
Purushottam Maas Adhyay 5
पुरुषोत्तम मास की दिव्य कथा का पाँचवाँ अध्याय
सनातन धर्म में Purushottam Maas को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। इस माह में किए गए जप, तप, दान, कथा श्रवण और भगवान के स्मरण का फल कई गुना बढ़ जाता है। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का पाँचवाँ अध्याय भक्तों को उस अद्भुत रहस्य से परिचित कराता है, जहाँ अपमानित और दुखी अधिमास को स्वयं भगवान विष्णु अपने साथ गोलोक धाम लेकर जाते हैं।
यह अध्याय केवल एक कथा नहीं, बल्कि यह बताता है कि संसार द्वारा तिरस्कृत व्यक्ति को भी भगवान अपने हृदय में स्थान देते हैं। जो सभी के द्वारा छोड़ा जाता है, उसे भगवान पुरुषोत्तम अपनाते हैं।
नारद जी का प्रश्न और भगवान नारायण का उत्तर
कथा में नारद मुनि भगवान नारायण से पूछते हैं कि जब अधिमास ने भगवान हरि के चरणों में गिरकर अपनी पीड़ा व्यक्त की, तब भगवान ने उससे क्या कहा?
तब भगवान नारायण बोले कि हे नारद! तुम धन्य हो जो ऐसी सत्कथा पूछते हो। अब मैं तुम्हें वह दिव्य प्रसंग सुनाता हूँ जो बैकुण्ठ में घटित हुआ था।
जब मूर्छित हो गया अधिमास
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अधिमास अपनी पीड़ा और अपमान से इतना दुखी हो गया कि वह मूर्छित होकर भगवान के चरणों में गिर पड़ा। तब भगवान के संकेत पर Garuda अपने पंखों से उसे हवा करने लगे।
कुछ समय बाद अधिमास चेतना में आया और रोते हुए बोला —
“हे जगत के पालनहार! मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपकी शरण में आया हूँ, फिर भी संसार में मेरा कोई सम्मान नहीं है।”
उसकी करुण पुकार सुनकर स्वयं भगवान विष्णु का हृदय द्रवित हो उठा।
भगवान विष्णु ने दिया अधिमास को आश्वासन
तब Vishnu ने प्रेमपूर्वक अधिमास से कहा —
“हे वत्स! दुःखी मत हो। तुम्हारा कल्याण निश्चित है। तुम्हारा दुःख अब समाप्त होगा।”
भगवान ने तुरंत निश्चय किया कि अधिमास को ऐसा स्थान और सम्मान दिया जाए जो तीनों लोकों में अद्वितीय हो।
गोलोक धाम चलने का दिव्य निमंत्रण
भगवान विष्णु बोले —
“हे वत्स! मेरे साथ उस दिव्य गोलोक धाम चलो जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम रूप में विराजमान हैं। वह लोक योगियों के लिए भी दुर्लभ है।”
यह सुनते ही अधिमास के मन में आशा की किरण जाग उठी।
गोलोक धाम का अद्भुत वर्णन
जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण विराजते हैं
भगवान विष्णु अधिमास को जिस गोलोक धाम में लेकर गए, उसका वर्णन अत्यंत अलौकिक है। वहाँ स्वयं Krishna दो भुजाओं वाले सुंदर स्वरूप में विराजमान हैं।
उनका शरीर नवीन वर्षा के मेघ के समान श्याम है। उनके नेत्र लाल कमल के समान मनोहर हैं और उनका मुख करोड़ों शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसा तेजस्वी है।
वे पीताम्बर धारण किए हुए हैं, वनमाला से सुशोभित हैं और हाथों में मधुर मुरली धारण किए हुए हैं। उनके मुख पर मंद मुस्कान है जो समस्त संसार को आनंद देने वाली है।
करोड़ों कामदेव से भी अधिक सुंदर श्रीकृष्ण
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य में वर्णित है कि भगवान श्रीकृष्ण का सौंदर्य करोड़ों कामदेवों को भी लज्जित करने वाला है। उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह शोभित है और कौस्तुभ मणि की दिव्य आभा पूरे गोलोक को प्रकाशित करती है।
रत्नजटित मुकुट और चमचमाते कुण्डल उनकी दिव्यता को और अधिक बढ़ा देते हैं।
गोलोक — जहाँ दुःख का अस्तित्व नहीं
गोलोक धाम को ऐसा लोक बताया गया है जहाँ —
