समुद्र जैसा संयम कैसे लाएं जीवन में? भगवद गीता से सीख

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 70

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 70 आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत् |तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७०॥ अर्थात भगवान कहते हैं, जैसे सभी नदियों का जल सब ओर से जल से भरा हुआ समुद्र में जाकर मिलता है, परंतु समुद्र अपनी मर्यादा में अचल और भव्य बना रहता है, उसी प्रकार संयमी व्यक्ति को […]

Yogini ekadashi vrat ki katha in hindi – जानिए इस व्रत की रहस्यमयी पौराणिक कथा और महत्व

Yogini Ekadashi 2025

Yogini Ekadashi 2025 हर एकादशी का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व होता है, लेकिन योगिनी एकादशी को पाप नाशिनी और आरोग्यदायिनी एकादशी के रूप में पूजा जाता है। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है और इस दिन व्रत करने से पूर्व जन्मों के पापों का नाश होता है। इस एकादशी की […]

क्या यह संसार मात्र एक रात्रि की तरह क्षणिक है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 69 या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी |यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: || 69 || अर्थात भगवान कहते हैं, जिस रात्रि में (परमात्मा को छोड़कर) सभी मनुष्य रहते हैं, जिसमें संयमी व्यक्ति जागता है और जिसमें सामान्य मनुष्य भी जागते हैं (भोग और संग्रह में लगे रहते हैं), […]

इन्द्रियों को वश में करने से बुद्धि की स्थिरता कैसे प्राप्त होती है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 68 तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश: |इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 68 || अतः हे श्रेष्ठ! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ विषयों के द्वारा पूर्णतया वश में हो जाती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 68 Meaning in hindi मन और इन्द्रियों को वश में करने के […]

क्या असंयमित इंद्रियाँ हमारी बुद्धि को भटका देती हैं?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 67

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 67 इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते |तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि || 67 || अर्थात भगवान् कहते है, अपने-अपने विषयों में विचरण करने वाली इन्द्रियों में से केवल एक इन्द्रिय ही मन को अपना उत्तराधिकारी बनाती है। वही मन जल में बहने वाली वायु के समान बुद्धि को हर लेता है। Shrimad […]

क्या अशांत मन वाला व्यक्ति सच्चा सुख पा सकता है?

bhagavad Gita Chapter 2 Verse 66

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 66 नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् || 66 || अर्थात भगवान कहते हैं, जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ वश में नहीं होतीं, उन मनुष्यों की व्यवसायतमिका बुद्धि नहीं होती। व्यवसायतमिका बुद्धि नहीं होने से उन में कर्तव्य परायणता नहीं होती क्योंकि उनमें ऐसी भावना नहीं होती, […]

क्या राग-द्वेष से मुक्ति ही सच्चा सुख है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 64 65

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 64 65 रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् |आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति || 64 ||प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते |प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || 65 || अर्थात भगवान कहते हैं, राग-द्वेष से रहित, वश में किये हुए हृदय वाला कर्म योगी, वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करने पर भी हृदय के सुख को प्राप्त […]

क्या हमारे क्रोध का कारण हमारी इच्छाएँ हैं?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 62 63

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 62 63 ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते || 62 ||क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: |स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति || 63 || अर्थात भगवान कहते हैं, जो व्यक्ति वस्तुओं का चिंतन करता है, वह उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति विकसित करता है। आसक्ति से इच्छा उत्पन्न होती है। इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता […]

इंद्रियों को वश में करने का सही तरीका क्या है? गीता का दृष्टिकोण!

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 61

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 61 तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: |वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 61 || अर्थात भगवान कहते हैं कर्मयोगी साधकों को सारी इंद्रियों को वश में करके मेरे परायण होना चाहिए, क्योंकि जिनकी इंद्रियां वश में है, उनकी बुद्धि प्रतिष्ठित है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 61 […]

क्या साधक वास्तव में ‘इच्छा रहित’ हो सकता है? गीता क्या कहती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 58 59 60

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 58 59 60 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश: |इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 58 ||विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन: |रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || 59 ||यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित: |इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन: || 60 || अर्थात भगवान कहते हैं, जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट […]

क्या हमारे सुख-दुख की प्रतिक्रियाएं हमें अस्थिर बनाती हैं? गीता से जानें समाधान

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 57

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 57 य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् |नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 57 || अर्थात भगवान कहते हैं, सारी जगह पर आसकती रहित हुआ जो मनुष्य शुभ अशुभ को प्राप्त करके ना तो अभिनंदन होता है और ना तो द्वेष करता है उनकी बुद्धि प्रतिष्ठित है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 […]

क्या आप दुःख में भी शांत रह सकते हैं? गीता बताती है कैसे!

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 56

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 56 दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: |वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते || 56 || अर्थात श्री भगवान बोले, ध्यान करने वाले व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि उसका मन स्थिर होता है, जो दुख आने पर विचलित नहीं होता, सुख आने पर व्याकुल नहीं होता तथा जो आसक्ति, भय और क्रोध से पूरी […]