
Purushottam Maas Adhyay 15
बृहन्नारदीय पुराण के पंद्रहवें अध्याय में भक्त और भगवान के बीच के गहरे प्रेम, विश्वास और करुणा का अत्यंत भावुक वर्णन मिलता है। इस अध्याय की शुरुआत में श्रीनारायण, नारदजी को बताते हैं कि सुदेव शर्मा नामक एक ब्राह्मण अत्यंत भक्ति भाव से भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगा। वह हाथ जोड़कर गद्गद स्वर में भगवान को देवों के देव, त्रैलोक्य को अभय देने वाले, जगत के रक्षक और शरणागतों के दुःख हरने वाले प्रभु के रूप में प्रणाम करता है। सुदेव शर्मा भगवान को विश्व का आधार, समस्त फलों के मूल, तेजस्वियों में श्रेष्ठ और हृदय के अंधकार को दूर करने वाले श्रीकृष्ण के रूप में स्मरण करता है। उसकी स्तुति केवल शब्द नहीं थी, बल्कि एक टूटे हुए हृदय की पुकार थी जो भगवान की करुणा प्राप्त करना चाहता था। वह स्वयं को अल्पबुद्धि और दीन बताते हुए भगवान से कहता है कि जब ब्रह्मा आदि देवता भी आपकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते, तब मैं एक साधारण मनुष्य आपकी स्तुति कैसे कर सकता हूँ। यह प्रसंग सच्ची भक्ति और विनम्रता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
भगवान विष्णु का वरदान और भाग्य का कठोर सत्य
जब भगवान विष्णु ने सुदेव शर्मा की कठोर तपस्या और सच्ची श्रद्धा देखी, तब वे प्रसन्न होकर उससे वर मांगने को कहते हैं। भगवान हरि कहते हैं कि ऐसा महान तप आज तक किसी ने नहीं किया और वे उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेंगे। तब सुदेव शर्मा अत्यंत विनम्रता से केवल एक सत्पुत्र की कामना करता है। वह कहता है कि पुत्र के बिना उसका गृहस्थ जीवन सूना और अधूरा प्रतीत होता है। लेकिन तभी कथा एक अत्यंत भावुक मोड़ लेती है। भगवान विष्णु कहते हैं कि वे संसार की हर वस्तु दे सकते हैं, परंतु उसके भाग्य में सात जन्मों तक पुत्र सुख लिखा ही नहीं है। भगवान बताते हैं कि ब्रह्मा द्वारा लिखे गए भाग्य को बदलना अत्यंत कठिन है। भगवान के ये कठोर वचन सुनकर सुदेव शर्मा ऐसा धरती पर गिर पड़ता है जैसे जड़ कट जाने पर वृक्ष गिर जाता है। यह दृश्य अत्यंत मार्मिक है और यह दर्शाता है कि कभी-कभी मनुष्य की सबसे बड़ी इच्छा भी भाग्य के सामने असहाय हो जाती है।
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गौतमी का धैर्य और भाग्य के महत्व का उपदेश
अपने पति को इस अवस्था में देखकर उसकी पत्नी गौतमी अत्यंत दुःखी हो जाती है। वह पुत्र सुख से वंचित अपने पति को देखकर विलाप करने लगती है, लेकिन कुछ समय बाद धैर्य धारण कर उसे समझाती है। गौतमी कहती है कि मनुष्य को वही सुख-दुःख प्राप्त होता है जो उसके भाग्य में लिखा होता है। वह समझाती है कि अभागे व्यक्ति का प्रयास उसी प्रकार व्यर्थ हो जाता है जैसे मृत्यु के निकट पहुँचे व्यक्ति को औषध देना निष्फल हो जाता है। गौतमी यह भी कहती है कि यज्ञ, दान, तप, सत्य और व्रत से भी अधिक प्रभावशाली भाग्य का बल होता है। यह प्रसंग जीवन के उस गहरे सत्य को उजागर करता है कि संसार में हर व्यक्ति अपने कर्मों और भाग्य का फल भोगता है। फिर भी गौतमी भगवान हरि के महत्व को नकारती नहीं, बल्कि वह अपने पति को धैर्य और दैव पर विश्वास रखने की प्रेरणा देती है। यह संवाद भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में कर्म और भाग्य के गूढ़ संबंध को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।
गरुड़जी की करुणा और भगवान विष्णु से भावुक प्रार्थना
जब गरुड़जी उस ब्राह्मण दंपत्ति का दुःख देखते हैं, तब उनका हृदय दया से भर उठता है। वे भगवान विष्णु से कहते हैं कि भक्तों के दुःख को सहन न करने वाले प्रभु की दया आज कहाँ चली गई। गरुड़जी भगवान को स्मरण कराते हैं कि वे वेदों और ब्राह्मणों की रक्षा करने वाले साक्षात विष्णु हैं। वे कहते हैं कि आपके भक्त कभी मुक्ति या सिद्धियों की इच्छा नहीं करते, वे केवल आपकी भक्ति चाहते हैं। फिर इस दुःखी ब्राह्मण को पुत्र देने में कैसी कठिनाई है? गरुड़जी का यह संवाद अत्यंत भावुक और भक्तिभाव से परिपूर्ण है। वे भगवान को सुदामा ब्राह्मण और गुरु सांदीपनि के पुत्र की कथा स्मरण कराते हैं, जिन्हें भगवान की कृपा से सुख प्राप्त हुआ था। गरुड़जी की करुणामयी वाणी यह दर्शाती है कि सच्चे भक्त दूसरों के दुःख को देखकर स्वयं भी व्याकुल हो जाते हैं। यह प्रसंग भगवान और भक्त के बीच प्रेम और दया के दिव्य संबंध को और अधिक गहरा बनाता है।
भगवान विष्णु की कृपा से सुदेव शर्मा को पुत्र प्राप्ति
गरुड़जी की करुणा और प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं। श्रीहरि गरुड़जी से कहते हैं कि वे तुरंत उस ब्राह्मण को उसकी इच्छा के अनुसार एक पुत्र प्रदान करें। भगवान की आज्ञा पाकर गरुड़जी अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर सुदेव शर्मा और गौतमी को एक सुंदर और योग्य पुत्र प्रदान कर देते हैं। इस प्रकार यह कथा यह सिद्ध करती है कि भगवान की कृपा और सच्चे भक्तों की प्रार्थना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। जहाँ भाग्य हार मान लेता है, वहाँ भगवान की करुणा नया मार्ग खोल देती है। पुरुषोत्तम मास की यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और भगवान पर अटूट विश्वास रखने वाला भक्त अंततः भगवान की कृपा अवश्य प्राप्त करता है।
पुरुषोत्तम मास अध्याय 15 का आध्यात्मिक महत्व
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का यह अध्याय भक्ति, भाग्य और भगवान की दया का अद्भुत संगम है। यह कथा हमें बताती है कि भगवान अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं, चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो। यह अध्याय यह भी सिखाता है कि मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। पुरुषोत्तम मास में इस कथा का श्रवण और पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में आशा, विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है। भक्तिभाव से इस अध्याय का पाठ करने वाला व्यक्ति जीवन के दुःखों से मुक्ति पाकर भगवान श्रीहरि की कृपा का पात्र बनता है।
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