Purushottam Maas Chapter 4:मलमास पर भगवान विष्णु की कृपा

Purushottam Maas Chapter 4

Purushottam Maas Chapter 4

सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास को अत्यंत पवित्र और दिव्य मास माना गया है। यह केवल एक अतिरिक्त मास नहीं, बल्कि भगवान भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का समय माना जाता है। पुरुषोत्तम मास महात्म्य के चतुर्थ अध्याय में एक अत्यंत भावुक और आध्यात्मिक प्रसंग वर्णित है, जिसमें अधिक मास अर्थात मलमास अपनी पीड़ा लेकर भगवान नारायण की शरण में पहुंचता है। यह अध्याय केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन के गहरे दुख, अपमान, आशा और ईश्वर की करुणा का अद्भुत चित्रण भी है।

इस अध्याय में बताया गया है कि किस प्रकार संसार द्वारा तिरस्कृत अधिक मास भगवान की शरण में जाकर सम्मान प्राप्त करता है। यह कथा हमें सिखाती है कि संसार चाहे किसी को कितना भी अपमानित कर दे, यदि वह सच्चे मन से ईश्वर की शरण में जाता है, तो भगवान उसका जीवन बदल देते हैं। पुरुषोत्तम मास का यह प्रसंग भक्तों को विश्वास, भक्ति और धैर्य का संदेश देता है।

नारायण द्वारा नारद को पुरुषोत्तम मास का रहस्य बताना

चतुर्थ अध्याय की शुरुआत में भगवान नारायण, देवर्षि नारद मुनि से कहते हैं कि वे लोककल्याण के लिए अधिक मास का दिव्य रहस्य सुनाने जा रहे हैं। भगवान बताते हैं कि यह कथा केवल एक मास की महिमा नहीं, बल्कि उस दया और कृपा का वर्णन है जो ईश्वर अपने शरणागत भक्तों पर बरसाते हैं।

भगवान नारायण कहते हैं कि जो व्यक्ति पुरुषोत्तम मास की महिमा को श्रद्धा से सुनता या पढ़ता है, उसके जीवन के दुख धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। इस मास का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और ईश्वर से जुड़ने का महान अवसर है।

अधिक मास की पीड़ा और उसका तिरस्कार

अधिक मास अत्यंत दुखी होकर भगवान विष्णु के सामने अपनी व्यथा प्रकट करता है। वह कहता है कि संसार के सभी मास अपने-अपने अधिपति देवताओं के कारण सम्मानित हैं, लेकिन उसका कोई स्वामी नहीं है। इसी कारण सभी उसे “मलमास” कहकर अपमानित करते हैं।

वह भगवान से कहता है कि शुभ कार्यों में उसे वर्जित माना जाता है। विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ और अन्य मांगलिक कार्यों में लोग उसे अशुभ समझकर त्याग देते हैं। इस निरंतर अपमान और तिरस्कार के कारण उसका हृदय दुख से भर गया है।

अधिक मास की यह पीड़ा केवल एक मास की नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की प्रतीक है जिन्हें समाज कभी अस्वीकार कर देता है। कई बार मनुष्य भी स्वयं को अकेला, असफल और अपमानित महसूस करता है। उसे लगता है कि उसका कोई मूल्य नहीं है। यही कारण है कि यह अध्याय हर युग में लोगों के हृदय को स्पर्श करता है।

मलमास की भगवान से करुण प्रार्थना

अधिक मास भगवान विष्णु से अत्यंत विनम्रता और दुख के साथ कहता है कि हे प्रभु! आपने संसार में हर दुखी की रक्षा की है, फिर आज मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहे? वह भगवान को उनके पूर्व के दिव्य कार्यों की याद दिलाता है।

वह कहता है कि जैसे आपने माता देवकी को कंस के अत्याचारों से बचाया, जैसे आपने द्रौपदी की लाज की रक्षा की, जैसे आपने कालिया नाग के विष से ग्वालों और गौओं को बचाया, वैसे ही आज मेरी भी रक्षा कीजिए।

अधिक मास भगवान से यह भी कहता है कि आपने गजराज को ग्राह से बचाया, जरासंध के कारागार में बंद राजाओं को मुक्त कराया और व्रजवासियों को अग्नि से बचाया। जब आपने सभी शरणागतों की रक्षा की, तो आज मेरी पुकार क्यों नहीं सुन रहे?

यह प्रसंग भगवान की शरणागति के महत्व को दर्शाता है। जब भक्त पूर्ण विश्वास और समर्पण के साथ भगवान को पुकारता है, तब उसकी प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती।

भगवान विष्णु का दयालु स्वरूप

जब भगवान विष्णु अधिक मास को रोते हुए देखते हैं, तब उनका हृदय करुणा से भर जाता है। वे अत्यंत प्रेमपूर्वक अधिक मास को “वत्स” कहकर संबोधित करते हैं। भगवान उसे समझाते हैं कि जो व्यक्ति उनकी शरण में आता है, उसे कभी भय या शोक नहीं करना चाहिए।

भगवान कहते हैं कि वैकुंठ वह स्थान है जहां न मृत्यु का भय है, न बुढ़ापा, न दुख और न ही कोई चिंता। वहां केवल नित्य आनंद और शांति का वास है। ऐसे दिव्य स्थान में आकर भी अधिक मास दुखी है, यह देखकर स्वयं वैकुंठवासी भी आश्चर्यचकित हैं।

