कर्म न करते हुए भी सांख्य योगी कैसे सुखपूर्वक रहता है?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 13

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 13 सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥१३॥ अर्थात भगवान कहते हैं, वश में किये हुए शरीर वाला मनुष्य, शुद्ध मन से सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करके, नौ द्वारों वाले शरीर रूपी नगर में (अपने स्वरूप में) सुखपूर्वक स्थित रहता है, भले ही वह […]

क्या अशांत मन वाला व्यक्ति सच्चा सुख पा सकता है?

bhagavad Gita Chapter 2 Verse 66

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 66 नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् || 66 || अर्थात भगवान कहते हैं, जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ वश में नहीं होतीं, उन मनुष्यों की व्यवसायतमिका बुद्धि नहीं होती। व्यवसायतमिका बुद्धि नहीं होने से उन में कर्तव्य परायणता नहीं होती क्योंकि उनमें ऐसी भावना नहीं होती, […]