
Purushottam Maas Adhyay 28
पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन करने वाले ग्रंथों में अध्याय 28 एक अत्यंत प्रेरणादायक और चमत्कारिक कथा प्रस्तुत करता है। यह कथा बताती है कि भगवान श्रीहरि की कृपा कितनी असीम है और पुरुषोत्तम मास का प्रभाव कितना महान है। इसमें एक ऐसे ब्राह्मण कदर्य की कहानी है, जिसने जीवनभर लोभ, स्वार्थ और पापपूर्ण कर्म किए, लेकिन अंत समय में पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से उसे दिव्य गति प्राप्त हुई। यह कथा मनुष्य को कर्मफल, भगवान की करुणा और भक्ति की महिमा का गहरा संदेश देती है।
कदर्य के पापों का प्रारंभ और प्रेतयोनि की प्राप्ति
भगवान श्रीनारायण बताते हैं कि कदर्य नाम का ब्राह्मण अत्यंत लोभी स्वभाव का था। धन के प्रति उसका मोह इतना अधिक था कि वह धर्म और अधर्म का विचार किए बिना केवल संपत्ति जुटाने में लगा रहता था। धीरे-धीरे उसका लोभ चोरी जैसे पाप कर्मों में बदल गया। जब उसकी मृत्यु हुई और उसे धर्मराज के समक्ष प्रस्तुत किया गया, तब उसके जीवन के सभी कर्मों का लेखा-जोखा देखा गया। चित्रगुप्त ने उसके पापों का वर्णन करते हुए धर्मराज को बताया कि यह व्यक्ति लोभ और चोरी में लिप्त रहा है। इसलिए निर्णय हुआ कि उसे पहले प्रेतयोनि में भेजा जाए और बाद में वानर योनि प्राप्त हो। यमदूतों ने उसे भयंकर यातनाएँ देकर एक निर्जन वन में प्रेत रूप में छोड़ दिया, जहाँ वह भूख और प्यास से तड़पता हुआ इधर-उधर भटकने लगा।
प्रेतयोनि के बाद वानर जन्म और मृगतीर्थ की प्राप्ति
प्रेतयोनि के असहनीय दुःख भोगने के बाद कदर्य को उसके कर्मों के अनुसार वानर का जन्म मिला। यह जन्म उसे फलों की चोरी के पाप के कारण प्राप्त हुआ था। वानर रूप में वह जम्बूद्वीप के सुंदर कालञ्जोर पर्वत पर पहुँचा, जहाँ एक अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थित था जिसे मृगतीर्थ कहा जाता था। यह तीर्थ मानसरोवर के समान पवित्र माना जाता था और यहाँ श्राद्ध करने से पितरों को सद्गति प्राप्त होती थी। देवता भी दैत्यों के भय से मृग रूप धारण कर यहाँ स्नान करने आते थे, इसलिए इसका नाम मृगतीर्थ पड़ा। यद्यपि कदर्य को इस तीर्थ की महिमा का ज्ञान नहीं था, फिर भी उसके भाग्य में भगवान की विशेष योजना कार्य कर रही थी।
नारद मुनि की जिज्ञासा
जब नारद मुनि ने यह कथा सुनी कि एक पापी और दुष्ट वानर इतने पवित्र स्थान पर निवास कर रहा है, तब उनके मन में आश्चर्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने भगवान नारायण से प्रश्न किया कि करोड़ों पापों से युक्त यह जीव ऐसे दिव्य तीर्थ तक कैसे पहुँच गया। नारद जी ने कहा कि गुरुजन अपने शिष्यों से कोई बात नहीं छिपाते, इसलिए वे इस रहस्य को जानना चाहते हैं। तब भगवान नारायण ने प्रसन्न होकर कदर्य के पूर्व जन्म का विस्तृत इतिहास सुनाना प्रारंभ किया।
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चित्रकुण्डल वैश्य और पुरुषोत्तम मास का दिव्य व्रत
