
Purushottam Maas Adhyay 24
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का चौबीसवाँ अध्याय भगवान श्रीहरि की कृपा, दीपदान की महिमा और सच्चे पश्चाताप की शक्ति को दर्शाने वाली अत्यंत प्रेरणादायक कथा है। इस अध्याय में अगस्त्य मुनि राजा चित्रबाहु को उनके पूर्व जन्म का रहस्य बताते हैं। यह कथा केवल एक व्यक्ति के जीवन परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि यह भी बताती है कि पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा और भक्ति से किया गया एक छोटा-सा धार्मिक कार्य भी मनुष्य के भाग्य को बदल सकता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान दरिद्रता, पाप और दुःखों का नाश कर जीवन में सुख, समृद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
मणिग्रीव का धर्म से पतन
पूर्व जन्म में राजा चित्रबाहु का नाम मणिग्रीव था। वह चमत्कारपुर नामक सुंदर नगर में अपनी पत्नी के साथ रहता था। वह अत्यंत धनवान, सदाचारी, धर्मपरायण और परोपकारी व्यक्ति था। समाज में उसका सम्मान था और वह सुख-समृद्धि से युक्त जीवन व्यतीत कर रहा था। किंतु दुर्भाग्यवश एक समय उसके मन में दुष्ट बुद्धि का उदय हुआ। धीरे-धीरे उसने धर्म का मार्ग छोड़ दिया और अधर्म के मार्ग पर चल पड़ा। वह परस्त्रीगमन, मद्यपान, चोरी और हिंसा जैसे पाप कर्मों में लिप्त हो गया। उसके बुरे आचरण के कारण परिवार, बंधु-बांधव और समाज के लोगों ने उसका साथ छोड़ दिया। राजा ने उसकी संपत्ति छीन ली और जो कुछ बचा था, उसे भी उसके संबंधियों ने ले लिया। परिणामस्वरूप वह पूर्णतः निर्धन हो गया और अपनी पत्नी के साथ घने वन में रहने को विवश हो गया।
वन में दुखमय जीवन और पश्चाताप
वन में रहने के दौरान मणिग्रीव का जीवन अत्यंत कष्टमय हो गया। वह जीवों का शिकार करके अपना और अपनी पत्नी का पालन-पोषण करता था। दरिद्रता, अपमान और अकेलेपन ने उसके जीवन को घेर लिया था। समय के साथ उसे अपनी भूलों का एहसास होने लगा। उसे समझ आया कि उसके पाप कर्म ही उसके पतन का कारण बने हैं। इसी बीच उसके जीवन में एक ऐसा अवसर आया जिसने उसके भाग्य की दिशा ही बदल दी।
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उग्रदेव ब्राह्मण से दिव्य भेंट
एक दिन वन में उग्रदेव नामक विद्वान और तपस्वी ब्राह्मण का आगमन हुआ। मणिग्रीव ने उनका आदर-सत्कार किया और विनम्रतापूर्वक अपनी जीवन कथा सुनाई। उसने स्वीकार किया कि वह अपने पापों के कारण ही इस स्थिति में पहुँचा है और अब वह अपने जीवन का उद्धार चाहता है। उसने ब्राह्मण से प्रार्थना की कि वे ऐसा उपाय बताएं जिससे उसकी दरिद्रता दूर हो जाए और वह पुनः सुख एवं सम्मान प्राप्त कर सके। मणिग्रीव का पश्चाताप और विनम्रता देखकर उग्रदेव प्रसन्न हुए और उसे एक अत्यंत गुप्त तथा कल्याणकारी उपाय बताया।
पुरुषोत्तम मास में दीपदान का उपदेश
उग्रदेव ने कहा कि शीघ्र ही पुरुषोत्तम मास आने वाला है। उन्होंने मणिग्रीव और उसकी पत्नी को निर्देश दिया कि वे पूरे पुरुषोत्तम मास में भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए नियमित रूप से दीपदान करें। उन्होंने बताया कि तिल के तेल का दीपक सर्वोत्तम माना गया है और यदि सामर्थ्य हो तो घी का दीपक जलाना और भी श्रेष्ठ है। किंतु वन में रहने के कारण यदि यह संभव न हो तो इंगुदी के तेल से भी दीपदान किया जा सकता है। उन्होंने दोनों को प्रतिदिन स्नान कर भगवान के समक्ष श्रद्धा और नियमपूर्वक दीप अर्पित करने का आदेश दिया। उग्रदेव ने विश्वास दिलाया कि इस साधारण से प्रतीत होने वाले कार्य से उनकी दरिद्रता जड़ से समाप्त हो जाएगी।
दीपदान की अनुपम महिमा
इस अध्याय में दीपदान की महिमा का अत्यंत विस्तृत वर्णन किया गया है। उग्रदेव कहते हैं कि पुरुषोत्तम मास में किया गया दीपदान इतना महान है कि उसकी तुलना किसी अन्य धार्मिक कर्म से नहीं की जा सकती। समस्त तीर्थयात्राएँ, यज्ञ, दान, तप, व्रत और वेदाध्ययन भी इसकी सोलहवीं कला के समान नहीं हैं। गयाश्राद्ध, पवित्र नदियों में स्नान, ग्रहणकाल में किए गए पुण्य कर्म और अनेक प्रकार की साधनाएँ भी पुरुषोत्तम मास के दीपदान के बराबर फल नहीं दे सकतीं। इसका कारण यह है कि यह दीपदान सीधे भगवान पुरुषोत्तम को समर्पित होता है और उनकी विशेष कृपा का कारण बनता है।
दीपदान से प्राप्त होने वाले दिव्य फल
