
Purushottam Maas Adhyay 12
सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास को भगवान श्रीहरि विष्णु का अत्यंत प्रिय महीना माना गया है। इस पवित्र मास में किए गए जप, तप, दान और व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का द्वादश अध्याय भक्तों को यह संदेश देता है कि जो व्यक्ति भगवान और पुरुषोत्तम मास की अवहेलना करता है, उसे जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि सच्ची श्रद्धा और भक्ति अंततः भगवान की कृपा दिलाती है। इस अध्याय में द्रौपदी के पूर्व जन्म, उनके कष्ट, श्रीकृष्ण की करुणा और पुरुषोत्तम मास की महिमा का अत्यंत भावुक वर्णन मिलता है।
शिवजी के जाने के बाद तपस्विनी कन्या का दुःख
नारदजी ने भगवान श्रीनारायण से पूछा कि जब भगवान शिव उस तपस्विनी कन्या को छोड़कर चले गए, तब उस बाला ने क्या किया। तब श्रीनारायण ने बताया कि यही प्रश्न राजा युधिष्ठिर ने भी भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था। श्रीकृष्ण ने कहा कि शिवजी के चले जाने के बाद वह कन्या अत्यंत दुःखी हो गई। वह भय और शोक से व्याकुल होकर रोने लगी। उसका शरीर तपस्या और मानसिक पीड़ा से कमजोर हो गया था। उसकी दशा ऐसी हो गई जैसे वनाग्नि में जल चुकी कोई लता सूखकर नष्ट हो जाती है।
समय बीतता गया और वह कन्या दुःख, ईर्ष्या और अकेलेपन में जीवन बिताने लगी। अंततः काल ने उसे अपने वश में कर लिया और तपस्या से पापों को नष्ट कर चुकी वह कन्या अपने आश्रम में ही मृत्यु को प्राप्त हुई। यह प्रसंग बताता है कि मनुष्य को केवल तप नहीं बल्कि भगवान के प्रति पूर्ण श्रद्धा और पुरुषोत्तम मास की महिमा को भी समझना चाहिए।
यज्ञकुण्ड से द्रौपदी का प्रकट होना
उसी समय धर्मात्मा राजा यज्ञसेन ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञकुण्ड से स्वर्ण के समान तेजस्वी एक दिव्य कन्या प्रकट हुई। वही कन्या आगे चलकर द्रुपदराज की पुत्री और संसार में द्रौपदी के नाम से प्रसिद्ध हुई। पूर्व जन्म में जो तपस्विनी कन्या थी, वही अगले जन्म में पांचाली बनी।
द्रौपदी का स्वयंवर अत्यंत प्रसिद्ध हुआ। अर्जुन ने मछली की आँख भेदकर द्रौपदी को प्राप्त किया और भीष्म, कर्ण सहित अनेक महान राजाओं को पराजित कर दिया। लेकिन जीवन में इतना वैभव और सम्मान मिलने के बाद भी द्रौपदी को अत्यंत भयंकर अपमान सहना पड़ा।
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द्रौपदी चीरहरण और श्रीकृष्ण की कृपा
महाभारत सभा में दुष्ट दुःशासन ने द्रौपदी के बाल पकड़कर उन्हें सभा में घसीटा और अपमानित किया। उस समय द्रौपदी ने सभी से सहायता मांगी लेकिन कोई भी उनकी रक्षा नहीं कर पाया। अंत में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को पुकारा।
द्रौपदी ने रोते हुए कहा — “हे दामोदर, हे दयासागर, हे कृष्ण, हे जगत्पति! मेरे माता-पिता, भाई, पति और संबंधी कोई भी मेरी रक्षा नहीं कर पा रहे हैं। अब केवल आप ही मेरे रक्षक हैं।”
श्रीकृष्ण ने बताया कि पहली पुकार में उन्होंने ध्यान नहीं दिया क्योंकि द्रौपदी ने पूर्व जन्म में पुरुषोत्तम मास की अवहेलना की थी। लेकिन जब द्रौपदी ने पूर्ण समर्पण और सच्चे प्रेम से भगवान को पुकारा, तब श्रीकृष्ण तुरंत गरुड़ पर सवार होकर पहुँचे और उनकी लाज बचाई। भगवान ने द्रौपदी को अनंत वस्त्र प्रदान किए और दुःशासन को अपमानित होना पड़ा।
यह प्रसंग भक्तों को सिखाता है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं, लेकिन पुरुषोत्तम मास और भगवान की महिमा का अनादर करने का परिणाम भी भुगतना पड़ता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताई पुरुषोत्तम मास की महिमा
