
Purushottam Maas Adhyay 14
अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास को भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने वाला महीना माना जाता है। इस पवित्र मास में कथा श्रवण, व्रत, दान और भक्ति करने से मनुष्य के जीवन के बड़े से बड़े दुःख दूर हो जाते हैं। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के अध्याय 14 में राजा दृढ़धन्वा, महर्षि बाल्मीकि और भगवान विष्णु की अद्भुत लीला का वर्णन मिलता है। यह कथा बताती है कि सच्ची भक्ति, तपस्या और भगवान हरि की आराधना से जीवन के सभी संकट समाप्त हो सकते हैं।
राजा दृढ़धन्वा के महल में पहुंचे महर्षि बाल्मीकि
भगवान श्रीनारायण जी कहते हैं कि एक समय चिंता से व्याकुल राजा दृढ़धन्वा के घर महर्षि बाल्मीकि पधारे। वही बाल्मीकि जिन्होंने श्रीराम के दिव्य चरित्र का वर्णन संसार को दिया।
राजा ने जैसे ही दूर से महर्षि को आते देखा, तुरंत उठकर उनके चरणों में दण्डवत प्रणाम किया। उन्होंने अत्यंत श्रद्धा से ऋषि की पूजा की, उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बैठाया और उनके चरण धोकर उस पवित्र चरणामृत को अपने मस्तक पर धारण किया।
राजा दृढ़धन्वा अत्यंत विनम्र भाव से बोले—
“हे प्रभु! आज मेरा जीवन धन्य हो गया। आपके दर्शन से मेरा जन्म सफल हो गया। मैं स्वयं को अत्यंत भाग्यशाली मानता हूँ।”
राजा की विनम्रता और श्रद्धा देखकर महर्षि बाल्मीकि अत्यंत प्रसन्न हुए।
शुक पक्षी के रहस्यमयी वचन से चिंतित थे राजा
महर्षि बाल्मीकि ने राजा से पूछा कि वे चिंता में क्यों हैं। तब राजा दृढ़धन्वा ने वन में घटी एक अद्भुत घटना सुनाई।
राजा बोले कि एक दिन वे शिकार के लिए घने जंगल में गए। वहाँ एक सुंदर तालाब देखकर जल पिया और विश्राम करने के लिए विशाल वटवृक्ष के नीचे बैठ गए। उसी वृक्ष पर एक सुंदर शुक पक्षी बैठा था।
अचानक उस पक्षी ने एक रहस्यमयी श्लोक कहा—
“यदि तू संसार के सुखों में ही डूबा रहेगा और आत्मा का चिंतन नहीं करेगा, तो इस संसार सागर से पार कैसे जाएगा?”
यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें उस वचन का अर्थ समझ नहीं आया। तभी से उनके मन में गहरा संशय उत्पन्न हो गया था।
राजा ने पूछा – मुझे इतना वैभव किस पुण्य से मिला?
राजा दृढ़धन्वा ने महर्षि से कहा—
“हे ब्रह्मन्! मेरे पास विशाल राज्य, सुन्दर पत्नी, चार पुत्र, हाथी-घोड़े, सेना और अपार सुख-संपत्ति है। मैं जानना चाहता हूँ कि यह सब मुझे किस पुण्य के कारण प्राप्त हुआ?”
राजा के प्रश्न को सुनकर महर्षि बाल्मीकि ध्यान में लीन हो गए। समाधि के बल से उन्होंने राजा के भूत, भविष्य और वर्तमान को जान लिया।
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पूर्व जन्म में कौन थे राजा दृढ़धन्वा?
महर्षि बाल्मीकि बोले—
“हे राजन्! पूर्व जन्म में आप द्रविड़ देश में ताम्रपर्णी नदी के किनारे रहने वाले ‘सुदेव’ नामक ब्राह्मण थे।”
सुदेव ब्राह्मण अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे अग्निहोत्र और यज्ञों द्वारा भगवान हरि की आराधना करते थे।
उनकी पत्नी गौतमी भी अत्यंत पतिव्रता और धर्मपरायण थी। वह भगवान शंकर की भक्त पार्वती के समान अपने पति की सेवा करती थी।
संतान न होने से दुखी थे सुदेव ब्राह्मण
लंबे समय तक गृहस्थ जीवन बिताने के बाद भी सुदेव और गौतमी को संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ। एक दिन दुःखी होकर सुदेव बोले—
“संसार में पुत्र से बढ़कर कोई सुख नहीं। पुत्र के बिना मेरा जीवन व्यर्थ है।”
उन्होंने कहा कि वे न तो पुत्र को गोद में खिलाने का सुख पा सके और न उसका विवाह देख सके। इस दुःख से वे अत्यंत व्याकुल रहने लगे।
गौतमी ने सुनाया ज्ञान और वैराग्य का उपदेश
पति को दुखी देखकर गौतमी ने उन्हें समझाया—
“हे स्वामी! आपके जैसे ज्ञानी पुरुषों को मोह में नहीं पड़ना चाहिए। भगवान की भक्ति ही सबसे बड़ा सुख है।”
उन्होंने राजा चित्रकेतु और राजा अंग की कथा सुनाकर बताया कि पुत्र मोह अंततः दुःख का कारण बन सकता है।
लेकिन साथ ही गौतमी ने कहा—
“यदि आपको सत्पुत्र की इच्छा है तो भगवान विष्णु की आराधना कीजिए। वही समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं।”
भगवान विष्णु की कठोर तपस्या
इसके बाद सुदेव ब्राह्मण अपनी पत्नी गौतमी के साथ ताम्रपर्णी नदी के तट पर गए। वहाँ दोनों ने कठोर तपस्या प्रारंभ की।
वे पाँच-पाँच दिन बाद केवल सूखे पत्ते और जल ग्रहण करते थे। इस प्रकार उन्होंने चार हजार वर्षों तक भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की।
उनकी तपस्या इतनी उग्र थी कि तीनों लोक कांप उठे।
गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए भगवान विष्णु
भक्तवत्सल भगवान विष्णु अपने भक्त की तपस्या से प्रसन्न होकर गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए।
भगवान का स्वरूप नवीन मेघ के समान श्याम, चार भुजाओं वाला और अत्यंत तेजस्वी था। भगवान मुकुंद के दर्शन करके सुदेव ब्राह्मण आनंद से भर गए और साष्टांग प्रणाम करने लगे।
यहीं अध्याय 14 का समापन होता है।
अध्याय 14 से मिलने वाली सीख
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का यह अध्याय हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ देता है—
- सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।
- भगवान विष्णु अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं।
- संसार के सुख स्थायी नहीं हैं, आत्म चिंतन आवश्यक है।
- तपस्या और श्रद्धा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
- संत और महापुरुष जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
पुरुषोत्तम मास में इस कथा का महत्व
पुरुषोत्तम मास में इस अध्याय का पाठ करने से—
- मन की शंकाएँ दूर होती हैं।
- परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
- संतान सुख की प्राप्ति होती है।
- भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
- जीवन में आध्यात्मिक जागृति आती है।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा अध्याय 14 केवल एक धार्मिक कथा नहीं बल्कि जीवन का गहरा आध्यात्मिक संदेश है। राजा दृढ़धन्वा की जिज्ञासा, सुदेव ब्राह्मण की तपस्या और भगवान विष्णु की कृपा यह दर्शाती है कि सच्चे मन से की गई भक्ति मनुष्य के भाग्य को बदल सकती है।
इस पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा भाव से भगवान विष्णु का स्मरण करें और इस पवित्र कथा का पाठ अवश्य करें।
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