Purushottam Maas Adhyay 25: व्रत उद्यापन विधि, श्रीमद्भागवत दान और गोलोक प्राप्ति का रहस्य 

Purushottam Maas Adhyay 25

Purushottam Maas Adhyay 25

पुरुषोत्तम मास को भगवान श्रीकृष्ण का अत्यंत प्रिय मास माना गया है। इस पवित्र मास में किए गए जप, तप, दान, व्रत, कथा-श्रवण और भक्ति का फल अनंत गुना बढ़ जाता है। लेकिन शास्त्रों में बताया गया है कि किसी भी व्रत का वास्तविक और पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका विधिपूर्वक उद्यापन किया जाए। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के अध्याय 25 में महर्षि वाल्मीकि राजा दृढ़धन्वा को पुरुषोत्तम मास व्रत की उद्यापन विधि का विस्तार से वर्णन करते हैं। यह अध्याय केवल धार्मिक अनुष्ठानों का विवरण नहीं है, बल्कि श्रद्धा, समर्पण, सेवा और दान के माध्यम से भगवान की कृपा प्राप्त करने का दिव्य मार्ग भी बताता है।

राजा दृढ़धन्वा ने पूछा उद्यापन का महत्व

अध्याय 25 के प्रारंभ में राजा दृढ़धन्वा महर्षि वाल्मीकि से प्रश्न करते हैं कि जो श्रद्धालु पुरुषोत्तम मास का व्रत करते हैं, वे उसके पूर्ण फल की प्राप्ति कैसे करें। वे जानना चाहते हैं कि व्रत के समापन पर कौन-सी विधि अपनानी चाहिए ताकि भगवान पुरुषोत्तम प्रसन्न होकर साधक को संपूर्ण पुण्य प्रदान करें। इस पर वाल्मीकि मुनि बताते हैं कि पुरुषोत्तम मास व्रत का उद्यापन अत्यंत आवश्यक है और यह व्रत की पूर्णता का प्रतीक माना गया है।

उद्यापन का शुभ समय और प्रारंभिक तैयारी

महर्षि वाल्मीकि के अनुसार पुरुषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवमी अथवा चतुर्दशी तिथि उद्यापन के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है। इन तिथियों में प्रातःकाल स्नान, संध्या और नित्यकर्म पूर्ण करके भगवान का स्मरण करना चाहिए। इसके बाद श्रद्धालु को अपनी सामर्थ्य के अनुसार विष्णुभक्त और सदाचारी ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए। यदि सामर्थ्य हो तो तीस ब्राह्मणों को बुलाना चाहिए, अन्यथा सात या पाँच ब्राह्मणों को भी श्रद्धापूर्वक आमंत्रित किया जा सकता है। शास्त्रों का संदेश स्पष्ट है कि संख्या से अधिक महत्व श्रद्धा और भक्ति का है।

सर्वतोभद्र मंडल और चार कलशों की स्थापना

उद्यापन के मुख्य अनुष्ठान में पंचधान्य से सर्वतोभद्र मंडल बनाया जाता है। इस मंडल के ऊपर चार दिशाओं में चार पवित्र कलश स्थापित किए जाते हैं। ये कलश सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के हो सकते हैं, लेकिन वे शुद्ध और दोषरहित होने चाहिए। प्रत्येक कलश को वस्त्र, बेलपत्र और पान आदि से सजाया जाता है। इन चारों कलशों पर भगवान के चार दिव्य व्यूह स्वरूप—वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—की स्थापना की जाती है। यह स्थापना भगवान की सर्वव्यापक शक्ति और संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है।

राधा-कृष्ण की विशेष पूजा का विधान

व्रत के आरंभ में स्थापित राधिका सहित पुरुषोत्तम भगवान की प्रतिमा को मंडल के मध्य में विराजमान किया जाता है। इसके बाद वेद और वेदांगों के ज्ञाता वैष्णव आचार्य का वरण किया जाता है तथा चार ब्राह्मणों द्वारा चार व्यूहों का जप कराया जाता है। श्रद्धालु को आचार्य और ब्राह्मणों को वस्त्र, अंगूठी और दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए। इसके पश्चात प्रायश्चित्त स्वरूप गोदान का संकल्प लेकर भगवान राधा-कृष्ण की पूजा आरंभ की जाती है। यह संपूर्ण अनुष्ठान भगवान के प्रति कृतज्ञता और समर्पण का प्रतीक है।

अर्घ्यदान का आध्यात्मिक महत्व

उद्यापन में अर्घ्यदान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। श्रद्धालु अपनी पत्नी सहित दोनों हाथों में फल और यथाशक्ति रत्न लेकर भगवान को अर्घ्य अर्पित करता है। इस समय भगवान श्रीकृष्ण के श्यामसुंदर स्वरूप का ध्यान किया जाता है। भगवान को नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, हाथ में मुरली धारण किए हुए तथा राधारानी के साथ विराजमान मानकर अर्घ्य समर्पित किया जाता है। यह अर्घ्य केवल जल अर्पण नहीं बल्कि अपने संपूर्ण जीवन और कर्मों का भगवान को समर्पण है।

भगवान पुरुषोत्तम का दिव्य ध्यान

अध्याय 25 में भगवान के ध्यान का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। भगवान को रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान, कौस्तुभ मणि से सुशोभित, वंशी बजाते हुए तथा राधारानी के साथ वृंदावन में स्थित बताया गया है। उनका स्वरूप करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को भी लज्जित करने वाला है। भक्त जब इस ध्यान का स्मरण करता है तो उसका मन संसार के बंधनों से मुक्त होकर भगवान की दिव्य लीला में प्रवेश करने लगता है।

