राग भय और क्रोध से मुक्त होकर ईश्वर को कैसे पाया जा सकता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 10 वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ।।१०।। अर्थात भगवान कहते हैं, राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित मेरे में ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञान रूपी तप से पवित्र हुए कितने ही भक्त मेरे भाव (स्वरूप) को प्राप्त हो चुके हैं। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 […]
भगवान के दिव्य जन्म और कर्म को जानने से क्या होता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 9 जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार जो पुरुष (मेरे जन्म और कर्मों को) तत्त्व सहित जानता है, अर्थात् उनमें दृढ़ विश्वास रखता है, […]
क्या भगवान हर युग में अवतार लेते हैं धर्म की स्थापना के लिए?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 8 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥ ८॥ अर्थात भगवान कहते हैं, मैं संतों (भक्तों) की रक्षा करने, पापियों का विनाश करने तथा धर्म की स्थापना करने के लिए युग-युग में प्रकट होता हूँ। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 8 Meaning in Hindi अगर […]
भगवान कब लेते हैं अवतार? जानिए गीता का रहस्य, अध्याय 4 श्लोक 7

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 7 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे भरतपुत्र अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं साकार रूप में प्रकट होता हूँ। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 7 Meaning in Hindi […]
ईश्वर अजन्मा होकर भी क्यों प्रकट होते हैं? जानें योगमाया का रहस्य

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 6 अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥ श्री भगवान बोले यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी तथा समस्त प्राणियों का स्वामी हूँ, तथापि मैं अपनी प्रकृति को वश में करके अपनी योगमाया से स्वयं को प्रकट करता हूँ। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 6 Meaning in Hindi ईश्वर […]
श्रीकृष्ण को अपने सभी जन्म कैसे याद हैं? क्या हम भी जान सकते हैं अपने पूर्वजन्म?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 5 श्रीभगवानुवाचबहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥ श्री भगवान बोले – हे परंतप अर्जुन! तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं। मैं उन सबको जानता हूँ, परन्तु तुम नहीं जानते। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 5 Meaning in Hindi […]
क्या ईश्वर समय से परे होते हैं? अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा!

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 4 अर्जुन उवाचअपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥ अर्जुन बोले – आपका जन्म तो अभी हुआ है और सूर्य का जन्म तो बहुत प्राचीन है। अतः मैं यह कैसे समझूँ कि सृष्टि के आरंभ में आपने ही सूर्य को यह योग दिया था? shrimad Bhagavad […]
क्या महिमा की चाह आज भी भक्त और भगवान के बीच दीवार बन रही है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 3 स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३॥ अर्थात भगवान अर्जुन को कहते हैं, तुम मेरे भक्त और प्रिय मित्र हो, इसीलिए मैंने आज तुम्हें यह प्राचीन योग बताया है, क्योंकि यह महान् एवं उत्तम रहस्य है। shrimad Bhagavad Gita Chapter […]
क्या निःस्वार्थ सेवा ही सच्चा कर्मयोग है? श्रीमद्भगवदगीता अध्याय 4 श्लोक 2

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 2 एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥ २॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे परंतप! इस प्रकार राजर्षियों को परम्परा से प्राप्त इस योग का ज्ञान हुआ। किन्तु बहुत समय बीत जाने के कारण वह योग इस मानव लोक में लुप्त हो गया। shrimad Bhagavad […]
क्या गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी परमात्मा की प्राप्ति संभव है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 1 श्रीभगवानुवाचइमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥ अर्थात भगवान ने कहा, “मैंने स्वयं यह अविनाशी योग सूर्य को बताया था। फिर सूर्य ने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनु को बताया, और मनु ने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकु को बताया।” shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 1 Meaning in […]
क्या ‘काम’ रूपी शत्रु को हराने के लिए आत्म-नियंत्रण ही सबसे बड़ा अस्त्र है?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 42 43 इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन: |मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स: || 42 ||एवं बुद्धे: परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना |जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् || 43 || अर्थात भगवान कहते हैं, इन्द्रियाँ (शरीर से ऊपर) सबसे श्रेष्ठ, सबसे बलवान, सबसे तेजस्वी, सबसे विस्तृत और सबसे सूक्ष्म कही गई हैं। इन्द्रियों […]
क्या इंद्रियों पर नियंत्रण ही कामनाओं के विनाश की पहली शर्त है?

Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 41 तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।पाप्मानं प्रजहि ह्यनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥ अर्थात भगवान कहते हैं, अतः हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! तुम्हें पहले अपनी इन्द्रियों को वश में करके इस महापापी काम को, जो ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाला है, उसे बलपूर्वक मार डालना चाहिए। shrimad Bhagavad Gita Chapter 3 […]