
Purushottam Maas Adhyay 3 – 2026
सनातन धर्म में बृहन्नारदीय पुराण का विशेष महत्व माना गया है। इसी पवित्र ग्रंथ में वर्णित है पुरुषोत्तम मास का दिव्य माहात्म्य, जो भगवान श्रीकृष्ण और भगवान विष्णु की अनंत कृपा का प्रतीक है। पुरुषोत्तम मास केवल एक अतिरिक्त मास नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, पापों के नाश और भगवान की प्राप्ति का दुर्लभ अवसर माना गया है।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के तृतीय अध्याय में हमें महाभारत काल की वह करुण और दिव्य घटना देखने को मिलती है, जब पांडव वनवास में दुख भोग रहे थे, द्रौपदी अपमानित हुई थीं, और भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों की पीड़ा देखकर क्रोधित हो उठे थे। इसी अध्याय में मलमास की उत्पत्ति और उसका भगवान विष्णु की शरण में जाना भी वर्णित है।
यह कथा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जीवन के गहरे सत्य, भक्ति, धैर्य और भगवान की करुणा का अद्भुत संदेश देती है।
वनवास में पांडवों की दुःखद स्थिति
कथा के अनुसार, जब दुर्योधन और धृतराष्ट्र के पुत्रों ने छलपूर्वक द्यूतक्रीड़ा में धर्मराज युधिष्ठिर को पराजित कर दिया, तब पांडवों को अपना राज्य त्यागकर वनवास जाना पड़ा। सभा में धर्मपरायण द्रौपदी का अपमान किया गया और दुष्ट दुशासन ने उनके वस्त्रहरण का प्रयास किया।
उस समय संपूर्ण सभा मौन थी, लेकिन भक्तवत्सल श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई। यही भगवान की वह करुणा है, जो सच्चे भक्तों की पुकार सुनते ही प्रकट हो जाती है।
वनवास में पांडव अत्यंत कष्टपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे। वे जंगल के फल और कंद-मूल खाकर जीवन चला रहे थे। उनके शरीर पर धूल जमी रहती थी, बाल बिखरे हुए थे और वे अत्यंत दुर्बल हो चुके थे। द्रौपदी भी दुख और कष्टों से घिरी हुई थीं।
भगवान श्रीकृष्ण का काम्यवन आगमन
जब भगवान श्रीकृष्ण को पांडवों की इस दयनीय स्थिति का समाचार मिला, तब वे अनेक मुनियों के साथ काम्यवन पहुंचे। भगवान को देखते ही पांडव ऐसे प्रसन्न हुए जैसे मृत शरीर में पुनः प्राण आ गए हों।
भीमसेन, अर्जुन और युधिष्ठिर सहित सभी पांडव प्रेमविह्वल होकर भगवान के चरणों में गिर पड़े। द्रौपदी ने भी विनम्रता से भगवान को प्रणाम किया।
जब श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्तों की यह दीन अवस्था देखी, तब उनका हृदय करुणा से भर गया। भक्तों के कष्ट को देखकर भगवान के भीतर भयंकर क्रोध उत्पन्न हुआ। वे धृतराष्ट्र के पुत्रों का संहार करने के लिए तत्पर हो उठे।
भगवान श्रीकृष्ण का प्रलयकारी क्रोध
पुराण में वर्णन आता है कि उस समय भगवान का स्वरूप अत्यंत भयानक हो गया। उनके नेत्र अग्नि की भांति धधक रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रलयकाल की अग्नि तीनों लोकों को भस्म कर देगी।
यह वही क्रोध था जो भगवान राम को सीता माता के वियोग में रावण पर आया था।
भगवान के इस प्रचंड रूप को देखकर अर्जुन भयभीत हो उठे। उन्होंने हाथ जोड़कर श्रीकृष्ण की स्तुति की और उन्हें शांत करने का प्रयास किया।
अर्जुन की श्रीकृष्ण से प्रार्थना
अर्जुन बोले —
“हे जगन्नाथ! आप समस्त संसार के स्वामी हैं। आप ही सृष्टि के पालनकर्ता हैं। यदि आप क्रोधित होकर संपूर्ण संसार का विनाश कर देंगे, तो यह उचित कैसे होगा?”
उन्होंने आगे कहा —
“क्या कोई व्यक्ति मच्छरों को जलाने के लिए अपने ही घर को आग लगा देता है?”