पूर्वकाल में चित्रकुण्डल नाम का एक धर्मात्मा वैश्य था। उसकी पत्नी तारका पतिव्रता और धर्मपरायण स्त्री थी। दोनों पति-पत्नी भगवान श्रीहरि के परम भक्त थे और उन्होंने अत्यंत श्रद्धा और नियमपूर्वक पुरुषोत्तम मास का व्रत किया। पूरे मास तक पूजा, जप, दान और भगवान की आराधना करने के बाद उन्होंने उद्यापन का भव्य आयोजन किया। उन्होंने वेद और वेदांगों के ज्ञाता ब्राह्मणों को आमंत्रित किया और बड़ी श्रद्धा से उनकी सेवा की। पूजा समाप्त होने पर उन्होंने सभी ब्राह्मणों को भरपूर दक्षिणा और दान देकर प्रसन्न किया।
लोभवश की गई भगवान की स्तुति
उसी समय लोभी ब्राह्मण कदर्य भी वहाँ पहुँचा। उसने देखा कि अन्य ब्राह्मणों को भरपूर दान और धन मिल रहा है। धन पाने की इच्छा से वह चित्रकुण्डल के सामने जाकर उनकी प्रशंसा करने लगा। उसने पुरुषोत्तम मास की महिमा का गुणगान किया, भगवान की स्तुति की और चित्रकुण्डल की भक्ति की सराहना की। यद्यपि उसकी भावना शुद्ध नहीं थी और वह केवल धन प्राप्त करना चाहता था, फिर भी उसके मुख से भगवान की महिमा का वर्णन हुआ। चित्रकुण्डल ने उसकी बातों से प्रसन्न होकर उसे भी धन प्रदान किया। कदर्य ने वह धन लेकर जमीन में गाड़ दिया, परंतु भगवान की पूजा का दर्शन, पुरुषोत्तम मास की महिमा का श्रवण और भगवान की स्तुति उसके जीवन में एक ऐसा पुण्य बीज बो गए जो भविष्य में उसके उद्धार का कारण बना।
भगवान श्रीराम द्वारा वानरों को दिया गया वरदान
भगवान नारायण आगे बताते हैं कि जब भगवान श्रीराम ने समुद्र पर सेतु बनाकर रावण का वध किया और लंका विजय प्राप्त की, तब देवताओं ने प्रसन्न होकर उन्हें वर माँगने को कहा। श्रीराम ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा, बल्कि युद्ध में मारे गए वानरों के पुनर्जीवन की प्रार्थना की। देवताओं ने अमृत वर्षा करके सभी वानरों को जीवित कर दिया। इसके बाद श्रीराम ने वानरों को आशीर्वाद दिया कि जहाँ-जहाँ वे निवास करेंगे, वहाँ फल-फूलों से भरे वृक्ष, मीठे जल की नदियाँ और सुंदर सरोवर होंगे। इसी वरदान के प्रभाव से वानर जाति के निवास स्थान प्राकृतिक समृद्धि से परिपूर्ण माने जाते हैं।
वानर रूप में कदर्य की भीषण पीड़ा
यद्यपि कदर्य को वानर शरीर प्राप्त हुआ, लेकिन उसके पूर्व जन्मों के पाप अभी भी उसका पीछा कर रहे थे। उसे एक गंभीर मुख रोग था, जिसके कारण उसके मुख से निरंतर रक्त बहता रहता था। वह न तो ठीक से भोजन कर पाता था और न ही अपनी भूख-प्यास शांत कर पाता था। उसके दाँत गिर गए थे और शरीर अत्यंत दुर्बल हो चुका था। वह एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर भटकता रहता और असहनीय पीड़ा से कराहता रहता। उसका जीवन इतना दुःखमय था कि कई बार वह मृत्यु को ही अपने लिए सुखद मानने लगा। यह सब उसके पूर्व जन्म के कर्मों का फल था, जिसे उसे भोगना ही था।
पुरुषोत्तम मास में अनजाने में हुआ व्रत
समय बीतते-बीतते पुनः पुरुषोत्तम मास का आगमन हुआ। उसी दौरान वह वानर अत्यधिक दुर्बल और रोगग्रस्त अवस्था में मृगतीर्थ के निकट पहुँच गया। दशमी तिथि से लेकर चार दिनों तक वह भूखा-प्यासा उसी तीर्थ के कुंड के आसपास पड़ा रहा। उसके शरीर में इतनी शक्ति भी नहीं बची थी कि वह ठीक से भोजन कर सके या जल पी सके। इस प्रकार अनजाने में उसका उपवास होने लगा और वह लगातार उस पवित्र तीर्थ के संपर्क में बना रहा। भगवान की कृपा से यही अनजाना व्रत उसके जीवन का सबसे बड़ा पुण्य बन गया।
मृत्यु के बाद मिला दिव्य स्वरूप
