Bhagavad Gita

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 5

सांख्य योग और कर्म योग में क्या है समानता?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 5 यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स […]

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Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 4

क्या सांख्य योग और कर्म योग के फल अलग-अलग हैं?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 4 सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥४॥ अर्थात भगवान कहते हैं,

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Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 3

कर्मयोगी और संन्यासी में क्या अंतर है? 

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 3 ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते

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Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 2

भगवान श्रीकृष्ण ने संन्यास से ऊपर कर्मयोग को क्यों बताया?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 2 श्रीभगवानुवाच ।संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥२॥ भगवान ने कहा – संन्यास (सांख्य

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Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 1

भगवद गीता में संन्यास और कर्मयोग में कौन है श्रेष्ठ?

Bhagavad Gita Chapter 5 Verse 1 अर्जुन उवाचसंन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ।।१।।

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 42

गीता के अनुसार संशय को दूर करने का उपाय क्या है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 42 तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥४२॥ अर्थात भगवान कहते हैं, अतः हे

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 41

कर्मयोग में आत्मज्ञान और निष्काम भाव का क्या महत्व है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 41 योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥४१॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे धनंजय!

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 40

गीता के अनुसार संशयी व्यक्ति का क्या होता है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 40 अज्ञश्चाश्रद्धानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥४०॥ अर्थात भगवान

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 39

श्रद्धा और संयम से कैसे मिलती है परम शांति?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 39 श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥३९॥ अर्थात भगवान कहते हैं,

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 38

क्या यज्ञ दान और तप से बढ़कर ज्ञान पवित्र है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 38 न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥३८॥ अर्थात भगवान

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 37

क्या ज्ञानरूपी अग्नि सभी पाप और कर्मों को जला सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 37 यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते ऽर्जुन ।ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥३७॥ अर्थात भगवान कहते हैं, हे अर्जुन!

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Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 36

क्या ज्ञान से सभी पाप नष्ट हो सकते हैं?

Bhagavad Gita Chapter 4 Verse 36 अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥३६॥ अर्थात भगवान अर्जुन को

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