उग्रदेव ने बताया कि पुरुषोत्तम मास का दीपदान केवल आर्थिक समृद्धि ही नहीं देता, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में शुभ फल प्रदान करता है। यह धन-धान्य और वैभव की वृद्धि करता है, संतानहीन दंपत्तियों को संतान सुख देता है और स्त्रियों को अखंड सौभाग्य प्रदान करता है। राज्य से वंचित व्यक्ति को पुनः राज्य और प्रतिष्ठा मिल सकती है। कन्या को गुणवान और दीर्घायु पति प्राप्त होता है तथा पुरुष को सुशील और पतिव्रता पत्नी मिलती है। विद्यार्थी को विद्या, साधक को सिद्धि, धन चाहने वाले को खजाना और मोक्ष की इच्छा रखने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है। भगवान की कृपा से यह दीपदान मनुष्य की सभी उचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है।
मणिग्रीव और उसकी पत्नी का पुरुषोत्तम मास व्रत
उग्रदेव के उपदेश को सुनकर मणिग्रीव और उसकी पत्नी ने पूरी श्रद्धा से उसका पालन करने का संकल्प लिया। जब पुरुषोत्तम मास आया तो दोनों ने नियमित स्नान किया, भगवान का स्मरण किया और पूरे मास इंगुदी के तेल से दीपदान किया। उन्होंने आलस्य का त्याग कर भक्ति और नियम का पालन किया। उनकी श्रद्धा, गुरु भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण देखकर भगवान पुरुषोत्तम अत्यंत प्रसन्न हुए। यद्यपि वे निर्धन थे, फिर भी उनकी सच्ची भक्ति ने उनके जीवन में चमत्कारी परिवर्तन का मार्ग तैयार कर दिया।
अगले जन्म में मिला राजवैभव
पुरुषोत्तम मास में किए गए दीपदान का प्रभाव इतना महान था कि मृत्यु के बाद मणिग्रीव और उसकी पत्नी ने दिव्य लोकों में सुख भोगा। इसके पश्चात उन्हें पृथ्वी पर श्रेष्ठ जन्म प्राप्त हुआ। मणिग्रीव राजा वीरबाहु के पुत्र के रूप में जन्मा और चित्रबाहु नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसकी पत्नी भी चन्द्रकला के रूप में पुनर्जन्म लेकर उसके साथ रही। उन्हें विशाल, समृद्ध और निष्कंटक राज्य प्राप्त हुआ। अगस्त्य मुनि ने स्पष्ट बताया कि यह समस्त वैभव पुरुषोत्तम मास में श्रद्धापूर्वक किए गए दीपदान का ही फल था।
पतिव्रता धर्म की महिमा
इस अध्याय में पतिव्रता स्त्री के महत्व का भी वर्णन मिलता है। अगस्त्य मुनि बताते हैं कि जो स्त्री अपने पति के प्रति समर्पित रहती है, वह उसके पुण्य का आधा भाग प्राप्त करती है। यही कारण था कि मणिग्रीव की पत्नी भी उसके साथ दीपदान के पुण्य की भागी बनी और अगले जन्म में रानी के रूप में जन्म लेकर सुख और सम्मान प्राप्त कर सकी। यह शिक्षा परिवार में धर्म, निष्ठा और पारस्परिक सहयोग के महत्व को भी दर्शाती है।
अध्याय 24 से मिलने वाली महत्वपूर्ण शिक्षाएँ
यह कथा हमें सिखाती है कि मनुष्य कितना भी पापी क्यों न हो, यदि वह सच्चे मन से पश्चाताप कर भगवान की शरण ग्रहण कर ले तो उसका उद्धार संभव है। संतों और गुरुओं का मार्गदर्शन जीवन को नई दिशा दे सकता है। पुरुषोत्तम मास भगवान की विशेष कृपा प्राप्त करने का दुर्लभ अवसर है और इस अवधि में किया गया दीपदान जीवन के अंधकार को दूर करने वाला दिव्य प्रकाश बन सकता है। यह अध्याय हमें यह भी सिखाता है कि ईश्वर केवल बाहरी वैभव नहीं देखते, बल्कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति को स्वीकार करते हैं।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का चौबीसवाँ अध्याय दीपदान की अद्भुत शक्ति और भगवान श्रीहरि की असीम कृपा का दिव्य उदाहरण प्रस्तुत करता है। मणिग्रीव जैसा पापी और दरिद्र व्यक्ति भी केवल श्रद्धा, पश्चाताप और पुरुषोत्तम मास में किए गए दीपदान के प्रभाव से अगले जन्म में महान राजा चित्रबाहु बन गया। यह कथा हमें प्रेरणा देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न हों, यदि हम भगवान की शरण में जाकर भक्ति और नियम का पालन करें, तो हमारा भाग्य भी बदल सकता है। पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा से किया गया दीपदान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सुख, समृद्धि, पुण्य और मोक्ष की ओर ले जाने वाला दिव्य साधन है।
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FAQs
पुरुषोत्तम मास में दीपदान किस तेल से करना चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार तिल के तेल का दीपक श्रेष्ठ माना गया है। सामर्थ्य होने पर घी का दीपक भी जलाया जा सकता है।
क्या दीपदान से दरिद्रता दूर होती है?
अध्याय 24 के अनुसार पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा से किया गया दीपदान दरिद्रता और आर्थिक कष्टों को दूर करने वाला माना गया है।
पुरुषोत्तम मास में दीपदान का सबसे बड़ा फल क्या है?
धन, वैभव, संतान, यश, सिद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति इसका सर्वोच्च फल बताया गया है।