अर्जुन की यह प्रार्थना अत्यंत गूढ़ संदेश देती है कि धर्म और न्याय के लिए भी क्रोध पर नियंत्रण आवश्यक है। भगवान स्वयं भी अपने भक्त की विनती से प्रसन्न होकर शांत हो जाते हैं।
श्रीकृष्ण का शांत होना
अर्जुन की विनम्र प्रार्थना सुनकर भगवान श्रीकृष्ण का क्रोध शांत हो गया। उनका मुख पुनः चंद्रमा के समान शीतल और सौम्य हो गया।
भगवान को शांत देखकर पांडवों के हृदय में भी शांति लौट आई। उन्होंने जंगल के फल, कंद-मूल और वन्य पदार्थों से भगवान की पूजा की।
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति भगवान को भी प्रेम से बांध लेती है।
अर्जुन का रहस्यमयी प्रश्न
इसके बाद अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछा। उन्होंने पुरुषोत्तम मास और काल के रहस्य को जानने की इच्छा प्रकट की।
भगवान श्रीकृष्ण बोले —
“हे अर्जुन! तुमने अत्यंत दुर्लभ प्रश्न पूछा है। यह रहस्य ऋषियों के लिए भी कठिन है, परंतु तुम मेरे भक्त और मित्र हो, इसलिए मैं तुम्हें यह गुप्त ज्ञान प्रदान करता हूँ।”
कालचक्र और सृष्टि का रहस्य
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि चैत्र से लेकर बारहों मास, दिन-रात, पक्ष, ऋतुएं, मुहूर्त, उत्तरायण-दक्षिणायन, वर्ष और चारों युग — ये सभी काल के स्वरूप हैं।
इसी प्रकार नदियां, पर्वत, वृक्ष, वनस्पतियां, गांव, नगर और संपूर्ण सृष्टि अपने-अपने अधिष्ठाता देवताओं से युक्त हैं।
इस संसार में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिसका कोई देवता या दिव्य अधिष्ठान न हो।
मलमास की उत्पत्ति और उसका अपमान
भगवान श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि एक समय अतिरिक्त मास उत्पन्न हुआ। क्योंकि उस मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती थी, इसलिए लोगों ने उसे अपवित्र और त्याज्य मान लिया।
लोग उसे “मलमास” कहकर तिरस्कार करने लगे। शुभ कार्यों में उसका उपयोग नहीं किया जाता था। कोई भी उस मास का सम्मान नहीं करता था।
यह अपमान सहकर मलमास अत्यंत दुखी हो गया। वह स्वयं को निरर्थक और असहाय समझने लगा।
यह प्रसंग मानव जीवन का भी प्रतीक है। जब समाज किसी व्यक्ति को तुच्छ समझता है, तब उसका मन टूट जाता है। लेकिन भगवान की शरण हर दुख का अंत कर देती है।
मलमास का भगवान विष्णु की शरण में जाना
अत्यंत दुखी होकर मलमास वैकुंठ धाम पहुंचा, जहां भगवान भगवान विष्णु विराजमान थे।
वह भगवान के समक्ष भूमि पर साष्टांग दंडवत होकर रोने लगा। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। वह गदगद वाणी में अपनी पीड़ा व्यक्त करने लगा।
यह दृश्य अत्यंत भावुक और भक्तिमय है। भगवान के चरणों में पहुंचकर ही दुखी जीव को सच्ची शांति प्राप्त होती है।
नारद मुनि की जिज्ञासा
जब नारद मुनि ने यह कथा सुनी, तब उनके मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने भगवान से पूछा —
“हे प्रभु! जब अधिक मास आपके चरणों में पहुंचा, तब उसने क्या कहा?”
इसी प्रश्न के साथ तृतीय अध्याय समाप्त होता है और अगले अध्याय की भूमिका तैयार होती है।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य अध्याय 3 से मिलने वाली शिक्षाएं
1. भगवान सच्चे भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं
द्रौपदी की लाज बचाकर भगवान श्रीकृष्ण ने सिद्ध किया कि जो भक्त पूर्ण श्रद्धा से भगवान को पुकारता है, उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं।
2. दुख में धैर्य रखना चाहिए
पांडवों ने अपार कष्ट सहकर भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। यह हमें कठिन समय में धैर्य रखने की प्रेरणा देता है।
3. अपमानित और दुखी व्यक्ति को तुच्छ नहीं समझना चाहिए
जिस मलमास को संसार ने अपवित्र कहा, वही आगे चलकर भगवान का प्रिय “पुरुषोत्तम मास” बना। इसलिए किसी का अपमान नहीं करना चाहिए।
4. भगवान की शरण ही अंतिम सहारा है
जब संसार ने मलमास को ठुकरा दिया, तब भगवान विष्णु ने उसे अपनाया। यही भक्ति का सार है।
पुरुषोत्तम मास का आध्यात्मिक महत्व
पुरुषोत्तम मास को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना जाता है। इस मास में किए गए जप, तप, दान, कथा श्रवण और भक्ति का फल अनेक गुना बढ़ जाता है।
इस दौरान विशेष रूप से —
- श्रीमद्भागवत कथा श्रवण
- भगवान विष्णु की पूजा
- गीता पाठ
- तुलसी सेवा
- व्रत और दान
अत्यंत पुण्यदायी माने जाते हैं।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का तृतीय अध्याय भक्ति, करुणा, धर्म और भगवान की कृपा का अद्भुत संगम है। यह अध्याय बताता है कि चाहे संसार कितना भी अपमान करे, भगवान की शरण में जाने वाला कभी निराश नहीं होता।
पांडवों का दुःख, द्रौपदी की पुकार, अर्जुन की विनम्रता और मलमास की पीड़ा — ये सभी प्रसंग हमें जीवन की गहरी आध्यात्मिक सीख देते हैं।
जो व्यक्ति श्रद्धा से पुरुषोत्तम मास में भगवान का स्मरण करता है, उसके जीवन के पाप और कष्ट धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
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