Author name: Kajal Makwana

नमस्कार दर्शकों मित्रो मेरा नाम Kajal Makwana है, में एक ब्लॉगर और यूट्यूबर हूं, तथा में आध्यात्मिकता (Spirituality) की श्रेणी में कंटेंट लिखती हूं और यूट्यूब पर विडियोज भी बनाती हूं। मुझे सनातन धर्म के बारे में जानना, आध्यात्मिकता को गहराई से समझना और हमारे हिन्दू धर्म के शास्त्रों जैसे रामायण, महाभारत, श्रीमद भगवद गीता, पुराण, तथा वेदों को पढ़ना बहुत पसंद है। मेरा लक्ष्य है कि मेरे लेखों और वीडियो के माध्यम से आपको (दर्शकों) सच्ची आध्यात्मिकता का अनुभव करा सकू, और हम सब के मन में ईश्वर के प्रति प्रेम जागृत हो ऐसा कुछ कर सकू, तथा आध्यात्मिकता बढ़ने से समाज में शायद बुरे कर्म करने वाले कुछ समझे सके! और आने वाली पीढ़ी भी सनातन धर्म को गहराई से समझ सके। Follow me on: YouTube

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 5

श्रीकृष्ण को अपने सभी जन्म कैसे याद हैं? क्या हम भी जान सकते हैं अपने पूर्वजन्म?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 5 श्रीभगवानुवाचबहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप […]

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 4

क्या ईश्वर समय से परे होते हैं? अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा!

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 4 अर्जुन उवाचअपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥ अर्जुन बोले

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 3

क्या महिमा की चाह आज भी भक्त और भगवान के बीच दीवार बन रही है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 3 स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 2

क्या निःस्वार्थ सेवा ही सच्चा कर्मयोग है? श्रीमद्भगवदगीता अध्याय 4 श्लोक 2

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 2 एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥ २॥ अर्थात

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 1

क्या गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी परमात्मा की प्राप्ति संभव है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 1 श्रीभगवानुवाचइमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥ अर्थात भगवान ने कहा, “मैंने

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Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 42 43

क्या ‘काम’ रूपी शत्रु को हराने के लिए आत्म-नियंत्रण ही सबसे बड़ा अस्त्र है?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 42 43 इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन: |मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स: || 42 ||एवं

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Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 41

क्या इंद्रियों पर नियंत्रण ही कामनाओं के विनाश की पहली शर्त है?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 41 तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।पाप्मानं प्रजहि ह्यनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥ अर्थात भगवान कहते हैं,

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Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 40

क्या इन्द्रियाँ मन और बुद्धि ही काम का असली निवासस्थान हैं?

Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 40 इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥ अर्थात भगवान कहते हैं, इन्द्रियाँ,

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Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 39

क्या कामनाएं ही ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु हैं?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 39 आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥ अर्थात भगवान

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Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 38

क्या बढ़ती इच्छाएँ हमारे विवेक और आत्मिक विकास को रोक रही हैं?

Bhagavad gita Chapter 3 Verse 38 धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ अर्थात भगवान कहते हैं जैसे

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Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 37

क्या इच्छाएं ही हमारे सभी दुखों और पापों की जड हैं?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 37 श्रीभगवानुवाचकाम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥ श्री भगवान

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Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 36

क्या कोई अदृश्य शक्ति हमें पाप करने को मजबूर करती है?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 36 अर्जुन उवाचअथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६

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