राग भय और क्रोध से मुक्त होकर ईश्वर को कैसे पाया जा सकता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 10 वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ।।१०।। अर्थात भगवान कहते हैं, राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित मेरे में ही तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञान रूपी तप से पवित्र हुए कितने ही भक्त मेरे भाव (स्वरूप) को प्राप्त हो चुके हैं। shrimad Bhagavad Gita Chapter 4 […]
इन्द्रियों को वश में करने से बुद्धि की स्थिरता कैसे प्राप्त होती है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 68 तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश: |इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 68 || अतः हे श्रेष्ठ! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ विषयों के द्वारा पूर्णतया वश में हो जाती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 68 Meaning in hindi मन और इन्द्रियों को वश में करने के […]
क्या राग-द्वेष से मुक्ति ही सच्चा सुख है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 64 65 रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् |आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति || 64 ||प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते |प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || 65 || अर्थात भगवान कहते हैं, राग-द्वेष से रहित, वश में किये हुए हृदय वाला कर्म योगी, वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करने पर भी हृदय के सुख को प्राप्त […]
क्या हमारे क्रोध का कारण हमारी इच्छाएँ हैं?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 62 63 ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते || 62 ||क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: |स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति || 63 || अर्थात भगवान कहते हैं, जो व्यक्ति वस्तुओं का चिंतन करता है, वह उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति विकसित करता है। आसक्ति से इच्छा उत्पन्न होती है। इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता […]
इंद्रियों को वश में करने का सही तरीका क्या है? गीता का दृष्टिकोण!

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 61 तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: |वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 61 || अर्थात भगवान कहते हैं कर्मयोगी साधकों को सारी इंद्रियों को वश में करके मेरे परायण होना चाहिए, क्योंकि जिनकी इंद्रियां वश में है, उनकी बुद्धि प्रतिष्ठित है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 61 […]
क्या साधक वास्तव में ‘इच्छा रहित’ हो सकता है? गीता क्या कहती है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 58 59 60 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश: |इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 58 ||विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन: |रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते || 59 ||यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित: |इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन: || 60 || अर्थात भगवान कहते हैं, जैसे कछुआ सब ओर से अपने अंगों को समेट […]
क्या हमारे सुख-दुख की प्रतिक्रियाएं हमें अस्थिर बनाती हैं? गीता से जानें समाधान

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 57 य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् |नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता || 57 || अर्थात भगवान कहते हैं, सारी जगह पर आसकती रहित हुआ जो मनुष्य शुभ अशुभ को प्राप्त करके ना तो अभिनंदन होता है और ना तो द्वेष करता है उनकी बुद्धि प्रतिष्ठित है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 […]
क्या आप दुःख में भी शांत रह सकते हैं? गीता बताती है कैसे!

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 56 दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: |वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते || 56 || अर्थात श्री भगवान बोले, ध्यान करने वाले व्यक्ति के बारे में कहा जाता है कि उसका मन स्थिर होता है, जो दुख आने पर विचलित नहीं होता, सुख आने पर व्याकुल नहीं होता तथा जो आसक्ति, भय और क्रोध से पूरी […]
क्या इच्छाओं का त्याग ही स्थिर बुद्धि की पहचान है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 55 श्रीभगवानुवाच |प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् |आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते || 55 || अर्थात श्री भगवान बोले, है पृथा नंदन जीस समय साधक मन में रही हुई सारी कामनाओं को अच्छे से त्याग कर देता है और खुद खुद से ही अपने आप में संतुष्ट रहता है, उस समय वह स्थिर […]
क्या आप स्थितप्रज्ञ हैं? जानिए भगवद गीता से स्थिर बुद्धि के लक्षण

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 54 अर्जुन उवाच |स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव |स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् || 54 || अर्थात अर्जुन बोले हे केशव! परमात्मा में स्थिति स्थिर बुद्धि वाले मनुष्य के क्या लक्षण होते हैं? वह स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य किस तरह बोलता है? किस तरह बैठता है? और किस तरह […]
क्या योग का अर्थ है मतभेदों से ऊपर उठना?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 53 श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला |समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि || 53 || अर्थात भगवान कहते हैं, जिस समय शास्त्रीय मतभेदों से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि निश्चल हो जाएगी और परमात्मा में अचल हो जाएगी, उस समय तुम योग को प्राप्त हो जाओगे। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 53 Meaning […]
रिश्तों और चाहतों से मुक्त होकर क्या मिल सकती है सच्ची शांति?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 52 यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति |तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च || 52 || अर्थात भगवान कहते हैं जिस समय तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी कदव से तर जायेगी, उस समय तूम सुना हुआ और सुनने में आने वाले भोगों से वैराग्य को प्राप्त कर लेगा। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 […]