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गोदान और विविध दानों का महत्व

उद्यापन में गोदान का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार बछड़े सहित दूध देने वाली गौ का दान करना चाहिए। गौ को वस्त्र, आभूषण और घंटियों से सजाकर दान करने का विधान है। इसके अतिरिक्त तांबे का पात्र, घृत, तिल, वस्त्र, आभूषण और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान भी किया जाता है। यह दान केवल भौतिक वस्तुओं का त्याग नहीं बल्कि लोभ और अहंकार को त्यागकर धर्म की स्थापना का माध्यम माना गया है।

श्रीमद्भागवत दान की अद्वितीय महिमा

इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भाग श्रीमद्भागवत दान का वर्णन है। महर्षि वाल्मीकि बताते हैं कि हजारों कन्यादान, सैकड़ों यज्ञ, तुलादान और अनेक महादान भी श्रीमद्भागवत दान की बराबरी नहीं कर सकते। श्रीमद्भागवत को भगवान का साक्षात स्वरूप माना गया है। जो व्यक्ति इसे सुवर्णासन पर स्थापित करके वस्त्र और आभूषणों से अलंकृत कर किसी योग्य वैष्णव ब्राह्मण को दान करता है, वह अपने करोड़ों कुलों का उद्धार करता है और अंत में गोलोक धाम को प्राप्त होता है।

मालपुआ दान और वैकुण्ठ प्राप्ति का वर्णन

पुरुषोत्तम मास उद्यापन में ब्राह्मणों को मालपुए अर्पित करने का विशेष विधान बताया गया है। कांसे के पात्रों में मालपुए रखकर श्रद्धापूर्वक दान करना चाहिए। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि मालपुए में जितने छिद्र होते हैं, उतने वर्षों तक साधक वैकुण्ठ में निवास करता है। यदि कोई निर्धन हो तो वह मालपुए का कच्चा सामान अथवा फल आदि भी यथाशक्ति दान कर सकता है। भगवान के लिए धन नहीं बल्कि भाव और श्रद्धा सर्वोपरि मानी गई है।

ब्राह्मण भोजन और सेवा का महत्व

उद्यापन के अवसर पर ब्राह्मणों को प्रेमपूर्वक भोजन कराना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। भोजन में अंगूर, केला, आम, घी से बने व्यंजन, उड़द के बड़े, घेवर, फेनी, खरबूजा, ककड़ी तथा विभिन्न प्रकार के शाक परोसे जाते हैं। भोजन कराते समय श्रद्धालु को मधुर वाणी बोलते हुए ब्राह्मणों को संतुष्ट करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि ब्राह्मण सेवा के माध्यम से स्वयं भगवान हरि प्रसन्न होते हैं।

ताम्बूल दान का पुण्य

भोजन के पश्चात इलायची, लौंग, कपूर, नागरपान, कस्तूरी, जावित्री और कत्था आदि से युक्त ताम्बूल अर्पित करने का विधान बताया गया है। यह भगवान और ब्राह्मणों के सम्मान का प्रतीक माना गया है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक ताम्बूल दान करता है, वह इस संसार में ऐश्वर्य और परलोक में अमृतमय सुख का भागी बनता है।

क्षमायाचना और व्रत की पूर्णता

संपूर्ण पूजा और अनुष्ठान के बाद भक्त भगवान से क्षमा याचना करता है कि यदि पूजा में किसी प्रकार की त्रुटि रह गई हो तो वे अपनी कृपा से उसे पूर्ण कर दें। यह भाव भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है। मनुष्य चाहे कितनी भी सावधानी रखे, पूर्णता केवल भगवान की कृपा से ही प्राप्त होती है।

अमावस्या जागरण और अंतिम विसर्जन

अमावस्या की रात्रि में जागरण कर राधिका सहित पुरुषोत्तम भगवान की स्वर्ण प्रतिमा का पूजन किया जाता है। रात्रि भर भजन, कीर्तन और भगवान के नाम का स्मरण किया जाता है। पूजा के अंत में श्रद्धालु अपनी पत्नी सहित भगवान को प्रणाम कर उनका विधिपूर्वक विसर्जन करता है। इसके बाद आचार्य को प्रतिमा और पूजन सामग्री दान देकर व्रत का समापन किया जाता है।

पुरुषोत्तम मास व्रत का दिव्य फल

महर्षि वाल्मीकि और भगवान नारायण बताते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विधिपूर्वक पुरुषोत्तम मास व्रत का उद्यापन करता है, वह जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त हो जाता है। उसके जीवन से दारिद्र्य, दुःख और दुर्भाग्य दूर हो जाते हैं। उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मृत्यु के बाद वह वैकुण्ठ तथा गोलोक धाम की प्राप्ति करता है। इतना ही नहीं, उसके पूर्वजों का भी उद्धार होता है और संपूर्ण कुल भगवान की कृपा का पात्र बनता है।

अध्याय 25 का आध्यात्मिक संदेश

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का यह अध्याय हमें सिखाता है कि व्रत की सफलता केवल उपवास करने में नहीं बल्कि भक्ति, सेवा, दान, विनम्रता और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण में निहित है। उद्यापन का वास्तविक अर्थ भगवान को धन्यवाद अर्पित करना और उनके चरणों में अपने जीवन को समर्पित करना है। जो भक्त इस भावना के साथ पुरुषोत्तम मास व्रत का पालन करता है, वह सांसारिक सुखों के साथ-साथ अंततः भगवान श्रीकृष्ण के परम धाम गोलोक को प्राप्त करता है।

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