
Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 33
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥
अर्थात भगवान कहते हैं, हे अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ हैं, सारे कर्मों और पदार्थ ज्ञान (तत्व ज्ञान) में समाप्त हो जाते हैं।
shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 33 Meaning in Hindi
भगवद गीता में ज्ञानयज्ञ को सर्वोत्तम क्यों कहा गया है?
–श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप
जिस यज्ञों में द्रव्यों पदार्थ तथा कर्मों की आवश्यकता रहती है वे सभी यज्ञ द्रव्यमय होते हैं द्रव्य शब्द के साथ में प्रत्यय प्रचुरता का अर्थ है जिस तरह मिट्टी के प्रधान वाले पात्र को मृण्मय कहलाता है वैसे ही द्रव्य के प्रधान वाले यज्ञ द्रव्यमय कहलाते हैं ऐसे द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि ज्ञानयज्ञ में द्रव्य और कर्म की आवश्यकता नहीं होती।
भगवान ने सभी यज्ञों को कर्मजन्य कहा है। यहाँ भगवान कहते हैं कि ज्ञानयज्ञ में सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् ज्ञानयज्ञ कर्मजन्य नहीं, अपितु विवेकविचारजन्य है। अतः यहाँ जिस ज्ञानयज्ञ का उल्लेख है, वह पूर्व वर्णित बारह यज्ञों के अंतर्गत आने वाला ज्ञानयज्ञ नहीं, अपितु अगले (चौंतीसवें) श्लोक में वर्णित ज्ञानप्राप्ति की प्रचलित प्रक्रिया का यज्ञ है। पूर्व वर्णित बारह यज्ञों का यज्ञ यहाँ द्रव्यमय यज्ञ’ है। द्रव्ययज्ञ पूर्ण होने के बाद ही ज्ञानयज्ञ किया जाता है।
सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो ज्ञानयज्ञ भी कर्मजन्य है, किन्तु उसमें विवेक की प्रधानता रहती है।
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ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु के पास जाना क्यों आवश्यक है?
–सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते
जब तक व्यक्ति अपने लिए कर्म करता है, तब तक उसका कर्मों और विषयों के साथ संबंध बना रहता है। जब तक कर्मों और विषयों के साथ संबंध रहता है, तब तक मन में अशुद्धि रहती है, अतः अपने लिए कर्म न करने से ही मन शुद्ध होता है।
मन में तीन दोष होते हैं—मलिनता (संचित पाप), विक्षेप (मन का चंचल होना) और आवरण (अज्ञान)। अपने लिए कोई कर्म न करने से, अर्थात् केवल संसार की सेवा के लिए कर्म करने से, जब साधक के मन में स्थित मलिनता और विक्षेप दोनों दोष दूर हो जाते हैं, तब वह कर्म रूप का त्याग कर देता है और ज्ञान प्राप्ति द्वारा आवरण दोष दूर करने के लिए गुरु के पास जाता है। उस समय वह कर्म और विषयों से परे हो जाता है, अर्थात् कर्म और विषय उसका लक्ष्य नहीं रह जाते, प्रत्युत एक शाश्वत तत्व ही उसका लक्ष्य रह जाता है। इसे ही तत्व के ज्ञान में समस्त कर्मों और विषयों का निरोध कहते हैं।
अर्जुन अपना कल्याण चाहता है, इसीलिए कल्याण प्राप्ति के विभिन्न साधनों को यज्ञ रूप से वर्णन करके अब भगवान ज्ञान यज्ञ द्वारा तत्वज्ञान प्राप्त करने की प्रचलित प्रणाली का वर्णन करते हैं।









