
Adhik Maas Chapter 1
अधिक मास को सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और विशेष महत्व वाला महीना माना गया है। यह महीना सामान्य मासों की तरह नहीं माना जाता, बल्कि इसे भगवान विष्णु को समर्पित एक दिव्य काल कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में इसका वर्णन पुरुषोत्तम मास के रूप में किया गया है। मान्यता है कि इस अवधि में किया गया जप, तप, दान, व्रत, कथा श्रवण और पूजा-पाठ साधारण दिनों की तुलना में कई गुना अधिक फल प्रदान करता है। इसी कारण श्रद्धालु अधिक मास में विशेष रूप से भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं तथा पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का पाठ करते हैं।
अधिक मास माहात्म्य का पहला अध्याय केवल धार्मिक कथा नहीं है बल्कि जीवन, धर्म और आध्यात्मिकता के गहन रहस्यों को समझाने वाला अध्याय है। इसमें ऋषियों की सभा, सूतजी का आगमन, तीर्थों का महत्व तथा भगवान की भक्ति का अद्भुत वर्णन मिलता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक समय ऐसा आया जब अधिक मास को कोई विशेष स्थान प्राप्त नहीं था। अन्य महीनों की तुलना में उसे महत्वहीन समझा जाता था। तब वह भगवान विष्णु की शरण में गया और उनसे अपनी पीड़ा व्यक्त की। भगवान विष्णु ने उसकी करुण पुकार सुनकर उसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया। तभी से यह महीना पुरुषोत्तम मास कहलाने लगा।
मान्यता है कि इस मास में किया गया कोई भी धार्मिक कार्य कई गुना फल देता है। यही कारण है कि श्रद्धालु इस समय विशेष पूजा, कथा पाठ, उपवास और दान-पुण्य करते हैं।
प्रथम अध्याय का आरंभ भगवान पुरुषोत्तम के दिव्य स्मरण और स्तुति से होता है। कथा की शुरुआत भगवान को प्रणाम करते हुए की जाती है —
“कल्पवृक्ष के समान अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले तथा अपनी दिव्य लीलाओं से समस्त लोकों को चमत्कृत करने वाले वृन्दावन बिहारी पुरुषोत्तम भगवान को मेरा प्रणाम है। नारायण, नर, नरोत्तम, देवी सरस्वती और श्री व्यासजी को भी मेरा प्रणाम।”
हिंदू धर्म में किसी भी धार्मिक कथा का प्रारंभ ईश्वर स्मरण से करना शुभ माना जाता है। इससे मन, बुद्धि और वातावरण शुद्ध होता है तथा व्यक्ति की एकाग्रता बढ़ती है।
इस अध्याय के अनुसार एक समय अनेक महान ऋषि-मुनि यज्ञ करने के उद्देश्य से पवित्र नैमिषारण्य पहुंचे। वहां असित, कश्यप, जाबालि, भृगु, अंगिरा, अगस्त्य, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज और अनेक महान तपस्वी ऋषि उपस्थित हुए।
इन ऋषियों का उद्देश्य केवल यज्ञ करना नहीं था। वे संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए एकत्र हुए थे। वेदों के ज्ञाता, तपस्वी और धर्मनिष्ठ ऋषियों ने अपने ज्ञान और साधना के बल पर समाज में धर्म की स्थापना का कार्य किया।
नैमिषारण्य को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। मान्यता है कि यहां किए गए जप, तप और यज्ञ से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। अनेक धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
उसी समय पृथ्वी पर तीर्थयात्रा करते हुए सूतजी नैमिषारण्य पहुंचे। सूतजी अत्यंत ज्ञानी, विनम्र और धर्म के रहस्यों को समझने वाले महापुरुष थे। जब उन्होंने वहां उपस्थित ऋषियों को देखा तो उन्होंने आदरपूर्वक सभी को प्रणाम किया।
ग्रंथों में सूतजी के स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। उनके शरीर पर लाल वृक्ष की छाल थी। उनके शरीर पर शंख और चक्र के चिह्न अंकित थे। वे तुलसी की माला धारण किए हुए थे और गोपीचंदन से अलंकृत थे।
उनका व्यक्तित्व इतना तेजस्वी और दिव्य था कि वहां उपस्थित सभी ऋषि सम्मानपूर्वक खड़े हो गए।
उनका स्वरूप केवल बाहरी सजावट का प्रतीक नहीं था बल्कि उनके भीतर की आध्यात्मिक शक्ति, ज्ञान और वैराग्य को भी दर्शाता था।
सभी ऋषियों ने सूतजी का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उनसे कहा —
