Bhagavad Gita

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 12

ध्यान में मन और इंद्रियों को एकाग्र क्यों करना चाहिए?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 12 तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥१२॥ उस आसन पर बैठकर मन को […]

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 11

ध्यान का आसन न ज्यादा ऊंचा और न ज्यादा नीचा क्यों होना चाहिए?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 11 शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ।।११।। शुद्ध भूमि ऊपर जिसके ऊपर

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 10

काम करते समय भगवान का चिंतन क्यों आवश्यक है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 10 योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥१०॥ जो योगी सुख की

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9

सभी लोगों के प्रति समबुद्धि क्यों आवश्यक है? गीता के इस उपदेश का क्या रहस्य है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 9 सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥ श्रुहद, मित्र, वेरी, उदासीन, मध्यस्थी, द्वेशी और संबंधियों

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 8

क्या मिट्टी–पत्थर–सोने को समान देखने वाला ही योग में स्थित होता है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 8 ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥८॥ जिनका अंत:करण ज्ञान विज्ञान द्वारा

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 7

मान-अपमान को समान भाव से कैसे स्वीकारें? गीता क्या सिखाती है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 7 जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥७॥ जिसने अपने आप पर विजय

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 6

क्या स्वयं को जीतना ही सच्ची आध्यात्मिक विजय है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 6 बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६॥ जिसने खुद को जीत लिया है,

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 5

क्या सच में इंसान स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु होता है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 5 उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥ खुद के ज़रिए खुद को बचाना।

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 4

क्या आसक्ति-मुक्त जीवन ही सच्चे योग की पहचान है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 4 यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥४॥ अर्थात भगवान कहते हैं, जिस

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 3

Bhagavad Gita – क्या निष्काम कर्म से ही योग मिलता है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 3 आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव ‘शमः कारणमुच्यते ॥३॥ जो ध्यान करने वाला योगी

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 2

क्या हर रोज़ के तनाव से मुक्त होने का तरीका सिर्फ़ ‘आसक्ति त्याग’ है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 2 यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥२॥ हे

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Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 1

क्या कर्म करते हुए अनासक्त रहना ही संन्यास कहलाता है?

Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 1 श्रीभगवानुवाचअनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न

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