पाँचवें दिन दोपहर के समय वह वानर अपने प्राण त्याग बैठा। जैसे ही उसकी मृत्यु हुई, उसी क्षण उसका समस्त पाप नष्ट हो गया। उसने एक दिव्य और तेजस्वी शरीर धारण किया। उसका स्वरूप नीलकमल के समान श्याम वर्ण का था। उसके शरीर पर दिव्य आभूषण, रत्नजटित मुकुट, पीताम्बर, हार, कंगन और बाजूबंद सुशोभित थे। उसका तेज करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को भी मात देने वाला था। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि भगवान की कृपा से सबसे पतित जीव भी परम पवित्र बन सकता है।
वैकुण्ठ से आया दिव्य विमान
उसके दिव्य शरीर धारण करते ही आकाश से एक अद्भुत विमान उतरा। उसमें भगवान के पार्षद, गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ उपस्थित थीं। भेरी, मृदंग, वीणा और वेणु की मधुर ध्वनियाँ वातावरण को गुंजायमान कर रही थीं। अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और देवांगनाएँ उसकी सेवा में उपस्थित थीं। यह सब देखकर कदर्य आश्चर्यचकित रह गया। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके जैसे पापी जीव को ऐसा दिव्य सम्मान प्राप्त हो सकता है।
कदर्य का आत्मचिंतन और भगवान की करुणा
दिव्य विमान और वैकुण्ठ के वैभव को देखकर कदर्य सोचने लगा कि उसने जीवन में कोई विशेष पुण्य नहीं किया, फिर उसे यह महान फल कैसे प्राप्त हुआ। उसके मन में बार-बार यही प्रश्न उठ रहा था कि ऐसा सुख तो केवल महान पुण्यात्माओं को ही प्राप्त होना चाहिए। तभी भगवान के पार्षदों ने उसके मन की भावना को समझ लिया और उसे उसके उद्धार का रहस्य बताने के लिए आगे आए। यह भगवान की करुणा का अद्भुत उदाहरण था कि उन्होंने एक ऐसे जीव को भी नहीं छोड़ा, जिसने जीवनभर लोभ और पाप किए थे।
अध्याय 28 का आध्यात्मिक संदेश
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के न्याय के साथ-साथ उनकी करुणा भी अनंत है। मनुष्य अपने कर्मों का फल अवश्य भोगता है, लेकिन भगवान की भक्ति, उनके नाम का स्मरण, उनकी महिमा का श्रवण और पुरुषोत्तम मास जैसे पवित्र अवसरों का प्रभाव जीवन को पूरी तरह बदल सकता है। कदर्य ने लोभवश ही सही, भगवान की स्तुति की थी, पुरुषोत्तम मास की महिमा का गुणगान किया था और भगवान की पूजा का दर्शन किया था। यही छोटे-छोटे पुण्य कर्म अंततः उसके उद्धार का कारण बने। यह कथा बताती है कि पुरुषोत्तम मास में किया गया या अनजाने में भी प्राप्त हुआ पुण्य कभी व्यर्थ नहीं जाता।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का यह अध्याय भगवान श्रीहरि की असीम कृपा और पुरुषोत्तम मास की अनुपम महिमा का जीवंत प्रमाण है। कदर्य जैसे लोभी और पापी ब्राह्मण को भी अंततः दिव्य गति प्राप्त हुई, क्योंकि भगवान अपने भक्तों और अपने पवित्र मास के प्रभाव को कभी निष्फल नहीं होने देते। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को पुरुषोत्तम मास में श्रद्धा, भक्ति, जप, दान, व्रत और भगवान के स्मरण में समय बिताना चाहिए। यह मास केवल पापों का नाश ही नहीं करता, बल्कि जीवन को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करने की शक्ति भी रखता है।
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