Purushottam Maas Katha 11: पुरुषोत्तम मास का अपमान बना 5 पतियों का कारण

Purushottam Maas Katha 11

Purushottam Maas Katha 11

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा अध्याय – 11

सनातन धर्म में Purushottam Maas को भगवान श्रीकृष्ण का अत्यंत प्रिय मास माना गया है। इस पवित्र मास में किए गए व्रत, दान, जप और तप का फल अनंत गुना बढ़ जाता है। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के ग्यारहवें अध्याय में एक ऐसी रहस्यमयी कथा वर्णित है, जिसमें एक ऋषिकन्या की कठोर तपस्या, भगवान शिव का प्रकट होना, पाँच पतियों का वरदान और पुरुषोत्तम मास के अनादर का गहरा रहस्य सामने आता है।

यह अध्याय केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि तप, भक्ति, विनम्रता और भगवान के प्रिय पुरुषोत्तम मास की महिमा का अद्भुत संदेश देता है।

नारदजी ने पूछा ऋषिकन्या की कठोर तपस्या का रहस्य

कथा में नारदजी भगवान श्रीनारायण से पूछते हैं कि वह कौन-सी तपस्या थी, जिसे करना बड़े-बड़े मुनियों के लिए भी अत्यंत कठिन था। तब भगवान श्रीनारायण उस तपस्विनी कन्या की कथा सुनाते हैं।

वह ऋषिकन्या भगवान Shiva का ध्यान करते हुए घोर तपस्या में लीन हो गई। उसने पंचमुखी, सनातन, शांत स्वरूप महादेव को प्रसन्न करने के लिए अपने शरीर और मन को तप की अग्नि में झोंक दिया।

ऋषिकन्या की भयावह और अद्भुत तपस्या

उस कन्या की तपस्या इतनी कठिन थी कि देवता भी आश्चर्यचकित हो गए।

ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि तप

भीषण गर्मी में वह चारों ओर अग्नि जलाकर और ऊपर सूर्य की तपती किरणों के बीच बैठती थी। इसे पंचाग्नि तप कहा जाता है।

शीत ऋतु में जल तप

हेमंत और शिशिर ऋतु में वह बर्फ जैसे ठंडे जल में बैठकर तपस्या करती थी। उसकी स्थिति जल में खिले कमल जैसी प्रतीत होती थी।

वर्षा ऋतु में कठिन व्रत

वर्षाकाल में वह बिना किसी छाया के खुले आकाश के नीचे रहती और धूमपान व्रत का पालन करती थी। उसके शरीर की दशा अत्यंत दुर्बल हो गई थी, फिर भी उसकी भक्ति अडिग थी।

नौ हजार वर्षों तक चली तपस्या

हे राजन! वह ऋषिकन्या लगातार नौ हजार वर्षों तक तप में लीन रही। उसके तप का तेज इतना प्रबल हो गया कि देवराज इन्द्र भी भयभीत हो उठे। उन्हें चिंता होने लगी कि कहीं यह कन्या अपने तप से स्वर्ग का सिंहासन न प्राप्त कर ले।

अंततः उसकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए।

भगवान शिव का दिव्य दर्शन

जब भगवान शिव उसके सामने प्रकट हुए, तब वह तपस्विनी कन्या अत्यंत आनंदित हो उठी। तप के कारण दुर्बल शरीर भी शिवदर्शन से तेजस्वी और पुष्ट हो गया।

उसने झुककर भगवान शिव को प्रणाम किया और अत्यंत विनम्रता से उनकी स्तुति करने लगी।

ऋषिकन्या द्वारा भगवान शिव की स्तुति

कन्या ने भगवान शिव को अनेक नामों से पुकारा—

  • पार्वतीप्रिय
  • भूतेश
  • गौरीश
  • शम्भु
  • मृत्युञ्जय
  • पाप नाशक
  • संसार से मुक्त करने वाले

उसने कहा कि जो मनुष्य संसार रूपी भयानक समुद्र में डूबा हो, काल और दुखों से पीड़ित हो, यदि वह आपकी शरण में आ जाए तो निश्चित ही मुक्त हो जाता है।

यह स्तुति उसकी गहरी श्रद्धा और पूर्ण समर्पण को दर्शाती है।

भगवान शिव ने माँगने को कहा वरदान

ऋषिकन्या की भक्ति और उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव बोले—

“हे तपस्विनी! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मन में जो इच्छा हो, वह वर माँगो।”

शिवजी का यह वचन सुनकर वह कन्या अत्यंत प्रसन्न हुई और उसने केवल एक ही इच्छा प्रकट की—

“हे महादेव! मुझे योग्य पति दीजिए।”

उसने उत्साह में पाँच बार “पति दीजिए” कहा।

पाँच पतियों का वरदान क्यों मिला?

