शरीर नाशवान है आत्मा नहीं – क्या है इसका आध्यात्मिक विज्ञान?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 23

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 23 नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: |न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत: || 23 || अर्थात् भगवान कहते है, शस्त्रों इस शरीरी को छेद नहीं सकते, अग्नि इसे जला नहीं सकती, जल इसे गिला नहीं कर सकता, और वायु इसे सुखा नहीं सकता। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka […]

क्या मृत्यु केवल पुराने वस्त्र बदलने जैसा ही एक परिवर्तन है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 22

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 22 वासांसि जीर्णानि यथा विहायनवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही || 22 || अर्थात भगवान कहते हैं, मनुष्य जिस तरह पुराने वस्त्र त्याग कर दूसरे नए वस्त्र धारण कर लेते हैं, वैसे ही यह देही पुराने शरीर को त्याग करके दूसरे नए शरीर में चला जाता […]

क्या मृत्यु पर शोक करना उचित है? गीता क्या कहती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 21

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 21 वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् |कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || 21 || अर्थात भगवान कहते हैं, है प्रथा नंदन जो मनुष्य इस शरीरी को अविनाशी, नित्य, जन्म रहित और अव्यय जानते हैं, वह किस तरह किसीको मारे और किस तरह किसी को माराये? Shrimad Bhagavad Gita […]

शरीर और आत्मा में क्या अंतर है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 20

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 20 न जायते म्रियते वा कदाचिनायं भूत्वा भविता वा न भूय: |अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे || 20 || अर्थात भगवान कहते हैं, यह शरीरी ना ही कभी जन्म लेता है, और ना ही कभी मरता है, यह उत्पन्न होकर फिर से होने वाला नहीं! यह जन्म रहित […]

क्या आत्मा सच में मरती है या मारती है? भगवद गीता श्लोक 2.19 का रहस्य

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 19

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 19 य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् |उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || 19 || अर्थात भगवान कहते हैं, जो मनुष्य यह अविनाशी शरीरी को मारने वाला मानता है, और जो मनुष्य इसको मरण पामा हुआ मानता है, वे दोनों ही इसे नहीं जानते क्योंकी यह […]

क्या आत्मा वास्तव में अविनाशी और नित्य है? श्रीकृष्ण का अर्जुन को उपदेश

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 18

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 18 अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण: |अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत || 18 || अर्थात भगवान कहते हैं, अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहने वाला यह शरीरी(आत्मा) का यह शरीर अंत वाला कहने में आया है, इसीलिए हे अर्जुन! तुम युद्ध करो Shrimad Bhagavad Geeta Chapter 2 Shloka 18 Meaning in hindi अनाशिन […]

शरीर नश्वर है पर आत्मा क्यों नहीं? जानिए गीता का रहस्य

gita chapter

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 17 अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् |विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति || 17 || अर्थात भगवान कहते हैं, अविनाशी तो तुम उसे जानो जिसे यह संपूर्ण संसार व्याप्त हैं, यह अविनाशी का विनाश कोई भी नहीं कर सकता। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 17 Meaning in hindi अविनाशि तु तद्विद्धि […]

क्या जो दिखता है वही सच है? गीता से जानिए असत्य और सत्य की पहचान

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 16

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 16 नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: |उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि: || 16 || अर्थात भगवान कहते हैं, असत का भाव सदा विद्यमान नहीं और सत का अभाव विद्यमान नहीं, तत्वदर्शी महापुरुषों ने यह दोनों का अंत ही अर्थात तत्व देखा है। Shrimad Bhagavad Geeta Chapter 2 Shloka 16 Meaning in hindi […]

बचपन में ही बच्चों में बोए गीता ज्ञान के बीज, जीवन भर मिलती रहेगी छांव

geeta for kids

Gita Updesh: क्यों जरूरी है बच्चों को गीता ज्ञान देना? Srimad Bhagavad Gita केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर पहलू को समझने और उसमें संतुलन बनाए रखने का एक दार्शनिक और व्यवहारिक मार्गदर्शन है। यदि बच्चों को Geeta ka gyan बचपन से ही दिया जाए, तो वे न केवल अच्छे […]

क्या सुख-दुख में समान रहना ही अमरता का मार्ग है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 15

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 15 यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते || 15 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुख में समान रहने वाले जो धीर मनुष्य को यह मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथा नहीं पहुंचते, वे अमर होने में समर्थ हो जाते हैं, अर्थात अमर बन […]

क्या इन्द्रियाँ ही हमारे सुख-दुख की जड हैं? गीता का उत्तर जानिए

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 14.

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 14 मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा: |आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || 14 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे कुंतीनंदन! इन्द्रियों के विषय (जड़ विषय) वे हैं जो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) के द्वारा सुख और दुःख देते हैं। वे क्षणभंगुर एवं अनित्य हैं। हे भरतवंशी अर्जुन! तू इनको सहन कर। Shrimad Bhagavad Gita […]

क्या मृत्यु के बाद जीवन सच में होता है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 13

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 13 देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति || 13 || अर्थात भगवान कहते है, जिस प्रकार इस भौतिक मानव शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आता है, उसी प्रकार दूसरा शरीर भी प्राप्त होता है। धैर्यवान व्यक्ति इससे प्रभावित नहीं होता। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka […]