श्रद्धा और संयम से कैसे मिलती है परम शांति?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 39 श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥३९॥ अर्थात भगवान कहते हैं, श्रद्धावान, बुद्धिमान और साधन संपन्न व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान प्राप्त कर लेने पर उसे तुरन्त परम शांति प्राप्त हो जाती है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 39 Meaning in Hindi क्या […]
Ramayana: Myth or History? भारत के मंदिरों में छिपा सच!

रामायण केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति और जीवनशैली का आधार भी है। यह प्रश्न आज भी लोगों के मन में बना हुआ है कि क्या रामायण केवल एक कथा है या यह वास्तव में घटित हुई घटनाओं का विवरण है। भारत के कई प्राचीन मंदिर और स्थल आज भी Ramayana की […]
Bhadrapada Purnima 2025: तिथि शुभ मुहूर्त चंद्रग्रहण का समय और धार्मिक महत्व

भाद्रपद पूर्णिमा 2025: तिथि शुभ मुहूर्त चंद्रग्रहण का समय और धार्मिक महत्व हिंदू पंचांग में प्रत्येक पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है, लेकिन भाद्रपद पूर्णिमा का स्थान और भी खास माना गया है। इस वर्ष 2025 में Bhadrapada Purnima का पर्व 07 सितंबर, रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन धार्मिक दृष्टि से कई महत्वपूर्ण […]
क्या यज्ञ दान और तप से बढ़कर ज्ञान पवित्र है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 38 न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥३८॥ अर्थात भगवान कहते हैं, इस मानव जगत में ज्ञान के समान शुद्धि का कोई अन्य साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो चुका है (कर्मयोगी) वह अपने भीतर स्थित उस तत्व का ज्ञान अवश्य प्राप्त कर […]
क्या ज्ञानरूपी अग्नि सभी पाप और कर्मों को जला सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 37 यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते ऽर्जुन ।ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥३७॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे अर्जुन! जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधन को पूर्णतः भस्म कर देती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि समस्त कर्मों को पूर्णतः भस्म कर देती है। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 37 Meaning in Hindi क्या ज्ञानरूपी […]
क्या ज्ञान से सभी पाप नष्ट हो सकते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 36 अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥३६॥ अर्थात भगवान अर्जुन को कहते हैं, यदि तुम सभी पापियों से भी अधिक पापी हों, तो भी आप ज्ञान की नाव से पाप सागर को आसानी से पार कर लेंगे। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 36 Meaning in […]
गीता के अनुसार आत्मज्ञान से परमात्मा का अनुभव कैसे होता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 35 यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥३५॥ अर्थात भगवान कहते हैं, जो (तत्वज्ञान) का अनुभव करके तू फिर कभी इस प्रकार मोहित नहीं होगा और हे अर्जुन! इस (ज्ञान) के द्वारा तू सर्वथा अपने में और फिर मुझ सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा में बिना किसी अपवाद के […]
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गुरु से ज्ञान प्राप्त करने की सलाह क्यों दी?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 34 तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४॥ अर्थात भगवान कहते हैं, उस (तत्वज्ञान) को (तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों के पास जाकर) समझो। उन्हें दण्डवत् प्रणाम करने, उनकी सेवा करने और उनसे सरलतापूर्वक प्रश्न पूछने से वे तत्त्वज्ञान के ज्ञाता, ज्ञानी महापुरुष तुम्हें उस तत्वज्ञान का उपदेश देंगे। […]
भगवद गीता में ज्ञानयज्ञ को सर्वोत्तम क्यों कहा गया है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 33 श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानमय यज्ञ श्रेष्ठ हैं, सारे कर्मों और पदार्थ ज्ञान (तत्व ज्ञान) में समाप्त हो जाते हैं। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 33 Meaning in Hindi भगवद गीता में ज्ञानयज्ञ को सर्वोत्तम […]
भगवद गीता में यज्ञ को मोक्ष का साधन क्यों कहा गया है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 32 एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२॥ अर्थात भगवान कहते हैं, इस प्रकार वेदों में अन्य अनेक प्रकार के यज्ञों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। उन सभी यज्ञों को तू कर्म-संबंधी जान। ऐसा जानकर, यज्ञों को करने से तू (कर्म के बंधन […]
गीता के अनुसार यज्ञशिष्टामृतभुजः श्लोक का क्या अर्थ है और यज्ञ क्यों आवश्यक है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 31 यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥३१॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! जो लोग यज्ञ से बचे हुए अमृत का आस्वादन करते हैं, वे सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह मनुष्य लोक भी सुखदायी नहीं […]
गीता में प्राणायाम रूपी यज्ञ क्या है और इससे पाप कैसे नष्ट होते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 29 30 अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥२९॥अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥३०॥ अर्थात भगवान कहते हैं, अन्य अनेक योगी जो प्राणायाम के अभ्यस्त हो गए हैं, वे अपान में प्राण की पूर्ति करते हैं, प्राण और अपान की गति को रोकते हैं, और […]