Purushottam Maas Katha 6 : जब Adhik Maas को मिला श्रीकृष्ण का सहारा

Purushottam Maas Katha 6

Purushottam Maas Katha 6

पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास या मलमास भी कहा जाता है, सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। इस मास में भगवान श्रीहरि विष्णु और श्रीकृष्ण की उपासना विशेष फलदायी होती है। श्रीबृहन्नारदीय पुराण में वर्णित “पुरुषोत्तम मास माहात्म्य” की कथा भक्तों को भक्ति, करुणा और भगवान की अनंत कृपा का अद्भुत संदेश देती है।

छठे अध्याय में एक अत्यंत भावुक और दिव्य प्रसंग आता है, जहाँ भगवान विष्णु दुःखी और अपमानित अधिमास को लेकर सीधे गोलोक धाम पहुँचते हैं और भगवान श्रीकृष्ण से उसके दुःख दूर करने की प्रार्थना करते हैं। यह अध्याय केवल कथा नहीं, बल्कि यह बताता है कि भगवान अपने शरणागत भक्तों का कभी त्याग नहीं करते।

नारदजी का प्रश्न – गोलोक में भगवान क्या करते हैं?

कथा का आरम्भ नारदजी के प्रश्न से होता है। वे भगवान नारायण से पूछते हैं—

“हे प्रभु! जब भगवान विष्णु अधिमास को लेकर गोलोक धाम पहुँचे, तब वहाँ क्या हुआ? कृपा करके वह दिव्य प्रसंग मुझे सुनाइये।”

नारदजी की यह जिज्ञासा केवल एक कथा जानने के लिये नहीं थी, बल्कि वे उस दिव्य रहस्य को समझना चाहते थे कि आखिर भगवान अपने शरणागत के दुःख को किस प्रकार दूर करते हैं।

गोलोक धाम का अद्भुत दिव्य वर्णन

भगवान नारायण कहते हैं कि जब भगवान विष्णु अधिमास को लेकर गोलोक पहुँचे, तब उन्होंने दूर से ही भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के दिव्य धाम को देखा।

गोलोक धाम मणियों के स्तम्भों, दिव्य प्रकाश और अलौकिक तेज से सुशोभित था। वहाँ का तेज इतना प्रखर था कि स्वयं भगवान विष्णु की आँखें कुछ क्षणों के लिये बन्द हो गयीं। धीरे-धीरे उन्होंने नेत्र खोले और अधिमास को अपने पीछे लेकर श्रीकृष्ण के धाम की ओर बढ़ने लगे।

यह दृश्य अत्यंत भावुक था—एक ओर समस्त जगत के पालनहार भगवान विष्णु और दूसरी ओर अपमानित, निराश और दुःख से काँपता अधिमास।

भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का वर्णन

जब भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के महल में पहुँचे, तब उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के मध्य रत्नमय सिंहासन पर विराजमान हैं। उनका स्वरूप करोड़ों कामदेवों से भी अधिक सुंदर था।

श्रीकृष्ण का दिव्य स्वरूप

  • नवीन मेघ के समान श्याम वर्ण
  • पीताम्बर धारण किये हुए
  • मुरली हाथ में सुशोभित
  • सिर पर मोर मुकुट
  • रासमंडल के स्वामी
  • दो भुजाओं वाले मधुर गोपाल रूप
  • वृन्दावन की दिव्य शोभा से युक्त

भगवान विष्णु ने अत्यंत विनम्रता से श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगे।

भगवान विष्णु द्वारा श्रीकृष्ण की स्तुति

भगवान विष्णु ने कहा—

“हे गोविन्द! आप गुणों से परे, अद्वितीय, अविनाशी, शांत स्वरूप और समस्त रासलीलाओं के स्वामी हैं। आप मुरलीधर, पीताम्बरधारी और भक्तों के परम आश्रय हैं। मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ।”

शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रातःकाल इस स्तुति का श्रद्धा से पाठ करता है—

  • उसके पाप नष्ट हो जाते हैं
  • बुरे स्वप्न शुभ फल देने लगते हैं
  • घर में सुख-समृद्धि आती है
  • भगवान गोविन्द में भक्ति बढ़ती है
  • अपयश दूर होकर यश की प्राप्ति होती है

