भगवद्गीता में विरक्त जीवन का महत्व क्या है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 45

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 45 त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || 45 || अर्थात भगवान कहते हैं, वेदों में तीनों गुणों के कार्य का ही वर्णन है, हे अर्जुन! तू तीनों गुणों से मुक्त हो जा, अनासक्त हो जा, नित्य सनातन में स्थित हो जा, योग के सुखों की भी इच्छा […]

क्या सुख की तलाश आत्मज्ञान से दूर कर देती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 42 43

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 42 43 यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: |वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || 42 ||कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || 43 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पृथानन्दन! जो कामनाओं में लिप्त हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानते हैं, वेदों में वर्णित सकाम कर्मों में ही प्रीति रखते हैं, भोगों के […]

क्या थोड़ी सी समता भी जन्म-मरण से मुक्ति दे सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 40

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 40 नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || 40 || अर्थात भगवान कहते हैं मनुष्य लोक में यह सम बुद्धि रूपी धर्म के आरंभ का नाश नहीं होता, इसका अनुष्ठान उल्टा फल नहीं देता, और इसका थोड़ा भी अनुष्ठान जन्म मरण रूपी बड़े भय से रक्षण कर […]

भगवद गीता में ‘समबुद्धि’ का रहस्य क्या है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 39

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 39 एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || 39 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पार्थ! इस समता का उल्लेख पहले सांख्य योग में किया गया था, अब तुम इसे कर्म योग के संदर्भ में सुनो, कि जो समता से संपन्न है, वह कर्म […]

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपमान से क्यों डराया?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 35 36

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 35 36 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: |येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || 35 ||अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता: |निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् || 36 || अर्थात भगवान कहते हैं, महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से उपराम हुआ मानेंगे, जिनकी धारणा में तू बहुमान्य हो चुका है, […]

क्या अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक है? गीता से जानें उत्तर

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 33 34

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 33 34 अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || 33 ||अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् |सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते || 34 || अर्थात भगवान कहते हैं, अब जो तू यह धर्ममय युद्ध नहीं करता तो अपने धर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप को प्राप्त […]

क्यों भगवान ने युद्ध को स्वर्ग का द्वार कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 32

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२॥ अर्थात भगवान कहते है, अपनी इच्छा से जीती गई लड़ाई स्वर्ग का खुला द्वार है। हे पृथानन्दन! वे क्षत्रिय बहुत प्रसन्न होते हैं, जिन्हें ऐसा युद्ध प्राप्त होता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 Meaning in […]

स्वधर्म निभाना क्यों है जीवन का सबसे बडा कर्तव्य?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 31 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || 31 || अर्थात भगवान कहते हैं, खुद के धर्म को देखकर भी आपको विकंपित अर्थात कर्तव्य कर्म से विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि धर्म में युद्ध से बड़ा क्षत्रिय के लिए दूसरा कुछ कल्याण कारक कर्म नहीं। Shrimad Bhagavad Gita […]

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से शोक न करने को क्यों कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 30

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 30 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || 30 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे भरतवंशी अर्जुन! यह शरीर सबके शरीर में सदैव अवध्य रहता है। इसीलिए तुम्हें सभी जीवों के लिए, अर्थात किसी भी जीव के लिए शोक नहीं करना चाहिए। Shrimad Bhagavad Gita Chapter […]

क्या आपने कभी अपने ‘स्वरूप’ को स्वयं जाना है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 29

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 29 आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: |आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोतिश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || 29 || अर्थात भगवान कहती है, कोई इस शरीरी को आश्चर्य से देखता है। इसी प्रकार कोई और इसे आश्चर्य के रूप में वर्णित करता है, और कोई इसे आश्चर्य के रूप में सुनता है, और कोई इसे […]

क्या मृत्यु सच में अंत है?

Bhagavad GIta Chapter 2 Verse 28

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 28 अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || 28 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे भारत! जन्म से पहले सभी प्राणी अदृश्य थे और मृत्यु के बाद वे अदृश्य हो जाते हैं और केवल मध्य में ही दृश्यमान होते हैं, तो फिर इसमें शोक मनाने की क्या बात […]

क्या हम जन्म और मृत्यु को टाल सकते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 27

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 27 जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || 27 || अर्थात भगवान कहते हैंक्योंकि जो जन्मा है वह अवश्य मरेगा और जो मरा है वह अवश्य जन्मेगा, अतः इसे (जन्म-मृत्यु के प्रवाह को) टाला नहीं जा सकता, अर्थात् रोका नहीं जा सकता। इसलिए तुम्हें इस […]