भगवान शिव बोले—

“हे सुन्दरी! तुमने पाँच बार पति माँगा है, इसलिए अगले जन्म में तुम्हारे पाँच पति होंगे। वे सभी वीर, धर्मज्ञ, सत्यपराक्रमी और महान क्षत्रिय होंगे।”

यह सुनकर कन्या चिंतित हो गई। उसने विनम्रता से कहा—

“हे प्रभु! संसार में एक स्त्री का एक ही पति होता है। पाँच पतियों वाली स्त्री न कभी देखी गई और न सुनी गई। कृपया लोक में मेरी हँसी न कराइए।”

तब भगवान शिव ने उसके पूर्व जन्म के कर्मों का रहस्य बताया।

दुर्वासा ऋषि का अपमान बना कारण

भगवान शिव ने कहा कि इस जन्म में उसे पति सुख प्राप्त नहीं होगा। अगले जन्म में वह बिना योनि के उत्पन्न होगी और पाँच पतियों का सुख भोगेगी।

इसके पीछे दो बड़े कारण बताए गए—

1. दुर्वासा ऋषि का अपमान

Durvasa भगवान शिव की प्रिय मूर्ति माने जाते हैं। कन्या ने अहंकारवश उनका अपमान किया था। शिवजी ने बताया कि दुर्वासा ऋषि का क्रोध तीनों लोकों को भस्म कर सकता है।

2. पुरुषोत्तम मास का अनादर

कन्या ने भगवान Krishna के प्रिय पुरुषोत्तम मास का व्रत और पूजन नहीं किया था। यही उसके जीवन का सबसे बड़ा दोष बना।

पुरुषोत्तम मास का अपमान करने का परिणाम

भगवान शिव ने स्पष्ट कहा—

  • जो पुरुषोत्तम मास की निंदा करता है, वह रौरव नरक का भागी बनता है।
  • जो इस मास का श्रद्धा से पालन करते हैं, उन्हें पुत्र, पौत्र, धन और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • स्वयं देवता भी पुरुषोत्तम मास की सेवा करते हैं।

यह संदेश बताता है कि पुरुषोत्तम मास केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण का विशेष कृपाकाल है।

भगवान शिव का अंतर्धान

जब भगवान शिव यह उपदेश देकर अंतर्धान हो गए, तब वह कन्या अत्यंत चिंतित और दुखी हो गई। उसकी स्थिति ऐसी हो गई जैसे अपने समूह से बिछड़ी हुई हिरणी भय और शोक में भटक रही हो।

इस कथा का आध्यात्मिक संदेश

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का यह अध्याय कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ देता है—

तपस्या तभी सफल है जब उसमें विनम्रता हो

केवल कठोर तप ही पर्याप्त नहीं। अहंकार और संतों का अपमान व्यक्ति के पुण्य को नष्ट कर सकता है।

संतों और ऋषियों का सम्मान आवश्यक है

दुर्वासा ऋषि के अपमान के कारण कन्या को कठोर परिणाम भुगतना पड़ा।

पुरुषोत्तम मास का महत्व अनंत है

भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय यह मास भक्तों के जीवन को बदलने की शक्ति रखता है। इस मास में व्रत, दान, कथा श्रवण और भगवान का स्मरण अत्यंत फलदायी माना गया है।

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा अध्याय 11 हमें यह सिखाता है कि तप, भक्ति और साधना के साथ विनम्रता और धर्मपालन भी आवश्यक है। भगवान शिव द्वारा दिए गए पाँच पतियों के वरदान के पीछे केवल संयोग नहीं, बल्कि कर्म, अहंकार और पुरुषोत्तम मास के अनादर का गहरा रहस्य छिपा था।

जो भक्त श्रद्धा से Purushottam Maas का पालन करते हैं, उन पर भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव दोनों की विशेष कृपा बनी रहती है।

Read Also : Purushottam Maas Adhyay 8 Hindi: द्रौपदी के पूर्व जन्म की चौंकाने वाली कथा

Scroll to Top