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि पुरुषोत्तम मास मुनियों और देवताओं के लिए भी पूजनीय है। यह मास सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है। जो व्यक्ति श्रद्धा से इस मास में व्रत, पूजा और भक्ति करता है, उसे जीवन में सुख, समृद्धि और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
श्रीकृष्ण ने यह भी कहा कि उन्हें लक्ष्मीजी, बलरामजी या अन्य प्रियजनों से भी अधिक अपने भक्त प्रिय हैं। जो व्यक्ति भगवान के भक्तों को कष्ट देता है, वह भगवान को भी पीड़ा पहुँचाता है। इसलिए सदैव भक्तों का सम्मान करना चाहिए।
भगवान ने पाण्डवों को आश्वासन दिया कि द्रौपदी का अपमान करने वाले कौरवों का विनाश निश्चित है। आगे चलकर महाभारत युद्ध में यही हुआ और पाण्डवों को विजय प्राप्त हुई।
पाण्डवों ने किया पुरुषोत्तम मास का व्रत
जब श्रीकृष्ण द्वारका लौटने लगे तब पाण्डव अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि जैसे जल के बिना जीवित रहना संभव नहीं, वैसे ही श्रीकृष्ण के बिना उनका जीवन अधूरा है। भगवान ने उन्हें सांत्वना दी और द्वारका लौट गए।
इसके बाद राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। वे निरंतर श्रीकृष्ण के वचनों और पुरुषोत्तम मास की महिमा का स्मरण करते रहे। जब पुरुषोत्तम मास आया, तब पाण्डवों ने विधिपूर्वक व्रत और पूजा की। चौदह वर्ष पूरे होने पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें निष्कंटक राज्य की प्राप्ति हुई।
यह प्रसंग बताता है कि कठिन परिस्थितियों में भी जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम से भगवान की आराधना करता है, उसे अंततः सफलता और सम्मान अवश्य मिलता है।
राजा दृढ़धन्वा को मिला वैकुण्ठ लोक
इस अध्याय में सूर्यवंश के राजा दृढ़धन्वा का भी वर्णन मिलता है। उन्होंने श्रद्धा से पुरुषोत्तम मास का पालन किया। उसके प्रभाव से उन्हें अपार धन, पुत्र-पौत्र का सुख और जीवन के सभी भोग प्राप्त हुए। अंत में वे भगवान विष्णु के दुर्लभ वैकुण्ठ लोक को प्राप्त हुए।
यह कथा स्पष्ट करती है कि पुरुषोत्तम मास केवल सांसारिक सुख ही नहीं देता बल्कि मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
पुरुषोत्तम मास का अतुलनीय माहात्म्य
अंत में सूतजी कहते हैं कि पुरुषोत्तम मास का सम्पूर्ण माहात्म्य स्वयं भगवान नारायण ही जानते हैं। करोड़ों कल्पों तक भी इसकी महिमा का वर्णन पूर्ण रूप से नहीं किया जा सकता। देवता और ऋषि भी इसकी महिमा का अंत नहीं जानते। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक पुरुषोत्तम मास का पालन करे।
पुरुषोत्तम मास अध्याय 12 से मिलने वाली सीख
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का यह अध्याय भक्तों को कई महत्वपूर्ण संदेश देता है। भगवान अपने सच्चे भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं। पुरुषोत्तम मास का अपमान जीवन में दुःख का कारण बन सकता है, जबकि श्रद्धा से किया गया व्रत और पूजा मनुष्य को सुख, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करते हैं। द्रौपदी की कथा यह भी सिखाती है कि विपत्ति के समय केवल भगवान का सच्चा स्मरण ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा होता है।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य अध्याय 12 भगवान श्रीकृष्ण की भक्तवत्सलता, द्रौपदी की अटूट श्रद्धा और पुरुषोत्तम मास की दिव्य महिमा का अद्भुत वर्णन है। यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितने भी संकट आएं, यदि मनुष्य श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान का स्मरण करता है तो भगवान स्वयं उसकी रक्षा के लिए उपस्थित हो जाते हैं। इसलिए पुरुषोत्तम मास में व्रत, दान, कथा श्रवण और भगवान विष्णु की भक्ति अवश्य करनी चाहिए।
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