“हे सूतजी! आप अत्यंत भाग्यशाली हैं। आप भगवान व्यासजी की शिक्षाओं और उनके वास्तविक अर्थ को जानते हैं। कृपया हमें ऐसी कथा सुनाइए जो संसार रूपी समुद्र से पार लगाने वाली हो।”
ऋषियों के इन शब्दों से एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि चाहे व्यक्ति कितना भी ज्ञानवान क्यों न हो, ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए।
आज के समय में भी यदि मनुष्य सीखने की भावना बनाए रखता है तो वह निरंतर प्रगति करता रहता है।
ऋषियों के अनुरोध पर सूतजी ने अपनी तीर्थयात्रा का वर्णन करना आरंभ किया।
उन्होंने बताया कि वे सबसे पहले पुष्कर तीर्थ पहुंचे। वहां उन्होंने स्नान किया और देवताओं तथा पितरों का तर्पण किया। इसके बाद वे यमुना तट गए और फिर क्रमशः अनेक पवित्र तीर्थों की यात्रा करते रहे।
उन्होंने काशी, गया, त्रिवेणी, गंडकी, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा, तापी, सरस्वती और अनेक अन्य पवित्र नदियों तथा तीर्थस्थलों में स्नान किया।
इसके बाद वे सेतुबंध रामेश्वर पहुंचे और वहां से बदरिकाश्रम जाकर भगवान नारायण के दर्शन किए।
सूतजी की यह यात्रा केवल स्थानों की यात्रा नहीं थी बल्कि यह आध्यात्मिक जागरण की यात्रा थी। प्रत्येक तीर्थ का संबंध किसी न किसी दिव्य घटना, तपस्या या आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ा हुआ माना जाता है।
सूतजी ने आगे बताया कि तीर्थ भ्रमण करते हुए वे हस्तिनापुर पहुंचे। वहां उन्होंने सुना कि राजा परीक्षित अपना राज्य छोड़कर गंगा तट पर चले गए हैं।
गंगा के तट पर अनेक सिद्ध पुरुष, योगी, ऋषि और देवर्षि एकत्रित थे। वहां धर्म और आध्यात्मिक चर्चा का अद्भुत वातावरण था।
सूतजी भी उस सभा में पहुंचे और वहां उन्होंने एक दिव्य दृश्य देखा।
सभा के मध्य भगवान व्यासजी के पुत्र श्री शुकदेव जी का आगमन हुआ। शुकदेव जी अत्यंत तेजस्वी और ब्रह्मज्ञानी थे।
उनका वर्णन कुछ इस प्रकार मिलता है —
वे लगभग सोलह वर्ष की आयु के थे, उनका शरीर दिव्य आभा से प्रकाशित था, वे अवधूत स्वरूप में थे और पूर्ण ब्रह्मज्ञान से युक्त थे।
उनके शरीर पर धूल लगी हुई थी, किंतु उनका तेज सूर्य के समान चमक रहा था। जैसे तारों के बीच पूर्णिमा का चंद्रमा विशेष रूप से दिखाई देता है, उसी प्रकार ऋषियों की सभा में शुकदेव जी अत्यंत दिव्य प्रतीत हो रहे थे।
उनके आते ही सभी ऋषि सम्मानपूर्वक खड़े हो गए।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का प्रथम अध्याय हमें अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाएं प्रदान करता है।
यह अध्याय बताता है कि सत्संग व्यक्ति के जीवन को बदल सकता है। अच्छे विचार और अच्छे लोगों की संगति मनुष्य को धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ाती है।
यह हमें यह भी सिखाता है कि तीर्थ केवल यात्रा के स्थान नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धि के केंद्र हैं।
इसके अतिरिक्त यह अध्याय विनम्रता का भी संदेश देता है। महान ऋषि भी सदैव सीखने की इच्छा रखते थे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भगवान विष्णु की भक्ति जीवन के कष्टों को कम करने और मानसिक शांति प्रदान करने का माध्यम बनती है।
अधिक मास में धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व बताया गया है। इस अवधि में भगवान विष्णु की पूजा करना, तुलसी पूजन करना, पुरुषोत्तम मास कथा पढ़ना, गरीबों को दान देना, व्रत रखना और मंत्र जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ इन कार्यों को करता है उसे विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का पहला अध्याय केवल एक धार्मिक कथा नहीं बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला आध्यात्मिक मार्गदर्शन है। इसमें धर्म, ज्ञान, विनम्रता, सत्संग और भगवान की भक्ति का गहरा संदेश छिपा हुआ है।
जो व्यक्ति अधिक मास में श्रद्धापूर्वक इस कथा का पाठ करता है या इसका श्रवण करता है, उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
॥ हरिः शरणम् ॥
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