Purushottam Maas Adhyay 22: क्या खाएं, क्या न खाएं? संपूर्ण व्रत विधि और गोलोक प्राप्ति का रहस्य

Purushottam Maas Adhyay 22

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पुरुषोत्तम मास को सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय मास माना गया है। इस मास में किए गए जप, तप, दान, व्रत, कथा-श्रवण और भक्ति का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा अनेक गुना अधिक प्राप्त होता है। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के अध्याय 22 में राजा दृढ़धन्वा ने महर्षि वाल्मीकि से पुरुषोत्तम मास के व्रत के नियम, भोजन-विधान, त्याग करने योग्य पदार्थों तथा व्रत के आध्यात्मिक फलों के विषय में विस्तार से प्रश्न किया। तब महर्षि वाल्मीकि ने लोककल्याण के लिए पुरुषोत्तम मास व्रत की संपूर्ण विधि और उसके दिव्य महत्व का वर्णन किया।

यह अध्याय बताता है कि केवल उपवास करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शुद्ध आचरण, सात्विक भोजन, संयम और भगवान श्रीहरि की भक्ति के साथ किया गया व्रत ही पूर्ण फल प्रदान करता है।

राजा दृढ़धन्वा का प्रश्न और वाल्मीकि मुनि का उत्तर

राजा दृढ़धन्वा ने विनम्रतापूर्वक पूछा कि पुरुषोत्तम मास में व्रती को कौन-सा भोजन करना चाहिए, किन पदार्थों का त्याग करना चाहिए और व्रत की वास्तविक विधि क्या है। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि व्रत के दौरान किन आचरणों का पालन आवश्यक है।

राजा के इस प्रश्न पर महर्षि वाल्मीकि ने कहा कि पुरुषोत्तम मास में बताए गए नियम अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी हैं। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इन नियमों का पालन करता है, वह न केवल पापों से मुक्त होता है बल्कि भगवान पुरुषोत्तम की विशेष कृपा का पात्र भी बनता है।

पुरुषोत्तम मास में हविष्य अन्न का महत्व

महर्षि वाल्मीकि के अनुसार पुरुषोत्तम मास में व्रती को हविष्य अन्न ग्रहण करना चाहिए। हविष्य भोजन को उपवास के समान पुण्यदायक बताया गया है।

हविष्य अन्न में गेहूं, चावल, मूंग, जौ, तिल, मटर, साँवा, तिन्नी का चावल, बथुआ, अदरक, कंद-मूल, ककड़ी, केला, सेंधा नमक, दही, घी, बिना मक्खन निकाला हुआ दूध, कटहल, आम, हरड़, पीपल, जीरा, सोंठ, इमली, सुपारी, आँवला और गुड़ आदि का सेवन किया जा सकता है। साथ ही बिना तेल में पके हुए सात्विक पदार्थ भी हविष्य भोजन की श्रेणी में आते हैं।

शास्त्रों के अनुसार ऐसा भोजन मन और शरीर दोनों को शुद्ध करता है तथा भक्ति में स्थिरता प्रदान करता है।

पुरुषोत्तम मास में किन पदार्थों का त्याग करना चाहिए?

अध्याय 22 में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि व्रती को समस्त आमिष पदार्थों का त्याग करना चाहिए। मांस, मदिरा, शहद, राजमाष, राई तथा नशे की वस्तुएँ वर्जित मानी गई हैं।

इसके अतिरिक्त दूषित अन्न, बासी भोजन, दोबारा पकाया गया भोजन तथा तिल के तेल का सेवन भी त्याज्य बताया गया है। व्रत के दौरान भोजन की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है क्योंकि अशुद्ध भोजन से व्रत का प्रभाव कम हो जाता है।

आचरण संबंधी महत्वपूर्ण नियम

पुरुषोत्तम मास केवल भोजन के नियमों तक सीमित नहीं है। यह आत्मसंयम और सदाचार का भी मास है।

व्रती को दूसरे का अन्न ग्रहण करने से बचना चाहिए। किसी से वैरभाव नहीं रखना चाहिए तथा परस्त्रीगमन जैसे पापों से दूर रहना चाहिए। बिना किसी धार्मिक उद्देश्य के अनावश्यक यात्राएँ भी त्यागनी चाहिए।

महर्षि वाल्मीकि बताते हैं कि इस पवित्र मास में देवताओं, वेदों, ब्राह्मणों, गुरुजनों, गौमाता, साधुओं, स्त्रियों, राजाओं और महात्माओं की निंदा करना अत्यंत गंभीर दोष माना गया है। जो व्यक्ति निंदा से दूर रहता है, उसके जीवन में आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

ब्रह्मचर्य और संयम का विशेष महत्व

पुरुषोत्तम मास में ब्रह्मचर्य पालन को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। व्रती को पृथ्वी पर शयन करना चाहिए, पत्रावली में भोजन करना चाहिए और दिन के चौथे प्रहर में भोजन करना चाहिए।

ये नियम व्यक्ति के भीतर विनम्रता, तपस्या और आत्मनियंत्रण की भावना विकसित करते हैं। संयमित जीवन भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन माना गया है।

किन सब्जियों और खाद्य पदार्थों का त्याग करें?

