
Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 15
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥१५॥
नियत मन वाला योगी मन को इस तरह सदा परमात्मा में लगाकर मुझ में सम्यक स्थिति वाली जो परम निर्माण शांति हैं उसे प्राप्त हो जाता है।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 15 Meaning in hindi
क्या केवल ध्यान से परमात्मा की प्राप्ति संभव है?
–योगी नियतमानसः
मन पर जिसका अधिकार है, वह ‘नियत:’ है। साधक ‘नियतमानस’ तब बन सकता है, जब उसका लक्ष्य केवल परमात्मा हो। परमात्मा के अलावा उसका किसी और से कोई संबंध नहीं होता। क्योंकि जब तक संसार से उसका संबंध बना रहता है, तब तक उसका मन नियत: नहीं बन सकता।
साधक यह बड़ी गलती करता है कि वह अपने आपको गृहस्थ आदि मान लेता है और ध्यान को साधन बना लेता है, जिससे ध्यान की सिद्धि जल्दी नहीं होती। इसलिए साधक को अपने आपको गृहस्थ, साधु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि नहीं मानना चाहिए और यह मानना चाहिए कि ‘मैं केवल ध्यानी हूँ। मेरा काम ध्यान के द्वारा परमात्मा को पाना है। मेरा उद्देश्य सांसारिक उपलब्धियाँ आदि पाना नहीं है।’ इस तरह जब अहंकार बदल जाएगा, तो मन स्वाभाविक रूप से नियत: हो जाएगा, क्योंकि जहाँ अहंकार होता है, वहाँ आत्मनिरीक्षण और बहिर्मुखता की स्वाभाविक क्रिया होती है।
परमात्मा से जुड़ने का सही तरीका क्या है?
–युञ्जन्नेवं सदात्मानं
तात्पर्य यह है, कि व्यक्ति को अपने आप को संसार से अलग कर लेना चाहिए और परमात्मा से जुड़ते रहना चाहिए। ‘सदा’ का अर्थ है कि व्यक्ति को प्रतिदिन नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। कभी योग का अभ्यास करना और कभी नहीं करना—ऐसा करने से ध्यान की सिद्धि जल्दी नहीं होती। दूसरा अर्थ है कि परमात्मा को पाने के लक्ष्य को एकांत में या अभ्यास में निरंतर जारी रखना चाहिए।
परम शांति और सामान्य शांति में क्या अंतर है?
–शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति
भगवान में असली हालत, जो मिल जाती है और पाने के लिए कुछ नहीं बचता, उसे यहाँ ‘परम निर्वाण शांति’ कहा गया है। ध्यान करने वाला ऐसी परम निर्वाण शांति पाता है।
एक ‘निर्विकल्प स्थिति’ और एक ‘निर्विकल्प बोध’ होता है। ध्यान में पहले निर्विकल्प स्थिति होती है, फिर उसके बाद निर्विकल्प बोध होता है। इसी निर्विकल्प बोध को यहाँ ‘परम निर्वाण शांति’ कहा गया है।
शांति दो प्रकार की होती हैं शांति और परम शांति संसार के त्याग (संबंध विच्छेद) से शांति होती हैं और परमात्मा की प्राप्ति होते ही परम शांति होती है।
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FAQs
ध्यान में सबसे बड़ी बाधा क्या है?
स्वयं को गृहस्थ, साधु या किसी सामाजिक पहचान से जोड़ना सबसे बड़ी बाधा है। अहंकार के कारण मन नियत नहीं हो पाता।
परम शांति और सामान्य शांति में क्या अंतर है?
संसार के त्याग से मिलने वाली शांति अस्थायी होती है, जबकि परमात्मा की प्राप्ति से मिलने वाली शांति परम निर्वाण शांति होती है।
निर्विकल्प स्थिति और निर्विकल्प बोध में क्या अंतर है?
ध्यान में पहले निर्विकल्प स्थिति आती है और उसके बाद निर्विकल्प बोध होता है। यही निर्विकल्प बोध परम निर्वाण शांति है।









