Bhagavad Gita

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 40

गीता के अनुसार संशयी व्यक्ति का क्या होता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 40 अज्ञश्चाश्रद्धानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥४०॥ अर्थात भगवान […]

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 39

श्रद्धा और संयम से कैसे मिलती है परम शांति?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 39 श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥३९॥ अर्थात भगवान कहते हैं,

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 38

क्या यज्ञ दान और तप से बढ़कर ज्ञान पवित्र है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 38 न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥३८॥ अर्थात भगवान

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 37

क्या ज्ञानरूपी अग्नि सभी पाप और कर्मों को जला सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 37 यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते ऽर्जुन ।ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥३७॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे अर्जुन!

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 36

क्या ज्ञान से सभी पाप नष्ट हो सकते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 36 अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥३६॥ अर्थात भगवान अर्जुन को

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 35

गीता के अनुसार आत्मज्ञान से परमात्मा का अनुभव कैसे होता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 35 यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥३५॥ अर्थात भगवान कहते

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 34

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गुरु से ज्ञान प्राप्त करने की सलाह क्यों दी?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 34 तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥३४॥ अर्थात भगवान कहते हैं,

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Bhagavad Gita Chapter Verse 33

भगवद गीता में ज्ञानयज्ञ को सर्वोत्तम क्यों कहा गया है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 33 श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥३३॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे अर्जुन!

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 32

भगवद गीता में यज्ञ को मोक्ष का साधन क्यों कहा गया है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 32 एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२॥ अर्थात

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 31

गीता के अनुसार यज्ञशिष्टामृतभुजः श्लोक का क्या अर्थ है और यज्ञ क्यों आवश्यक है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 31 यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥३१॥ अर्थात भगवान कहते हैं,

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 29 30

गीता में प्राणायाम रूपी यज्ञ क्या है और इससे पाप कैसे नष्ट होते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 29 30 अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥२९॥अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 28

गीता के अनुसार द्रव्ययज्ञ तपोयज्ञ योगयज्ञ और ज्ञानयज्ञ क्या हैं?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 28 द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥२८॥ अर्थात भगवान कहते हैं, अन्य अनेक प्रशंसनीय

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