परम सुख कैसे पाएं? गीता का रहस्य जो हर दुःख में रखे अडिग

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 22

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 22 यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥२२॥ अर्थात जो लाभ की प्राप्ति होते ही उनसे अधिक दूसरा कोई लाभ उनको मानने मे भी नहीं आता और जिसमें स्थित होते ही बहुत ही ज्यादा दुख से भी विचलित नहीं होता। Shrimad Bhagavad Gita […]

गीता में दीपक की लौ का उदाहरण क्या सिखाता है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 19

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 19 यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥१९॥ जैसे स्थिर हवा वाली जगह पर दीपक की लौ निराकार हो जाती है, वैसे ही योग के अभ्यास से मन पर विजय पाने वाले योगी का मन भी निराकार हो जाता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 […]

कब कहा जाता है कि साधक वास्तव में योगी बन गया?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 18

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 18 यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥१८॥ जब शांत मन अपने स्वरूप में स्थिर हो जाता है और सभी चीज़ों से अलग हो जाता है, उस समय उसे योगी कहा जाता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 18 Meaning in hindi वश में किया हुआ चित्त […]

ध्यान में नाक के अग्रभाग पर दृष्टि रखने का क्या अर्थ है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 13

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 13 समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥१३॥ शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और स्थिर रखते हुए स्थिर बैठें, और किसी भी दिशा में न देखें, केवल अपनी नाक के आगे के हिस्से को देखें। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 13 Meaning in hindi ध्यान […]

ध्यान का आसन न ज्यादा ऊंचा और न ज्यादा नीचा क्यों होना चाहिए?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 11

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 11 शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ।।११।। शुद्ध भूमि ऊपर जिसके ऊपर क्रमस: दर्भ, मृगचर्म, और वस्त्र बीछे हुए हो, जो ना अत्यंत ऊंचा हो, और न जो अत्यंत नीचा हो, वे अपने आसन का स्थिर स्थापन करके. Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 11 Meaning in […]

काम करते समय भगवान का चिंतन क्यों आवश्यक है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 10

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 10 योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१०॥ जो योगी सुख की बुद्धि से संग्रह नहीं करता, जो इच्छाओं से मुक्त है और जो अपने विवेक और शरीर को नियंत्रित करता है, उसे एकांत में बैठकर लगातार अपने मन को परमात्मा से जोड़ना चाहिए। Shrimad Bhagavad Gita […]

सभी लोगों के प्रति समबुद्धि क्यों आवश्यक है? गीता के इस उपदेश का क्या रहस्य है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9 सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥ श्रुहद, मित्र, वेरी, उदासीन, मध्यस्थी, द्वेशी और संबंधियों में तथा साधु आचरण करने वाले में और पाप आचरण करने वालों में भी समान बुद्धि वाला मनुष्य श्रेष्ठ है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9 Meaning in hindi गीता के अनुसार मित्र, शत्रु […]

क्या मिट्टी–पत्थर–सोने को समान देखने वाला ही योग में स्थित होता है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 8

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 8 ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥८॥ जिनका अंत:करण ज्ञान विज्ञान द्वारा तृप्त है, जो ऐरन की तरह निर्वाकर है, जितेंद्रिय है, और मिट्टी के ढीफे, पत्थर तथा सुवर्ण में सम बुद्धि वाला है, ऐसे योगी युक्त योगरूढ़ कहा जाता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse […]

क्या स्वयं को जीतना ही सच्ची आध्यात्मिक विजय है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 6

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 6 बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६॥ जिसने खुद को जीत लिया है, उसके लिए वह खुद ही अपना भाई है, और जिसने खुद को नहीं जीता है, उसके लिए ऐसी आत्मा जो खुद नहीं है, दुश्मन की तरह दुश्मनी करती है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse […]

क्या सच में इंसान स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु होता है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 5

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 5 उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥ खुद के ज़रिए खुद को बचाना। खुद को खत्म नहीं करना, क्योंकि खुद ही अपना दोस्त और खुद ही अपना दुश्मन है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 5 Meaning in hindi आज की जिंदगी में खुद को कैसे संभालें? क्या […]

क्या आसक्ति-मुक्त जीवन ही सच्चे योग की पहचान है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 4

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 4 यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥४॥ अर्थात भगवान कहते हैं, जिस समय कोई न तो इंद्रियों के सुखों में और न ही कर्मों में आसक्त होता है, उस समय, सभी इच्छाओं को त्याग देने वाले व्यक्ति को योगी कहा जाता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 […]

Bhagavad Gita – क्या निष्काम कर्म से ही योग मिलता है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 3

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 3 आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव ‘शमः कारणमुच्यते ॥३॥ जो ध्यान करने वाला योगी योग (समता) पाना चाहता है, उसके लिए अपने कर्तव्य करना ही साधन है, और उस योगी व्यक्ति की शांति (सम) परमात्मा को पाने का साधन है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 3 Meaning in […]