क्या इन्द्रियाँ ही हमारे सुख-दुख की जड हैं? गीता का उत्तर जानिए

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 14 मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा: |आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || 14 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे कुंतीनंदन! इन्द्रियों के विषय (जड़ विषय) वे हैं जो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) के द्वारा सुख और दुःख देते हैं। वे क्षणभंगुर एवं अनित्य हैं। हे भरतवंशी अर्जुन! तू इनको सहन कर। Shrimad Bhagavad Gita […]
क्या हमारी असली पहचान शरीर से परे है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 12 न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः |न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् || 12 || अर्थात भगवान कहते हैं, मैं कोई काल में न था और तू न था तथा यह राजा लोग न थे, यह बात भी नहीं और अब इसके बाद में, तुम, और […]
क्या ममता और आसक्ति ही हमारे दुखों का मुख्य कारण हैं? गीता से जीवन का रहस्य

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 11 श्रीभगवानुवाच |अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: || 11 || अर्थात प्रभु ने कहा, “तुमने जो शोक करने योग्य नहीं है, उसके लिए शोक किया है और विद्वानों की बातें कहते हो।” लेकिन पंडित न तो उन लोगों के लिए शोक मनाते हैं जिनका जीवन समाप्त हो गया है, […]
अर्जुन का यह निर्णय क्यों ? – ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 9 सञ्जय उवाच |एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप |न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह || 9 || अर्थात संजय बोले, हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र! ऐसा कहकर(पिछले श्लोक में वर्णित) निद्रा को जीत चुके अर्जुन भगवान गोविद से स्पष्ट कह कर कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’, चुप हो गये। Shrimad Bhagavad Gita […]
क्या सफलता और दौलत से दुख मिटता है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 8 न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् |अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धंराज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् || 8 || अर्थात अर्जुन कहते हैं,यदि मैं पृथ्वी पर धन-धान्य से भरपूर और निष्कंटक राज्य तथा स्वर्ग में देवताओं का राज्य भी प्राप्त कर लूं, तो भी मैं नहीं देखता कि मेरा शोक, जो मेरी इन्द्रियों को सुखा देता है […]
क्या भगवान से मार्गदर्शन मांगना ही सच्चा समर्पण है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 7 कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: |यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मेशिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || 7 || अर्थात अर्जुन कहते हैं कायरता के दोष द्वारा दबा हुए स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित अंतरकरण वाला, में आपको पूछता हूं कि, जो कुछ निश्चय किया हुआ कल्याण कारक हो, वह मेरे […]
क्या अर्जुन का युद्ध से इनकार सही था?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 6 न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयोयद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: |यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: || 6 || अर्थात् अर्जुन कहते है, हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना श्रेष्ठ है या न करना! और हम यह भी नहीं जानते कि हम उन्हें हरा देंगे या […]
क्यों अर्जुन ने भिक्षा को गुरुओं की हत्या से श्रेष्ठ माना?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 5 गुरूनहत्वा हि महानुभावान्श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके |हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैवभुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् || 5 || अर्थात अर्जुन कहते हैं, महानुभाव गुरु जनों को न मारकर में भिक्षा का अन्न खाना भी कल्याण कारक मानता हूं! गुरुजनों को मार कर यहां खून से सना देखकर तथा धन की कामना के मुख्यता वाले […]
क्या अर्जुन की तरह हम भी अपनों के खिलाफ फैसले लेने से डरते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 4 अर्जुन उवाच |कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन |इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन || 4 || अर्थातअर्जुन बोले – हे मधुसूदन! मैं युद्धस्थल में बाणों द्वारा भीष्म और द्रोण से कैसे लड़ सकता हूँ? क्योंकि, हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 4 Meaning in […]
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को नपुंसकता क्यों कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 3 क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते |क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप || 3 || अर्थात भगवान कहते है, हे पृथानन्दन प्रिय अर्जुन! इस नपुंसकता को प्राप्त मत हो, क्योंकि यह आपके लिए सही नहीं है. हे परंतप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग दो और युद्ध के लिए खडे […]
क्या कायरता धर्म स्वर्ग और यश से वंचित कर सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 2 श्रीभगवानुवाच |कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् |अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन || 2 || अर्थात श्री भगवान बोले – हे अर्जुन! इस विचित्र अवसर पर तुम्हारे अन्दर यह कायरता कहाँ से आ गयी, जिसका आचरण श्रेष्ठ पुरुष नहीं करते, जो स्वर्ग की प्राप्ति नहीं कराती तथा जो यश भी नहीं देती. Shrimad Bhagavad Gita […]