क्या अर्जुन का युद्ध से इनकार सही था?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 6

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 6 न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयोयद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: |यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: || 6 || अर्थात् अर्जुन कहते है, हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना श्रेष्ठ है या न करना! और हम यह भी नहीं जानते कि हम उन्हें हरा देंगे या […]

क्यों अर्जुन ने भिक्षा को गुरुओं की हत्या से श्रेष्ठ माना?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 5

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 5 गुरूनहत्वा हि महानुभावान्श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैवभुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || 5 || अर्थात अर्जुन कहते हैं, महानुभाव गुरु जनों को न मारकर में भिक्षा का अन्न खाना भी कल्याण कारक मानता हूं! गुरुजनों को मार कर यहां खून से सना देखकर तथा धन की कामना के मुख्यता वाले […]

क्या अर्जुन की तरह हम भी अपनों के खिलाफ फैसले लेने से डरते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 4

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 4 अर्जुन उवाच |कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन |इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || 4 || अर्थातअर्जुन बोले – हे मधुसूदन! मैं युद्धस्थल में बाणों द्वारा भीष्म और द्रोण से कैसे लड़ सकता हूँ? क्योंकि, हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 4 Meaning in […]

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को नपुंसकता क्यों कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 3

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 3 क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते |क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || 3 || अर्थात भगवान कहते है, हे पृथानन्दन प्रिय अर्जुन! इस नपुंसकता को प्राप्त मत हो, क्योंकि यह आपके लिए सही नहीं है. हे परंतप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग दो और युद्ध के लिए खडे […]

क्या कायरता धर्म स्वर्ग और यश से वंचित कर सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 2

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 2 श्रीभगवानुवाच |कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || 2 || अर्थात श्री भगवान बोले – हे अर्जुन! इस विचित्र अवसर पर तुम्हारे अन्दर यह कायरता कहाँ से आ गयी, जिसका आचरण श्रेष्ठ पुरुष नहीं करते, जो स्वर्ग की प्राप्ति नहीं कराती तथा जो यश भी नहीं देती. Shrimad Bhagavad Gita […]

अर्जुन की करुणा देख श्रीकृष्ण ने क्या कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 1

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 1 सञ्जय उवाच |तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् |विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: || 1 || अर्थात संजय बोले – उस कायरता से घिरे हुए, पश्चाताप करने वाले तथा आँसुओं से अन्धकारमय हो रहे नेत्रों वाले अर्जुन से भगवान मधुसूदन ने ये वचन (आगे कहे जाने वाले) कहे। Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 1 […]

क्या मोह ने अर्जुन को वीर से वैरागी बना दिया?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 47

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 47 सञ्जय उवाच |एवमुक्त्वार्जुन: सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् |विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस: || 47 || अर्थात संजय बोले, ऐसा कह कर शौक से व्याकुल मन वाले अर्जुन तीर सहित धनुष्य का त्याग करके युद्ध भूमि में रथ के मध्य भाग में बैठ गए। Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 47 Meaning in […]

क्या आज के रिश्तों में अर्जुन जैसी त्याग भावना संभव है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 46

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 46 यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: |धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् || 46 || अर्थात अर्जुन कहते हैं, अगर यह हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पक्ष में जो है, वे लोग युद्ध भूमि में सामना नहीं करने वाले तथा शस्त्र रहित ऐसे मुझे मार भी डालें तो, वह मेरे लिए […]

क्या लोभ हमें अपनों की हत्या तक ले जा सकता है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 45

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 45 अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् |यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता: || 45 || अर्थात अर्जुन कहते है,यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हमने घोर पाप करने का निश्चय कर लिया है, कि राज्य और सुख के लोभ में हम अपने ही सगे-संबंधियों की हत्या करने पर उतारू […]

क्या कुलधर्म और जातिधर्म का नाश मनुष्य को नरक की ओर ले जाता है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 43 44

दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकै: |उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता: || 43 ||उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन |नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम || 44|| Shrimad Bhagavad Geeta Chapter 1 Shloka 43, 44 Meaning अर्थात ऐसे वर्णसंकर उत्पन्न करने वाले पाप से कुल-हत्यारों के सदा से चलते आये सनातन कुलधर्म और जाति-धर्म नाश पामेंगे। हे जनार्दन! हमने सुना है कि जिनके कुलधर्म नष्ट […]

गीता के अनुसार कुलधर्म का विनाश कैसे पितरों के विनाश का कारण बनता है?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 42

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 42 सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च |पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: || 42 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 42 Meaning अर्थात वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नर्क में ले जाने वाले ही होते हैं। श्राद्ध और तर्पण न मिलने से यह कुलघातियों के पितरों भी अपने स्थान से […]

क्या अधर्म से उत्पन्न होता है वर्णसंकर?

Bhagavad Gita Chapter 1 Verse 41

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 41 अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय: |स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्कर: || 41 || Shrimad Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 41 Meaning अर्थात अर्जुन कहते हैं हे कृष्ण! अधर्म बहुत ज्यादा बढ़ने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर उत्पन्न हो जाते […]