भगवद गीता हमें क्या सिखाती है कर्तव्य के बारे में?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 37

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 37 हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: || 37 || अर्थात भगवान अर्जुन को कहते हैं, अगर तुम युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे तो तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी और अगर तुम युद्ध को जीत लोगे तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे, इसलिए […]

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपमान से क्यों डराया?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 35 36

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 35 36 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: |येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || 35 ||अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता: |निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् || 36 || अर्थात भगवान कहते हैं, महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से उपराम हुआ मानेंगे, जिनकी धारणा में तू बहुमान्य हो चुका है, […]

क्या अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक है? गीता से जानें उत्तर

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 33 34

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 33 34 अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || 33 ||अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् |सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते || 34 || अर्थात भगवान कहते हैं, अब जो तू यह धर्ममय युद्ध नहीं करता तो अपने धर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप को प्राप्त […]

बर्बरीक जी कौन थे? खाटू श्याम जी के रहस्यमयी रूप की कथा

बर्बरीक

जब भी भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का उल्लेख होता है, तो कई दिव्य पात्रों की कहानियाँ सामने आती हैं। इन्हीं में एक महान योद्धा हैं – बर्बरीक, जिनका नाम आज खाटू श्याम जी के रूप में श्रद्धा और भक्ति से लिया जाता है। बर्बरीक की कथा केवल वीरता की नहीं, बल्कि त्याग, भक्ति और भगवान […]

क्यों भगवान ने युद्ध को स्वर्ग का द्वार कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 32

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२॥ अर्थात भगवान कहते है, अपनी इच्छा से जीती गई लड़ाई स्वर्ग का खुला द्वार है। हे पृथानन्दन! वे क्षत्रिय बहुत प्रसन्न होते हैं, जिन्हें ऐसा युद्ध प्राप्त होता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 Meaning in […]

स्वधर्म निभाना क्यों है जीवन का सबसे बडा कर्तव्य?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 31 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || 31 || अर्थात भगवान कहते हैं, खुद के धर्म को देखकर भी आपको विकंपित अर्थात कर्तव्य कर्म से विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि धर्म में युद्ध से बड़ा क्षत्रिय के लिए दूसरा कुछ कल्याण कारक कर्म नहीं। Shrimad Bhagavad Gita […]

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से शोक न करने को क्यों कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 30

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 30 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || 30 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे भरतवंशी अर्जुन! यह शरीर सबके शरीर में सदैव अवध्य रहता है। इसीलिए तुम्हें सभी जीवों के लिए, अर्थात किसी भी जीव के लिए शोक नहीं करना चाहिए। Shrimad Bhagavad Gita Chapter […]

क्या आपने कभी अपने ‘स्वरूप’ को स्वयं जाना है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 29

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 29 आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: |आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोतिश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || 29 || अर्थात भगवान कहती है, कोई इस शरीरी को आश्चर्य से देखता है। इसी प्रकार कोई और इसे आश्चर्य के रूप में वर्णित करता है, और कोई इसे आश्चर्य के रूप में सुनता है, और कोई इसे […]

क्या मृत्यु सच में अंत है?

Bhagavad GIta Chapter 2 Verse 28

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 28 अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || 28 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे भारत! जन्म से पहले सभी प्राणी अदृश्य थे और मृत्यु के बाद वे अदृश्य हो जाते हैं और केवल मध्य में ही दृश्यमान होते हैं, तो फिर इसमें शोक मनाने की क्या बात […]

क्या हम जन्म और मृत्यु को टाल सकते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 27

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 27 जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || 27 || अर्थात भगवान कहते हैंक्योंकि जो जन्मा है वह अवश्य मरेगा और जो मरा है वह अवश्य जन्मेगा, अतः इसे (जन्म-मृत्यु के प्रवाह को) टाला नहीं जा सकता, अर्थात् रोका नहीं जा सकता। इसलिए तुम्हें इस […]

क्या बीज की तरह हर पल बदलता है हमारा शरीर?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 25 26

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 25 26 अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते |तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि || 25 ||अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् |तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि || 26 || अर्थात भगवान कहते हैं, यह देही प्रत्येक नहीं दिखता, यह चिंतन का विषय नहीं, और इसमें कोई विकार नहीं, इसीलिए यह देही को ऐसा जानकर शौक नहीं […]

क्या आत्मा पर मंत्र शस्त्र या शाप का असर होता है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 24

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 24 अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च |नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: || 24 || अर्थात भगवान कहते हैं, यह शरीरी को छेदा नहीं जा सकता, इसे जला नहीं जा सकता, और इसे गीला भी नहीं किया जा सकता। तथा इसे सुखा भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह नित्य रहने वाला, सब में […]