
Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 23
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।।२३।।
जिसमें दुखों के संयोग का ही वियोग है उसे ही ‘योग’ कहना चाहिए। (वह योग जो ध्यान योग का लक्ष्य है।) उस ध्यान योग का अभ्यास पक्के इरादे से करना चाहिए, थके हुए मन से नहीं।
Shrimad Bhagavad Gita Chapter 6 Verse 23 Meaning in hindi
क्या दुख से अलग होना ही असली योग है?
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्
दुनियावी शरीर से रिश्ता मानना, जो दुख है, जिससे हमारा कोई रिश्ता नहीं है, जो हुआ नहीं है, होगा नहीं और होना मुमकिन नहीं है, वही ‘दुख-संयोग’ है। यह दुख-संयोग ‘योग’ नहीं है। अगर यह योग होता, यानी अगर हम हमेशा दुनिया के साथ रिश्ते में रहते, तो यह दुख-संयोग कभी वियोग (संबधविच्छेद) नहीं होता। लेकिन ज्ञान होने पर यह अलग हो जाता है। इससे यह साबित होता है कि दुख-संयोग सिर्फ हमारा विश्वास है, हमारी बनाई हुई चीज़ है, नैचुरल नहीं। हम इसके साथ रिश्ता कितना भी पक्का क्यों न मान लें और कितने भी लंबे समय तक इसके साथ रिश्ता क्यों न मान लें, यह कभी भी इसके साथ रिश्ता नहीं हो सकता। इसलिए, हम खुद को इस महसूस होने वाले, अचानक लगने वाले दुख-संयोग से अलग कर सकते हैं। इस दुख (फिजिकल दुनिया) को काटकर ही हम नैचुरल ‘योग’ पा सकते हैं, यानी हम स्वरूप के साथ अपने हमेशा रहने वाले योग को महसूस कर सकते हैं। स्वरूप के साथ हमेशा रहने वाले योग को ही यहाँ ‘योग’ समझना चाहिए।
यहाँ दुख की दुनिया से पूरी तरह अलग होने को योग कहा गया है, जिसका मतलब है कि हम पहले अपने स्वरूप से अलग थे, लेकिन अब हम एक हो गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। स्वरूप के साथ हमारा हमेशा रहने वाला योग है। दुख की दुनिया के मिलन की शुरुआत और अंत होता है, और मिलन के समय भी मिलन शुरू और खत्म होता रहता है। लेकिन यह हमेशा रहने वाला योग कभी शुरू और खत्म नहीं होता। क्योंकि यह योग मन, बुद्धि वगैरह से नहीं होता, बल्कि उनके रिश्ते के अलग होने से होता है। यह हमेशा रहने वाला योग खुद-ब-खुद होता है। यह हर किसी की स्वाभाविक स्थिति है। लेकिन नश्वर दुनिया के साथ रिश्ता मानने की वजह से यह हमेशा रहने वाला योग भूल गया है। जैसे ही दुनिया से रिश्ता अलग होता है, हमेशा रहने वाले योग की याद गायब हो जाती है। यही बात अर्जुन ने अठारहवें अध्याय में कही है, “भ्रम का नाश ही याद की प्राप्ति है।” इसलिए यह योग नया नहीं हुआ है, बल्कि हमेशा रहने वाला योग साकार हो गया है।
क्या दृढ़ निश्चय से ही मिलता है सच्चा योग?
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा
ऐसा योग (प्राप्ति रूपी समता) पाने के लिए जिसमें दुख का संयोग न हो, साधक को थके हुए मन से नहीं, बल्कि दृढ़ निश्चय के साथ ध्यान करना चाहिए, जैसा इसी अध्याय के श्लोक 18 से 20 में बताया गया है।
योग का अनुभव करने के लिए साधक को सबसे पहले अपनी बुद्धि को निश्चय वाला बनाना चाहिए, यानी यह निश्चय करना चाहिए कि ‘मुझे सिर्फ़ योग पाना है’। ऐसा निश्चय करने के बाद, चाहे दुनिया से कितना भी लालच आए, चाहे कितने भी भयानक दुख आएं, उसे अपना निश्चय नहीं छोड़ना चाहिए।
गीता के अनुसार स्थायी सुख पाने का सही तरीका क्या है?
अनिर्विण्णचेतसा का अर्थ है कि बहुत समय बीत गया, बहुत प्रयास किया, पर सिद्धि नहीं मिली! कब मिलेगी? कैसे मिलेगी – ऐसे कभी थकना नहीं चाहिए। साधक की आत्मा में ऐसा भाव होना चाहिए कि चाहे कितने भी वर्ष बीत जाएं, चाहे कितने भी जन्म हो जाएं, चाहे कितने भी भयंकर और भयानक दुख आ जाएं, मुझे अब भी सार तत्व को पाना है। साधक की आत्मा को अपने आप और स्वाभाविक रूप से यह सोचना चाहिए कि मैंने अनेक जन्म लिए, पर वे सब व्यर्थ गए, मुझे उनसे कोई लाभ नहीं मिला। मैंने अनेक बार नरक के कष्ट भोगे, पर उनसे भी मुझे कुछ लाभ नहीं हुआ, अर्थात केवल पूर्व के पाप नष्ट हो गए, पर परमात्मा नहीं मिला। अब यदि इस जन्म का संपूर्ण समय, जीवन काल और प्रयास परमात्मा को पाने में लग जाए, तो कितना उत्तम है!!
इस श्लोक के पूर्वार्ध में भगवान ने जिस योग (साध्य रूपी समता) का वर्णन किया है, इस योग की प्राप्ति के लिए अब अगले श्लोक से निर्गुण निराकार के ध्यान का प्रकरण आरंभ करते हैं।
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