- मृत्यु नहीं है
- रोग नहीं है
- बुढ़ापा नहीं है
- भय नहीं है
- शोक नहीं है
यह ऐसा दिव्य लोक है जहाँ केवल आनंद, प्रेम और भक्ति का निवास है।
गोलोक की भूमि भी है रत्नमयी
शास्त्रों में वर्णित है कि गोलोक की भूमि रत्नों से बनी हुई है। वहाँ दिव्य प्रकाश सदा व्याप्त रहता है। यह लोक योगियों के लिए भी दुर्लभ माना गया है।
जो सच्चे भक्त होते हैं, केवल वही भगवान की कृपा से इस दिव्य धाम का अनुभव कर सकते हैं।
बैकुण्ठ और शिवलोक का दिव्य रहस्य
इस अध्याय में केवल गोलोक ही नहीं, बल्कि बैकुण्ठ और शिवलोक का भी अत्यंत अद्भुत वर्णन मिलता है।
बैकुण्ठ धाम
Vaikuntha में रहने वाले सभी भक्त चार भुजाओं वाले हैं और शंख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण करते हैं।
वहाँ की स्त्रियाँ देवी लक्ष्मी के समान तेजस्विनी और दिव्य रूप वाली हैं।
शिवलोक का अलौकिक स्वरूप
Shivaloka में भगवान शिव के गण निवास करते हैं। उनके शरीर पर भस्म लगी रहती है, वे नाग का यज्ञोपवीत धारण करते हैं और हाथों में त्रिशूल रखते हैं।
उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित रहता है और वे वीरता तथा वैराग्य के प्रतीक हैं।
गोलोक के मध्य में परम ज्योति
कथा में बताया गया है कि गोलोक के भीतर एक दिव्य ज्योति है जो परमानंद देने वाली है। योगी उसी निराकार ज्योति का ध्यान करते हैं।
लेकिन उस दिव्य प्रकाश के भीतर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपने साकार रूप में विराजमान हैं।
यही इस अध्याय का सबसे गहरा आध्यात्मिक रहस्य है — भगवान निराकार भी हैं और साकार भी।
क्यों कहलाते हैं श्रीकृष्ण “पुरुषोत्तम”?
इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण को पूर्ण परब्रह्म और पुरुषोत्तम कहा गया है क्योंकि —
- वे सम्पूर्ण सृष्टि के मूल कारण हैं
- वे सभी लोकों के आधार हैं
- वे माया से परे हैं
- वे भक्तों पर कृपा करने वाले हैं
- वे समस्त मंगलों के मंगल हैं
इसी कारण अधिमास को भी भगवान ने अपने नाम से जोड़कर “पुरुषोत्तम मास” बना दिया।
पुरुषोत्तम मास हमें क्या शिक्षा देता है?
यह अध्याय केवल दिव्य लोकों का वर्णन नहीं करता, बल्कि जीवन की एक गहरी शिक्षा भी देता है।
1. भगवान कभी किसी का तिरस्कार नहीं करते
जिस अधिमास को संसार ने अपवित्र और अशुभ कहा, उसी को भगवान ने अपने नाम से महान बना दिया।
2. सच्ची शरणागति कभी व्यर्थ नहीं जाती
जब अधिमास पूरी तरह टूट गया, तभी भगवान ने उसे सबसे बड़ा सम्मान दिया।
3. भक्ति से दुर्लभ लोक भी प्राप्त होते हैं
गोलोक जैसे दुर्लभ धाम की प्राप्ति केवल भगवान की कृपा और भक्ति से संभव है।
पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?
पुरुषोत्तम मास में विशेष रूप से —
- भगवान श्रीकृष्ण का नाम जप
- गीता पाठ
- विष्णु सहस्रनाम
- दान-पुण्य
- तुलसी पूजा
- एकादशी व्रत
- कथा श्रवण
करना अत्यंत शुभ माना गया है।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का पाँचवाँ अध्याय हमें यह बताता है कि भगवान के दरबार में किसी का अपमान स्थायी नहीं होता। जो संसार से ठुकराया जाता है, भगवान उसे अपने हृदय में स्थान देते हैं।
अधिमास का गोलोक तक पहुँचना केवल एक कथा नहीं, बल्कि यह विश्वास है कि सच्ची भक्ति और समर्पण से मनुष्य भी भगवान के परम धाम तक पहुँच सकता है।
इसीलिए पुरुषोत्तम मास को सभी महीनों में श्रेष्ठ और भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय मास कहा गया है।
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