
Vikata Sankashti Chaturthi 2026
विकट संकष्टी चतुर्थी का दिन भगवान भगवान गणेश को समर्पित होता है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत रखने और व्रत कथा का पाठ करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन कथा का पाठ करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।
विकट संकष्टी चतुर्थी क्या है?
विकट संकष्टी चतुर्थी हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। यह हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है, लेकिन वैशाख मास में पड़ने वाली चतुर्थी को विशेष रूप से “विकट संकष्टी चतुर्थी” कहा जाता है।
“विकट” का अर्थ होता है कठिन या संकटपूर्ण स्थिति।
इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन के सभी “विकट” यानी कठिन संकट समाप्त हो जाते हैं।
विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (विस्तार से)
प्राचीन समय में धर्मकेतु नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी दो पत्नियां थीं—सुशीला और चंचला।
- सुशीला अत्यंत धार्मिक, सरल और भक्ति में लीन रहने वाली थी।
- चंचला को धर्म-कर्म में कोई रुचि नहीं थी, वह भौतिक सुखों में ही मग्न रहती थी।
समय बीतने पर सुशीला को एक पुत्री और चंचला को एक पुत्र प्राप्त हुआ। इस पर चंचला ने सुशीला का उपहास उड़ाया और कहा कि इतने व्रत-पूजा करने के बावजूद उसे पुत्र नहीं मिला।
यह बात सुशीला को बहुत दुखी कर गई, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने पूर्ण श्रद्धा के साथ विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा और भगवान गणेश की पूजा की।
उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उसे एक तेजस्वी और गुणवान पुत्र का आशीर्वाद दिया।
जीवन में आया बड़ा बदलाव
कुछ समय बाद धर्मकेतु का देहांत हो गया और दोनों पत्नियां अलग रहने लगीं।
- सुशीला का पुत्र बड़ा होकर अत्यंत विद्वान और सफल बना।
- उनके घर में सुख, शांति और समृद्धि आने लगी।
वहीं दूसरी ओर—
- चंचला का पुत्र आलसी और अवगुणों से भरा हुआ निकला।
ईर्ष्या और पाप
सुशीला की उन्नति देखकर चंचला के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गई।
एक दिन उसने अवसर पाकर सुशीला के पुत्र को कुएं में धक्का दे दिया।
लेकिन यहां हुआ चमत्कार…
सुशीला की भक्ति और व्रत के प्रभाव से स्वयं भगवान गणेश ने उसके पुत्र की रक्षा की और उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
पश्चाताप और सुधार
जब चंचला ने यह चमत्कार देखा, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
वह शर्मिंदा होकर सुशीला के पास गई और माफी मांगी।
सुशीला ने उसे क्षमा कर दिया और उसे संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व बताया।
इसके बाद चंचला ने भी श्रद्धा के साथ व्रत करना शुरू किया।
परिणाम:
- उसका जीवन सुधर गया
- उसके पुत्र को भी सद्बुद्धि प्राप्त हुई
विकट संकष्टी चतुर्थी का महत्व
इस व्रत का महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है—
- जीवन के सभी संकट दूर होते हैं
- संतान सुख की प्राप्ति होती है
- धन और समृद्धि में वृद्धि होती है
- मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है
- पापों का नाश होता है
पूजा विधि (Step-by-Step)
- प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें
- भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें
- दूर्वा, मोदक, लड्डू और फूल अर्पित करें
- गणेश मंत्र का जाप करें
- संध्या समय चंद्र दर्शन करें
- व्रत कथा का पाठ अवश्य करें
- अंत में आरती करके प्रसाद ग्रहण करें
व्रत के नियम
- पूरे दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखें
- चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोलें
- सात्विक भोजन करें
- मन में श्रद्धा और सकारात्मक भाव रखें
व्रत के चमत्कारी लाभ
- सभी बाधाएं दूर होती हैं
- नौकरी और व्यवसाय में सफलता मिलती है
- विवाह और संतान से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं
- घर में सुख-शांति बनी रहती है
- भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है
विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाला एक आध्यात्मिक साधन है। यदि इस दिन सच्चे मन से भगवान भगवान गणेश की पूजा और व्रत कथा का पाठ किया जाए, तो हर प्रकार की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।
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