कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है – ज्ञानयोग या कर्मयोग?

Bhagavad gita Chapter 3 Verse 3 श्रीभगवानुवाच |लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ |ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् || 3 || अर्थात भगवान ने कहा, “हे निष्पाप अर्जुन! मैंने पहले ही इस मानव संसार में होने वाली दो प्रकार की निष्ठाओं का उल्लेख किया है। उनमें से, ज्ञानी की निष्ठा ज्ञानयोग से होती है और योगियों की […]
अगर ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर कर्म क्यों करें?

Bhagavad gita Chapter 3 Verse 1 and 2 अर्जुन उवाच |ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन |तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव || 1 ||व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे |तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् || 2 || अर्जुन ने कहा – हे जनार्दन! यदि आप बुद्धि (ज्ञान) को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो हे केशव! आप […]
Ashadha Amavasya Vrat Katha 2025: पूजा विधि, महत्व और शुभ मुहूर्त

आषाढ़ अमावस्या हिंदू धर्म में पितृ तर्पण और नए शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए एक अत्यंत पवित्र तिथि मानी जाती है। 2025 में आषाढ़ अमावस्या बुधवार, 25 जून को मनाई जाएगी। इस दिन व्रत रखकर विधिपूर्वक पूजा करने से पितरों को शांति प्राप्त होती है और घर में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन […]
Som Pradosh Vrat Katha 2025: पूजा विधि और महत्व

सोम प्रदोष व्रत हिंदू धर्म के सबसे पवित्र व्रतों में से एक है, जो भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। यह व्रत हर महीने के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी (13वीं तिथि) को मनाया जाता है। जून 2025 का यह अंतिम सोम प्रदोष व्रत है, जिसमें व्रत रखने और कथा सुनने से […]
क्या अंतिम समय में भी शांति पाई जा सकती है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 72 एषा ब्राह्मी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति |स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति || 72 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पृथानंदन! यह ब्रह्म अवस्था है। इसे प्राप्त करके कोई कभी आसक्त नहीं होता। यदि अंत में भी कोई इसी अवस्था में रहे, तो उसे निर्वाण (शांति) ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है। […]
निर्मम निरहंकारी और नि:स्पृह व्यक्ति ही क्यों पाता है शांति?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 71 विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह: |निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति || 71 || अर्थात भगवान कहते हैं, जो व्यक्ति सभी इच्छाओं का त्याग कर देता है और बिना किसी भय, अहंकार और आसक्ति के चलता है, वह शांति प्राप्त करता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 71 Meaning in hindi […]
समुद्र जैसा संयम कैसे लाएं जीवन में? भगवद गीता से सीख

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 70 आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत् |तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७०॥ अर्थात भगवान कहते हैं, जैसे सभी नदियों का जल सब ओर से जल से भरा हुआ समुद्र में जाकर मिलता है, परंतु समुद्र अपनी मर्यादा में अचल और भव्य बना रहता है, उसी प्रकार संयमी व्यक्ति को […]
Yogini ekadashi vrat ki katha in hindi – जानिए इस व्रत की रहस्यमयी पौराणिक कथा और महत्व

Yogini Ekadashi 2025 हर एकादशी का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व होता है, लेकिन योगिनी एकादशी को पाप नाशिनी और आरोग्यदायिनी एकादशी के रूप में पूजा जाता है। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है और इस दिन व्रत करने से पूर्व जन्मों के पापों का नाश होता है। इस एकादशी की […]
क्या यह संसार मात्र एक रात्रि की तरह क्षणिक है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 69 या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी |यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: || 69 || अर्थात भगवान कहते हैं, जिस रात्रि में (परमात्मा को छोड़कर) सभी मनुष्य रहते हैं, जिसमें संयमी व्यक्ति जागता है और जिसमें सामान्य मनुष्य भी जागते हैं (भोग और संग्रह में लगे रहते हैं), […]
इन्द्रियों को वश में करने से बुद्धि की स्थिरता कैसे प्राप्त होती है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 68 तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश: |इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 68 || अतः हे श्रेष्ठ! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ विषयों के द्वारा पूर्णतया वश में हो जाती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 68 Meaning in hindi मन और इन्द्रियों को वश में करने के […]
क्या असंयमित इंद्रियाँ हमारी बुद्धि को भटका देती हैं?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 67 इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते |तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि || 67 || अर्थात भगवान् कहते है, अपने-अपने विषयों में विचरण करने वाली इन्द्रियों में से केवल एक इन्द्रिय ही मन को अपना उत्तराधिकारी बनाती है। वही मन जल में बहने वाली वायु के समान बुद्धि को हर लेता है। Shrimad […]
क्या अशांत मन वाला व्यक्ति सच्चा सुख पा सकता है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 66 नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना |न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् || 66 || अर्थात भगवान कहते हैं, जिस व्यक्ति की इन्द्रियाँ वश में नहीं होतीं, उन मनुष्यों की व्यवसायतमिका बुद्धि नहीं होती। व्यवसायतमिका बुद्धि नहीं होने से उन में कर्तव्य परायणता नहीं होती क्योंकि उनमें ऐसी भावना नहीं होती, […]