भगवान विष्णु का यह स्वरूप दर्शाता है कि ईश्वर केवल न्यायकारी ही नहीं, बल्कि अत्यंत दयालु और करुणामय भी हैं। वे अपने भक्तों के दुख को देखकर स्वयं व्याकुल हो जाते हैं। यही कारण है कि सनातन धर्म में भगवान विष्णु को “दीनबंधु” और “दीनवत्सल” कहा गया है।

अधिक मास का आत्मदुख और निराशा

भगवान के सांत्वना देने के बाद भी अधिक मास अपनी पीड़ा व्यक्त करता है। वह कहता है कि संसार में सभी समय — क्षण, निमेष, मुहूर्त, दिन, पक्ष और मास — सम्मानित हैं क्योंकि उनके अधिपति देवता हैं। लेकिन उसका कोई नाम, कोई स्वामी और कोई स्थान नहीं है।

वह कहता है कि लोग उसे अंधकारमय, अशुभ और त्याज्य मानते हैं। इस अपमान ने उसके मन को इतना तोड़ दिया है कि अब वह जीना नहीं चाहता। वह भगवान से कहता है कि अपमानित जीवन से मृत्यु अधिक श्रेष्ठ है।

यह प्रसंग मानव मनोविज्ञान का अत्यंत गहरा चित्रण करता है। जब व्यक्ति लगातार अपमान और असफलता का सामना करता है, तब उसके भीतर निराशा जन्म लेने लगती है। लेकिन यही वह समय होता है जब ईश्वर की शरण जीवन में नई आशा ला सकती है।

भगवान की शरण में आने का महत्व

पुरुषोत्तम मास महात्म्य का यह अध्याय स्पष्ट करता है कि भगवान कभी अपने शरणागत भक्त को निराश नहीं करते। संसार चाहे किसी को कितना भी छोटा समझे, ईश्वर की दृष्टि में प्रत्येक जीव महत्वपूर्ण है।

अधिक मास जब पूरी तरह टूट चुका था, तब भगवान विष्णु ने उसे आश्रय दिया। यही इस अध्याय का सबसे बड़ा संदेश है कि जब संसार साथ छोड़ देता है, तब भगवान अपने भक्त का हाथ पकड़ लेते हैं।

सनातन धर्म में शरणागति को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। जो व्यक्ति अपने अहंकार को त्यागकर भगवान की शरण में जाता है, उसके जीवन के दुख धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।

पुरुषोत्तम मास की महिमा क्यों बढ़ी?

अधिक मास का तिरस्कार देखकर भगवान विष्णु ने उसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया। इसी कारण यह मास संसार में सबसे पवित्र और पुण्यदायी माना जाने लगा।

जिस मास को लोग “मलमास” कहकर त्यागते थे, वही भगवान का प्रिय मास बन गया। यह घटना हमें सिखाती है कि ईश्वर की कृपा किसी भी अपमानित व्यक्ति के जीवन को महान बना सकती है।

पुरुषोत्तम मास में किए गए जप, तप, दान, व्रत और भक्ति का फल अनेक गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि भक्त इस मास में विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना करते हैं।

पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?

पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, दान-पुण्य और धार्मिक ग्रंथों का पाठ अत्यंत शुभ माना गया है। इस मास में विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम और भागवत कथा का श्रवण करने से महान पुण्य प्राप्त होता है।

भक्तों को इस मास में सात्विक जीवन अपनाना चाहिए। क्रोध, अहंकार और बुरे विचारों से दूर रहकर भगवान का स्मरण करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस मास में की गई सच्ची भक्ति जीवन के पापों को नष्ट कर देती है।

चतुर्थ अध्याय से मिलने वाली आध्यात्मिक शिक्षाएं

पुरुषोत्तम मास महात्म्य का चतुर्थ अध्याय अनेक गहरी आध्यात्मिक शिक्षाएं देता है। यह अध्याय सिखाता है कि अपमान और दुख जीवन का अंत नहीं हैं। यदि व्यक्ति धैर्य और विश्वास बनाए रखे, तो भगवान उसकी स्थिति बदल सकते हैं।

यह कथा हमें बताती है कि ईश्वर बाहरी सम्मान नहीं देखते, बल्कि भक्त का हृदय देखते हैं। जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, भगवान उसकी सहायता अवश्य करते हैं।

यह अध्याय यह भी सिखाता है कि किसी का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। जिस अधिक मास को संसार ने त्याग दिया था, वही बाद में सबसे पवित्र मास बन गया। इसलिए किसी व्यक्ति की वर्तमान स्थिति देखकर उसका अपमान नहीं करना चाहिए।

पुरुषोत्तम मास महात्म्य का चतुर्थ अध्याय भक्ति, करुणा और ईश्वर की कृपा का अद्भुत वर्णन है। यह अध्याय बताता है कि भगवान अपने भक्तों का कभी त्याग नहीं करते। संसार चाहे किसी को कितना भी अपमानित करे, यदि वह सच्चे मन से भगवान की शरण में जाता है, तो उसका जीवन बदल सकता है।

अधिक मास की यह कथा केवल धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि जीवन का गहरा सत्य है। जब मनुष्य पूरी तरह टूट जाता है, तब ईश्वर की कृपा उसके जीवन में नया प्रकाश बनकर आती है। यही कारण है कि पुरुषोत्तम मास को सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी माना गया है।

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