह लोक में “कदर्य” नाम से प्रसिद्ध हो गया।

उसका जीवन केवल धन संग्रह में बीतता था। वह अच्छा भोजन नहीं करता था, अच्छे वस्त्र नहीं पहनता था और न ही धर्म-कर्म में कोई रुचि रखता था। उसने कभी यज्ञ, हवन, श्राद्ध, दान या तीर्थ स्नान नहीं किया।

माघ मास में तिलदान, कार्तिक मास में दीपदान, वैशाख में अन्नदान, ग्रहणकाल में जप और संक्रांति पर दान जैसे सभी धार्मिक कार्यों की उसने उपेक्षा की।

लोभ ने बना दिया पाप का भागी

कदर्य ने अन्यायपूर्वक धन एकत्रित किया और उसे भूमि में गाड़ दिया। वह स्वयं भी कष्ट उठाता था और दूसरों की सहायता भी नहीं करता था।

समाज के लोग उसके स्वभाव से घृणा करते थे। वह निरंतर धन के पीछे भागता रहा और अंततः अकेला तथा अपमानित जीवन जीने लगा।

एक दिन उसने अपनी व्यथा एक माली को सुनाई। माली को उस पर दया आ गई और उसने अपनी वाटिका में रहने की अनुमति दे दी।

माली के विश्वास का किया विश्वासघात

धीरे-धीरे माली ने कदर्य पर विश्वास करना शुरू कर दिया और उसे बगीचे की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप दी।

लेकिन कदर्य ने इस विश्वास का दुरुपयोग किया। वह स्वयं फलों को खाता, शेष फलों को बेच देता और धन अपने पास रख लेता। जब माली पूछता, तो झूठ बोलकर कहता कि पक्षियों ने फल खा लिए हैं।

अपने झूठ को सिद्ध करने के लिए वह पक्षियों को मारकर उनके पंख और मांस भी दिखाता था। इस प्रकार वह चोरी और विश्वासघात जैसे गंभीर पापों में लिप्त हो गया।

87 वर्ष बाद दुखद मृत्यु

इस प्रकार पापपूर्ण जीवन जीते हुए कदर्य ने 87 वर्ष बिता दिए। अंततः उसकी मृत्यु हो गई।

मृत्यु के बाद उसे कोई सम्मान नहीं मिला। यमदूत उसे कठोर यातनाएं देते हुए यमलोक ले गए। मार्ग में उसे अपने सारे पाप याद आने लगे और वह पछताने लगा कि उसने मानव जीवन का सदुपयोग नहीं किया।

वह सोचने लगा कि न उसने दान किया, न तपस्या की, न भगवान का स्मरण किया और न ही पुरुषोत्तम मास का पालन किया। उसने केवल धन जोड़ने में पूरा जीवन गंवा दिया।

चित्रगुप्त का निर्णय और वानर योनि का श्राप

यमलोक में चित्रगुप्त ने कदर्य के समस्त कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। उन्होंने धर्मराज से कहा कि यह व्यक्ति अत्यंत लोभी, कृपण और विश्वासघाती था। इसके जीवन में कोई विशेष पुण्य नहीं है।

विशेष रूप से उसने माली के विश्वास को तोड़ा और फलों की चोरी की। इसलिए उसके पाप अत्यंत गंभीर हैं।

चित्रगुप्त की बात सुनकर धर्मराज क्रोधित हो गए और उन्होंने आदेश दिया कि यह कदर्य एक हजार बार वानर योनि में जन्म लेगा और अपने विश्वासघात का फल भोगेगा।

अध्याय 27 से मिलने वाली शिक्षाएं

1. संसार नश्वर है

राजा दृढ़धन्वा की तरह मनुष्य को समझना चाहिए कि धन, वैभव और शरीर सब नाशवान हैं।

2. पति-पत्नी की संयुक्त भक्ति महान फल देती है

गुणसुन्दरी और राजा की संयुक्त तपस्या ने उन्हें गोलोक की प्राप्ति कराई।

3. पुरुषोत्तम मास सर्वोच्च पुण्यदायक है

इस मास में किया गया स्नान, जप, दान और उपवास अनंत गुना फल प्रदान करता है।

4. लोभ मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है

कदर्य ब्राह्मण का जीवन इस बात का उदाहरण है कि धन का लोभ व्यक्ति को अधर्म और पतन की ओर ले जाता है।

5. विश्वासघात का दंड अवश्य मिलता है

माली के विश्वास को तोड़ने के कारण कदर्य को कठोर दंड भोगना पड़ा।

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का अध्याय 27 हमें दो विपरीत जीवन मार्गों का दर्शन कराता है। एक ओर राजा दृढ़धन्वा और गुणसुन्दरी हैं, जिन्होंने भक्ति, वैराग्य और तपस्या के माध्यम से गोलोक धाम प्राप्त किया। दूसरी ओर कदर्य ब्राह्मण है, जिसने लोभ, स्वार्थ और अधर्म में जीवन व्यतीत किया और अंततः यमदंड का भागी बना।

यह कथा हमें प्रेरणा देती है कि मानव जीवन को केवल धन संग्रह में न गंवाकर भगवान के स्मरण, दान, सेवा और धर्ममय कर्मों में लगाना चाहिए। विशेष रूप से पुरुषोत्तम मास में किया गया छोटा-सा पुण्य कार्य भी जीवन को बदल सकता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

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