क्या आज के रिश्तों में अर्जुन जैसी त्याग भावना संभव है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 46 यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: |धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् || 46 || अर्थात अर्जुन कहते हैं, अगर यह हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पक्ष में जो है, वे लोग युद्ध भूमि में सामना नहीं करने वाले तथा शस्त्र रहित ऐसे मुझे मार भी डालें तो, वह मेरे लिए […]
क्या लोभ हमें अपनों की हत्या तक ले जा सकता है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 45 अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् |यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: || 45 || अर्थात अर्जुन कहते है,यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हमने घोर पाप करने का निश्चय कर लिया है, कि राज्य और सुख के लोभ में हम अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या करने पर उतारू […]
गीता के अनुसार कुलधर्म का विनाश कैसे पितरों के विनाश का कारण बनता है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 42 सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च |पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: || 42 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 42 Meaning अर्थात वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नर्क में ले जाने वाले ही होते हैं। श्राद्ध और तर्पण न मिलने से यह कुलघातियों के पितरों भी अपने स्थान से […]
क्या अधर्म से उत्पन्न होता है वर्णसंकर?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 41 अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय: |स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर: || 41 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 41 Meaning अर्थात अर्जुन कहते हैं हे कृष्ण! अधर्म बहुत ज्यादा बढ़ने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर उत्पन्न हो जाते […]
धर्म Vs ममता: अर्जुन क्यों नहीं करना चाहते थे युद्ध? अध्याय 1 श्लोक 36-37 In Hindi

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 36 37 निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन |पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: || 36 ||तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् |स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव || 37 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 36 37 Meaning अर्थात अर्जुन कहते हैं, हे जनार्दन! यह धृतराष्ट्र के संबंधी को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता होगी? […]
जब अपने ही विरोध में खड़े हों – अर्जुन की कहानी आज की कहानी क्यों है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 34 35 आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा: |मातुला: श्वशुरा: पौत्रा: श्याला: सम्बन्धिनस्तथा || 34 ||एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन |अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते || 35 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 34 35 Meaning अर्थात अर्जुन कहते है, आचार्य, पिता, पुत्र, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, साला तथा अन्य […]
अर्जुन ने क्यों त्याग दिए विजय और सुख की कामना?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 32 33 न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च |किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा || 32 ||येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च |त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च || 33 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 32 33 Meaning अर्थात अर्जुन कहते हैं, है […]
कुरुक्षेत्र में अर्जुन को क्यों नहीं दिख रहा था युद्ध में कोई लाभ?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 31 निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव |न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे || 31 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 31 Meaning अर्थात अर्जुन श्री कृष्ण जी से कहते हैं, हे केशव! में लक्षणों, शकुनों को भी विपरीत देख रहा हूं और युद्ध में स्वजनों को मार कर श्रेय (लाभ) […]
क्या अर्जुन का युद्ध न करने का विचार धर्म विरुद्ध था? गीता क्या कहती है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 26 27 तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थ: पितृ नथ पितामहान् |आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ न्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा || 26||श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि |तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान् || 27 ||कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् | Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 26 27 Meaning अर्थात उसके बाद पृथा नंदन अर्जुन ने दोनों सेना में खड़े पिता को, पितामह को, आचार्य को, मामा को, […]
अर्जुन का मोह जागृत करने के पीछे भगवान श्री कृष्ण का क्या उद्देश्य था?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 24 25 सञ्जय उवाच |एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत |सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् || 24 ||भीष्मद्रोणप्रमुखत: सर्वेषां च महीक्षिताम् |उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति || 25 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 24 25 Meaning अर्थात संजय बोले हे भरतवंशी राजन! निंद्रा विजय अर्जुन ने इस प्रकार(Shloka 23 में जो) कहा इसलिए, अंतर्यामी […]
भगवद गीता में अर्जुन के युद्ध से पहले के विचार क्या थे?

अर्जुन उवाच |सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत || 21|| यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् |कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे || 22|| Bhagavad Geeta Chapter 1 Shloka 21 22 Meaning अर्थात अर्जुन श्री कृष्ण से कहते हैं, हे अच्युत! दोनों सेनाओ की मध्य मे, मेरे रथ को आप वहां तक खड़ा रखो, जहां तक मैं युद्ध भूमि में खड़े यह युद्ध […]
हनुमान जी अर्जुन के रथ की ध्वजा पर क्यों विराजमान थे?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 20 अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वज: |प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव: ||20||हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते | Bhagavad Geeta Chapter 1 Shloka 20 Meaning अर्थात संजय कहते हैं, हे महिपति धृतराष्ट्र! अब जब शस्त्रों चलाने की तैयारी हो रही थी, उस समय अन्याय पूर्वक राज्य को धारण करने वाले, राजा और उनके साथदारो […]