अधिमास की करुण स्थिति देखकर श्रीकृष्ण का प्रश्न

भगवान विष्णु के साथ काँपते हुए अधिमास ने श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम किया। उसे रोता हुआ देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने आश्चर्य से पूछा—

“यह कौन है? यह इतना दुःखी क्यों है? गोलोक में तो कोई दुःखी नहीं रहता। यहाँ रहने वाले सदैव आनंद में मग्न रहते हैं।”

भगवान श्रीकृष्ण के ये वचन यह दर्शाते हैं कि दिव्य धाम में दुःख का कोई स्थान नहीं होता। वहाँ केवल प्रेम, आनंद और भक्ति का निवास होता है।

भगवान विष्णु ने सुनाई अधिमास की दुःखभरी कथा

तब भगवान विष्णु सिंहासन से उठे और अत्यंत करुण भाव से श्रीकृष्ण से बोले—

“हे प्रभु! यह अधिमास अत्यंत दुःखी है। सूर्य संक्रांति न होने के कारण सभी ने इसे अशुभ और मलिन कहकर तिरस्कृत किया। सभी महीनों, तिथियों और कालों ने अपने-अपने स्वामी होने के अभिमान में इसका अपमान किया।”

उन्होंने आगे कहा—

  • शुभ कार्यों में इसे वर्जित माना गया
  • लोगों ने इसका निरादर किया
  • इसे स्वामी रहित मास कहा गया
  • इसके कारण यह निराश होकर मृत्यु का विचार करने लगा

जब किसी ने इसका सहारा नहीं दिया, तब यह काँपता हुआ भगवान विष्णु की शरण में आया।

भगवान की शरण में आने वाला कभी दुःखी नहीं रहता

भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण से कहा—

“हे प्रभु! वेद कहते हैं कि जो आपके चरणों में आता है, वह कभी शोक का भागी नहीं होता। अतः इस दुःखी अधिमास पर कृपा कीजिये।”

यह प्रसंग भक्तों को एक महान संदेश देता है कि संसार चाहे कितना भी अपमान करे, लेकिन भगवान अपने शरणागत को कभी नहीं छोड़ते।

जब सभी द्वार बन्द हो जाते हैं, तब भगवान का द्वार खुलता है।

अधिमास की कथा से मिलने वाली आध्यात्मिक सीख

यह अध्याय केवल पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि जीवन का गहरा सत्य भी बताता है।

1. भगवान शरणागत की रक्षा करते हैं

जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान की शरण में जाता है, भगवान उसके दुःख अवश्य दूर करते हैं।

2. अपमान और दुःख अंत नहीं हैं

अधिमास का अपमान हुआ, लेकिन वही आगे चलकर सबसे पवित्र “पुरुषोत्तम मास” बना।

3. अहंकार विनाश का कारण है

दूसरे महीनों ने अपने स्वामी होने के अभिमान में अधिमास का तिरस्कार किया। यह अहंकार की बुराई को दर्शाता है।

4. भगवान करुणा के सागर हैं

भगवान श्रीकृष्ण और विष्णु दोनों ही दीन-दुःखियों पर विशेष कृपा करते हैं।

पुरुषोत्तम मास में क्या करना चाहिए?

इस कथा के अनुसार पुरुषोत्तम मास में किये गये पुण्य कार्य विशेष फल प्रदान करते हैं।

पुरुषोत्तम मास में करने योग्य कार्य

  • भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा
  • श्रीमद्भागवत और गीता पाठ
  • दान-पुण्य
  • तुलसी पूजा
  • हरिनाम संकीर्तन
  • व्रत और जप
  • दीपदान

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का छठा अध्याय हमें भगवान की अनंत करुणा और शरणागत भक्तों के प्रति उनके प्रेम का अद्भुत दर्शन कराता है। अधिमास, जिसे संसार ने तिरस्कृत किया, वही भगवान की कृपा से सबसे श्रेष्ठ और पवित्र मास बन गया।

यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितने भी दुःख, अपमान और असफलताएँ क्यों न आयें, यदि मनुष्य भगवान की शरण में चला जाये तो उसका उद्धार निश्चित है।

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