क्या मोक्ष प्राप्त होने पर भी कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 15 एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ।।१५।। अर्थात भगवान कहते हैं, पूर्वकाल में ज्ञानी पुरुषों ने भी ऐसा जानकर कर्म किए थे, इसलिए तुम भी उन्हीं के समान अपने पूर्वजों द्वारा अनादि काल से किए गए कर्मों को करो। shrimad Bhagavad Gita […]
राग भय और क्रोध से मुक्त होकर ईश्वर को कैसे पाया जा सकता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 10 वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ।।१०।। अर्थात भगवान कहते हैं, राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित मेरे में ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञान रूपी तप से पवित्र हुए कितने ही भक्त मेरे भाव (स्वरूप) को प्राप्त हो चुके हैं। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 […]
भगवान के दिव्य जन्म और कर्म को जानने से क्या होता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 9 जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार जो पुरुष (मेरे जन्म और कर्मों को) तत्त्व सहित जानता है, अर्थात् उनमें दृढ़ विश्वास रखता है, […]
क्या भगवान हर युग में अवतार लेते हैं धर्म की स्थापना के लिए?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 8 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥ ८॥ अर्थात भगवान कहते हैं, मैं संतों (भक्तों) की रक्षा करने, पापियों का विनाश करने तथा धर्म की स्थापना करने के लिए युग-युग में प्रकट होता हूँ। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 8 Meaning in Hindi अगर […]
ईश्वर अजन्मा होकर भी क्यों प्रकट होते हैं? जानें योगमाया का रहस्य

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 6 अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥ श्री भगवान बोले यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी तथा समस्त प्राणियों का स्वामी हूँ, तथापि मैं अपनी प्रकृति को वश में करके अपनी योगमाया से स्वयं को प्रकट करता हूँ। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 6 Meaning in Hindi ईश्वर […]
श्रीकृष्ण को अपने सभी जन्म कैसे याद हैं? क्या हम भी जान सकते हैं अपने पूर्वजन्म?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 5 श्रीभगवानुवाचबहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥ श्री भगवान बोले – हे परंतप अर्जुन! तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं। मैं उन सबको जानता हूँ, परन्तु तुम नहीं जानते। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 Shloka 5 Meaning in Hindi […]
क्या ईश्वर समय से परे होते हैं? अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा!

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 4 अर्जुन उवाचअपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥ अर्जुन बोले – आपका जन्म तो अभी हुआ है और सूर्य का जन्म तो बहुत प्राचीन है। अतः मैं यह कैसे समझूँ कि सृष्टि के आरंभ में आपने ही सूर्य को यह योग दिया था? shrimad Bhagavad […]
क्या महिमा की चाह आज भी भक्त और भगवान के बीच दीवार बन रही है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 3 स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३॥ अर्थात भगवान अर्जुन को कहते हैं, तुम मेरे भक्त और प्रिय मित्र हो, इसीलिए मैंने आज तुम्हें यह प्राचीन योग बताया है, क्योंकि यह महान् एवं उत्तम रहस्य है। shrimad Bhagavad Gita Chapter […]
क्या निःस्वार्थ सेवा ही सच्चा कर्मयोग है? श्रीमद्भगवदगीता अध्याय 4 श्लोक 2

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 2 एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥ २॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे परंतप! इस प्रकार राजर्षियों को परम्परा से प्राप्त इस योग का ज्ञान हुआ। किन्तु बहुत समय बीत जाने के कारण वह योग इस मानव लोक में लुप्त हो गया। shrimad Bhagavad […]
क्या समता ही कर्म-कुशलता है? गीता श्लोक 2/50 का महत्व

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 50 बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम् || 50 || अर्थात भगवान कहते हैं, बुद्धि समता से युक्त मनुष्य यहां जीवित अवस्था में ही पुण्य और पाप दोनों का त्याग कर देता है। इसीलिए तुम योग समता में जुड़ जाओ, क्योंकि योग ही कर्मों में कुशलता है। […]
कर्म करते हुए कैसे पाएं शांति और समता?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 48 योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || 48 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे धनंजय! तुम आसक्ति का त्याग करके सिद्धि और सिद्धि में समान रहकर योग में स्थिर होकर कर्मों करो, क्योंकि समस्त ही योग कहलाता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 […]
कर्मण्येवाधिकारस्ते: क्या फल की इच्छा छोड़ना ही मोक्ष है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 47 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 47 || अर्थात भगवान अर्जुन को कहते कहते हैं, कर्तव्य कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, फलों में कभी भी नहीं! इसीलिए तुम कर्म फल की इच्छा वाले भी ना बनो और तुम्हारी अकर्मनियता में भी आसकती न हो। […]