अध्याय 22 में प्याज, लहसुन, मोथा, छत्राक (कुकुरमुत्ता), गाजर, मूली और शिग्रु जैसे पदार्थों का त्याग करने का निर्देश दिया गया है। इन वस्तुओं को केवल पुरुषोत्तम मास में ही नहीं बल्कि अन्य व्रतों में भी त्याज्य माना गया है।

इसके अलावा कुछ विशेष तिथियों में कोहड़ा, परवल, बेल, नारियल, आँवला, बैंगन और जल में उत्पन्न होने वाले शाकों का भी त्याग करने का विधान बताया गया है।

गृहस्थ लोगों को विशेष रूप से रविवार के दिन आँवले का सेवन न करने की सलाह दी गई है।

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व्रत के विभिन्न प्रकार

हर व्यक्ति की शारीरिक क्षमता अलग-अलग होती है। इसलिए शास्त्रों ने व्रत के कई विकल्प बताए हैं।

यदि संभव हो तो पूर्ण उपवास किया जा सकता है। अन्यथा केवल घी का सेवन, केवल दूध का सेवन, बिना मांगे प्राप्त भोजन का सेवन या फलाहार करके भी व्रत का पालन किया जा सकता है।

मुख्य बात यह है कि व्रत का पालन श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ किया जाए तथा ऐसा कोई कार्य न हो जिससे व्रत भंग हो।

पुरुषोत्तम मास में श्रीकृष्ण स्मरण और भागवत श्रवण का महत्व

महर्षि वाल्मीकि बताते हैं कि व्रती को प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नानादि के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए और नियम ग्रहण करना चाहिए।

उपवास, नक्त व्रत अथवा एकभुक्त व्रत में से किसी एक का संकल्प लेकर पूरे मास श्रद्धापूर्वक पालन करना चाहिए।

इस मास में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण अत्यंत पुण्यदायक बताया गया है। शास्त्र कहते हैं कि इसके पुण्य का वर्णन स्वयं ब्रह्माजी भी पूर्ण रूप से नहीं कर सकते।

तुलसीदल और शालग्राम पूजन का अनंत फल

अध्याय 22 में कहा गया है कि जो भक्त पुरुषोत्तम मास में लाखों तुलसी दल अर्पित करके शालग्राम भगवान का पूजन करता है, उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है।

तुलसी और शालग्राम का संबंध भगवान विष्णु से अत्यंत प्रिय माना गया है। इसलिए पुरुषोत्तम मास में इनकी पूजा विशेष फलदायी होती है।

यमदूत भी दूर भाग जाते हैं

इस अध्याय का एक अत्यंत प्रेरणादायक वर्णन यह है कि जो व्यक्ति पुरुषोत्तम मास के व्रत का विधिपूर्वक पालन करता है, उसे देखकर यमदूत वैसे ही भाग जाते हैं जैसे सिंह को देखकर हाथी भयभीत हो जाता है।

अर्थात् यह व्रत मनुष्य को पापों से मुक्त कर दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है।

सौ यज्ञों से भी श्रेष्ठ क्यों है पुरुषोत्तम मास व्रत?

महर्षि वाल्मीकि बताते हैं कि पुरुषोत्तम मास का व्रत सौ यज्ञों से भी श्रेष्ठ है। यज्ञों के द्वारा मनुष्य स्वर्ग की प्राप्ति करता है, जबकि पुरुषोत्तम मास व्रत का पालन करने वाला भक्त गोलोक धाम तक पहुँच सकता है।

यह व्रत केवल सांसारिक सुख ही नहीं देता, बल्कि परमात्मा की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

पुरुषोत्तम मास व्रत के अद्भुत लाभ

शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने वाले व्यक्ति के शरीर में समस्त तीर्थ, पवित्र क्षेत्र और देवताओं का निवास माना जाता है। इसके प्रभाव से दुःस्वप्न, दरिद्रता तथा शारीरिक, मानसिक और वाणी से किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं।

भगवान की कृपा से ऐसे भक्तों की रक्षा स्वयं देवगण करते हैं और उनके जीवन में आने वाले विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं। जहाँ ऐसे हरिभक्त निवास करते हैं वहाँ भूत, प्रेत और नकारात्मक शक्तियाँ भी प्रवेश नहीं कर पातीं।

अध्याय 22 का आध्यात्मिक संदेश

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का यह अध्याय हमें सिखाता है कि व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है। वास्तविक व्रत मन, वचन और कर्म की शुद्धि का मार्ग है। सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य, संयम, भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण, भागवत श्रवण और सेवा-भाव के साथ किया गया पुरुषोत्तम मास व्रत भक्त को भगवान के अत्यंत निकट ले जाता है।

जो व्यक्ति पूरे श्रद्धाभाव से इस प्रिय पुरुषोत्तम मास व्रत का पालन करता है, वह भगवान पुरुषोत्तम का प्रिय भक्त बनकर अंततः गोलोक धाम में दिव्य आनंद प्राप्त करता है।

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा अध्याय 22 व्रत के नियमों और उसके आध्यात्मिक महत्व का संपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसमें बताया गया है कि सात्विक जीवन, शुद्ध आहार, संयमित व्यवहार और श्रीहरि भक्ति के साथ किया गया पुरुषोत्तम मास व्रत मनुष्य को पापों से मुक्त कर गोलोक धाम तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। इसलिए इस दुर्लभ और पवित्र मास में प्रत्येक भक्त को अपनी शक्ति के अनुसार व्रत, जप, दान और भगवान विष्णु की आराधना अवश्य करनी चाहिए।

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