क्या आपने कभी अपने ‘स्वरूप’ को स्वयं जाना है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 29 आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: |आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोतिश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || 29 || अर्थात भगवान कहती है, कोई इस शरीरी को आश्चर्य से देखता है। इसी प्रकार कोई और इसे आश्चर्य के रूप में वर्णित करता है, और कोई इसे आश्चर्य के रूप में सुनता है, और कोई इसे […]
क्या मृत्यु सच में अंत है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 28 अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || 28 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे भारत! जन्म से पहले सभी प्राणी अदृश्य थे और मृत्यु के बाद वे अदृश्य हो जाते हैं और केवल मध्य में ही दृश्यमान होते हैं, तो फिर इसमें शोक मनाने की क्या बात […]
क्या हम जन्म और मृत्यु को टाल सकते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 27 जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || 27 || अर्थात भगवान कहते हैंक्योंकि जो जन्मा है वह अवश्य मरेगा और जो मरा है वह अवश्य जन्मेगा, अतः इसे (जन्म-मृत्यु के प्रवाह को) टाला नहीं जा सकता, अर्थात् रोका नहीं जा सकता। इसलिए तुम्हें इस […]
क्या बीज की तरह हर पल बदलता है हमारा शरीर?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 25 26 अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते |तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि || 25 ||अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् |तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि || 26 || अर्थात भगवान कहते हैं, यह देही प्रत्येक नहीं दिखता, यह चिंतन का विषय नहीं, और इसमें कोई विकार नहीं, इसीलिए यह देही को ऐसा जानकर शौक नहीं […]
क्या आत्मा पर मंत्र शस्त्र या शाप का असर होता है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 24 अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च |नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: || 24 || अर्थात भगवान कहते हैं, यह शरीरी को छेदा नहीं जा सकता, इसे जला नहीं जा सकता, और इसे गीला भी नहीं किया जा सकता। तथा इसे सुखा भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह नित्य रहने वाला, सब में […]
क्या मृत्यु केवल पुराने वस्त्र बदलने जैसा ही एक परिवर्तन है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 22 वासांसि जीर्णानि यथा विहायनवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही || 22 || अर्थात भगवान कहते हैं, मनुष्य जिस तरह पुराने वस्त्र त्याग कर दूसरे नए वस्त्र धारण कर लेते हैं, वैसे ही यह देही पुराने शरीर को त्याग करके दूसरे नए शरीर में चला जाता […]
क्या मृत्यु पर शोक करना उचित है? गीता क्या कहती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 21 वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् |कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् || 21 || अर्थात भगवान कहते हैं, है प्रथा नंदन जो मनुष्य इस शरीरी को अविनाशी, नित्य, जन्म रहित और अव्यय जानते हैं, वह किस तरह किसीको मारे और किस तरह किसी को माराये? Shrimad Bhagavad Gita […]
शरीर और आत्मा में क्या अंतर है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 20 न जायते म्रियते वा कदाचिनायं भूत्वा भविता वा न भूय: |अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणोन हन्यते हन्यमाने शरीरे || 20 || अर्थात भगवान कहते हैं, यह शरीरी ना ही कभी जन्म लेता है, और ना ही कभी मरता है, यह उत्पन्न होकर फिर से होने वाला नहीं! यह जन्म रहित […]
क्या आत्मा सच में मरती है या मारती है? भगवद गीता श्लोक 2.19 का रहस्य

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 19 य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् |उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते || 19 || अर्थात भगवान कहते हैं, जो मनुष्य यह अविनाशी शरीरी को मारने वाला मानता है, और जो मनुष्य इसको मरण पामा हुआ मानता है, वे दोनों ही इसे नहीं जानते क्योंकी यह […]
क्या आत्मा वास्तव में अविनाशी और नित्य है? श्रीकृष्ण का अर्जुन को उपदेश

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 18 अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण: |अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत || 18 || अर्थात भगवान कहते हैं, अविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहने वाला यह शरीरी(आत्मा) का यह शरीर अंत वाला कहने में आया है, इसीलिए हे अर्जुन! तुम युद्ध करो Shrimad Bhagavad Geeta Chapter 2 Shloka 18 Meaning in hindi अनाशिन […]
शरीर नश्वर है पर आत्मा क्यों नहीं? जानिए गीता का रहस्य

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 17 अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् |विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति || 17 || अर्थात भगवान कहते हैं, अविनाशी तो तुम उसे जानो जिसे यह संपूर्ण संसार व्याप्त हैं, यह अविनाशी का विनाश कोई भी नहीं कर सकता। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 17 Meaning in hindi अविनाशि तु तद्विद्धि […]
क्या सुख-दुख में समान रहना ही अमरता का मार्ग है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 15 यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते || 15 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुख में समान रहने वाले जो धीर मनुष्य को यह मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथा नहीं पहुंचते, वे अमर होने में समर्थ हो जाते हैं, अर्थात अमर बन […]