जन्म-मरण के बंधन से कैसे मुक्त हों?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 51 कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण: |जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् || 51 || अर्थात भगवान कहते हैं, समता युक्त मनुष्य साधको कर्म जन्य फलों का त्याग करके जन्म रूपी बंधन से मुक्त होकर निर्विकार पद को प्राप्त हो जाते हैं। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 51 Meaning in hindi […]
आज के व्यस्त जीवन में समता का अभ्यास कैसे करें?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 49 दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय |बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव: || 49 || अर्थात भगवान कहते हैं, बुद्धि योग समता की अपेक्षा से सकाम कर्म दर से अत्यंत ही निकृष्ट है, इसीलिए है धनंजय! तुम बुद्धि समता का आश्रय लो, क्योंकि फल का निमित बनने वाले अत्यंत दिन है। Shrimad Bhagavad […]
कर्मण्येवाधिकारस्ते: क्या फल की इच्छा छोड़ना ही मोक्ष है?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 47 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 47 || अर्थात भगवान अर्जुन को कहते कहते हैं, कर्तव्य कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, फलों में कभी भी नहीं! इसीलिए तुम कर्म फल की इच्छा वाले भी ना बनो और तुम्हारी अकर्मनियता में भी आसकती न हो। […]
भगवद्गीता में विरक्त जीवन का महत्व क्या है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 45 त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || 45 || अर्थात भगवान कहते हैं, वेदों में तीनों गुणों के कार्य का ही वर्णन है, हे अर्जुन! तू तीनों गुणों से मुक्त हो जा, अनासक्त हो जा, नित्य सनातन में स्थित हो जा, योग के सुखों की भी इच्छा […]
क्या सुख की तलाश आत्मज्ञान से दूर कर देती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 42 43 यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: |वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || 42 ||कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || 43 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पृथानन्दन! जो कामनाओं में लिप्त हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानते हैं, वेदों में वर्णित सकाम कर्मों में ही प्रीति रखते हैं, भोगों के […]
क्या थोड़ी सी समता भी जन्म-मरण से मुक्ति दे सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 40 नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || 40 || अर्थात भगवान कहते हैं मनुष्य लोक में यह सम बुद्धि रूपी धर्म के आरंभ का नाश नहीं होता, इसका अनुष्ठान उल्टा फल नहीं देता, और इसका थोड़ा भी अनुष्ठान जन्म मरण रूपी बड़े भय से रक्षण कर […]
भगवद गीता में ‘समबुद्धि’ का रहस्य क्या है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 39 एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || 39 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पार्थ! इस समता का उल्लेख पहले सांख्य योग में किया गया था, अब तुम इसे कर्म योग के संदर्भ में सुनो, कि जो समता से संपन्न है, वह कर्म […]
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपमान से क्यों डराया?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 35 36 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: |येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || 35 ||अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता: |निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् || 36 || अर्थात भगवान कहते हैं, महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से उपराम हुआ मानेंगे, जिनकी धारणा में तू बहुमान्य हो चुका है, […]
क्या अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक है? गीता से जानें उत्तर

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 33 34 अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || 33 ||अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् |सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते || 34 || अर्थात भगवान कहते हैं, अब जो तू यह धर्ममय युद्ध नहीं करता तो अपने धर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप को प्राप्त […]
क्यों भगवान ने युद्ध को स्वर्ग का द्वार कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२॥ अर्थात भगवान कहते है, अपनी इच्छा से जीती गई लड़ाई स्वर्ग का खुला द्वार है। हे पृथानन्दन! वे क्षत्रिय बहुत प्रसन्न होते हैं, जिन्हें ऐसा युद्ध प्राप्त होता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 Meaning in […]
स्वधर्म निभाना क्यों है जीवन का सबसे बडा कर्तव्य?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 31 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || 31 || अर्थात भगवान कहते हैं, खुद के धर्म को देखकर भी आपको विकंपित अर्थात कर्तव्य कर्म से विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि धर्म में युद्ध से बड़ा क्षत्रिय के लिए दूसरा कुछ कल्याण कारक कर्म नहीं। Shrimad Bhagavad Gita […]
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से शोक न करने को क्यों कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 30 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || 30 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे भरतवंशी अर्जुन! यह शरीर सबके शरीर में सदैव अवध्य रहता है। इसीलिए तुम्हें सभी जीवों के लिए, अर्थात किसी भी जीव के लिए शोक नहीं करना चाहिए। Shrimad Bhagavad Gita Chapter […]