Kawad Yatra 2025: कब शुरू होगी कांवड़ यात्रा? 10 या 11 जुलाई, जानिए सही तिथि और धार्मिक महत्व
हर वर्ष सावन माह में आयोजित होने वाली कांवड़ यात्रा शिवभक्तों की आस्था और भक्ति का अद्भुत उदाहरण होती है। […]
हर वर्ष सावन माह में आयोजित होने वाली कांवड़ यात्रा शिवभक्तों की आस्था और भक्ति का अद्भुत उदाहरण होती है। […]
भौम प्रदोष व्रत (Bhaum Pradosh Vrat 2025) भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत शुभ
Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 16 एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य: |अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति || 16 || अर्थात
क्या बिना ज़िम्मेदारी निभाए जीना बेकार है? जानिए गीता का नजरिया Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 14 15 अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव: |यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव: || 14 ||कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्
क्या हमारे कर्म से होती है वर्षा? जानिए गीता के सृष्टि चक्र का रहस्य Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 13 यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: |भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् || 13 || अर्थात
क्या केवल अपने लिए कर्म करना पाप है? श्रीकृष्ण का गूढ़ उत्तर Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 12 इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता: |तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स: || 12 ||
क्या ईश्वर से मिली चीजे सिर्फ अपने लिए उपयोग करना पाप है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 10 11 सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: |अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् || 10 ||देवान्भावयतानेन ते देवा
कैसे ब्रह्माजी के नियम से मिलता है जीवन का उद्देश्य? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 9 यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: |तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर || 9 || अर्थात भगवान कहते
क्या बिना स्वार्थ के काम करना आज भी जरूरी है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 8 नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: | शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: ||
क्या कर्म किए बिना जीवन संभव है? गीता का उत्तर क्या है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 3 Shloka 7 यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन |कर्मेन्द्रियै: कर्मयोगमसक्त: स विशिष्यते || 7 || अर्थात भगवान कहते हैं,
क्या मन से इन्द्रियों को वश में कर कर्म करना ही सच्चा योग है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 3 Verse 6 कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् |इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते || 6 || अर्थात
क्या केवल मन में भोग की कल्पना करना भी पाप है? Read Post »
Bhagavad gita Chapter 3 Verse 5 न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: || 5 || अर्थात
क्या मनुष्य बिना कर्म के रह सकता है? Read Post »