
Purushottam Maas Adhyay 29
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य के अध्याय 29 में भगवान श्रीनारायण एक अत्यंत आश्चर्यजनक और प्रेरणादायक कथा का वर्णन करते हैं। यह अध्याय केवल पुरुषोत्तम मास की महिमा का ही वर्णन नहीं करता, बल्कि यह भी बताता है कि भगवान की कृपा कितनी असीम है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने अपने जीवन में असंख्य पाप किए थे, वह भी पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से गोलोक धाम को प्राप्त हो गया। साथ ही इस अध्याय में आदर्श गृहस्थ जीवन के नियम, दैनिक कर्तव्य और धर्माचरण की विस्तृत शिक्षा भी दी गई है, जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी प्राचीन काल में थी।
कदर्य ब्राह्मण को अपने उद्धार पर हुआ आश्चर्य
जब पुण्यशील और सुशील ने कदर्य ब्राह्मण से गोलोक चलने का आग्रह किया, तब वह अत्यंत आश्चर्यचकित हो गया। उसने विनम्रता से पूछा कि उसके जैसे पापी व्यक्ति को यह दिव्य पद कैसे प्राप्त हुआ। उसने स्वीकार किया कि उसके जीवन में इतने पाप हैं जितनी पृथ्वी पर धूल, आकाश में तारे और वर्षा की धाराएँ हैं। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे इतना सुंदर दिव्य शरीर और भगवान पुरुषोत्तम का सान्निध्य कैसे प्राप्त हुआ। उसका प्रश्न केवल उसका नहीं, बल्कि उन सभी लोगों का प्रश्न है जो अपने अतीत की गलतियों के कारण स्वयं को भगवान की कृपा से वंचित मान लेते हैं।
हरिदूतों ने बताया पुरुषोत्तम मास का चमत्कार
भगवान के दूतों ने कदर्य को उसके उद्धार का वास्तविक कारण बताया। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में वह एक वानर था और मुख रोग से पीड़ित होने के कारण भोजन नहीं कर पाता था। उसी दौरान पुरुषोत्तम मास आया और अनजाने में ही उससे कठोर उपवास होने लगे। वह जंगल में भटकता रहा, धूप, वर्षा, शीत और वायु को सहन करता रहा। वृक्षों से फल तोड़कर नीचे फेंक देता था, जिनसे अन्य मनुष्यों और जीवों की भूख मिटती थी। वह कई बार जल भी नहीं पीता था और एक पवित्र तीर्थ में पाँच दिनों तक स्नान करता रहा। यद्यपि उसने यह सब किसी धार्मिक भावना से नहीं किया था, फिर भी पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से उसके ये सभी कर्म तप, दान, उपवास और तीर्थस्नान के समान फलदायी बन गए।
अज्ञान में किया गया पुरुषोत्तम मास का पालन भी देता है महान फल
हरिदूतों ने कदर्य को समझाया कि यदि केवल अज्ञानवश किए गए पुरुषोत्तम मास के पालन से उसे गोलोक की प्राप्ति हो सकती है, तो जो व्यक्ति श्रद्धा, भक्ति और विधिपूर्वक इस मास का पालन करता है, उसे कितने महान फल प्राप्त होंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस मास में किया गया एक उपवास भी मनुष्य को अनेक पापों से मुक्त कर सकता है। स्नान, दान, जप, तप, पितृकार्य और भगवान की उपासना इस महीने में अन्य महीनों की तुलना में करोड़ों गुना अधिक फल देने वाली बताई गई है।
कदर्य ब्राह्मण की दिव्य गोलोक यात्रा
जब कदर्य ने अपने उद्धार का रहस्य सुना तो उसका हृदय आनंद और विस्मय से भर गया। उसने तीर्थों, पर्वतों, वृक्षों और वनदेवताओं को प्रणाम किया तथा विनम्र भाव से दिव्य विमान की परिक्रमा की। इसके बाद वह सुंदर पीताम्बर धारण कर विमान पर आरूढ़ हुआ। देवताओं ने उस पर पुष्पवर्षा की, गंधर्वों ने स्तुतियाँ गाईं और किन्नरों ने वाद्य बजाकर उसका स्वागत किया। अंततः वह उस गोलोक धाम में पहुँचा जहाँ न मृत्यु है, न बुढ़ापा और न ही किसी प्रकार का शोक। वहाँ भगवान श्रीकृष्ण गोप-गोपियों और गौओं के साथ दिव्य लीलाएँ करते हैं। पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से एक वानर योनि में जन्मा जीव भी उस परम धाम को प्राप्त कर सका।
नारद मुनि ने पूछा गृहस्थ जीवन के आदर्श नियम
इस अद्भुत घटना को सुनने के बाद नारद मुनि ने भगवान नारायण से निवेदन किया कि वे गृहस्थों के लिए पुरुषोत्तम मास में पालन किए जाने वाले दैनिक कर्तव्यों का विस्तार से वर्णन करें। नारद जी ने कहा कि महात्मा लोग सदैव लोककल्याण के लिए ज्ञान प्रदान करते हैं, इसलिए गृहस्थों के हित के लिए यह ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।
मध्याह्न के समय किए जाने वाले धार्मिक कर्तव्य
भगवान नारायण ने बताया कि प्रातःकालीन कार्य पूर्ण करने के बाद मध्याह्न में संध्या, तर्पण और पंचमहायज्ञ का पालन करना चाहिए। देवताओं, पितरों, मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों तथा अन्य प्राणियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए अन्न और जल का अर्पण करना चाहिए। इसके बाद भूतबलि देकर समस्त जीवों के कल्याण की कामना करनी चाहिए। यह भावना मनुष्य को केवल स्वयं तक सीमित न रखकर सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति उत्तरदायी बनाती है।
अतिथि सेवा का महत्व
भगवान ने गृहस्थ जीवन में अतिथि सेवा को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। यदि किसी गृहस्थ के घर कोई अतिथि आए तो उसका स्वागत मधुर वाणी से करना चाहिए। उसे भगवान के समान सम्मान देकर भोजन और जल से संतुष्ट करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि अतिथि देवता के समान होता है और उसकी सेवा से महान पुण्य की प्राप्ति होती है।
संन्यासी और ब्रह्मचारी को भोजन कराने का पुण्य
गृहस्थ को स्वयं भोजन करने से पहले संन्यासियों और ब्रह्मचारियों को भिक्षा देनी चाहिए। भगवान नारायण ने बताया कि जो व्यक्ति संन्यासी का सम्मान करके उसे भोजन कराता है, उसे गोदान के समान पुण्य प्राप्त होता है। संन्यासी को दिया गया अन्न मेरु पर्वत के समान महान और दिया गया जल समुद्र के समान विशाल पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है।
भोजन करने की शास्त्रीय विधि
भोजन को भी धर्म का एक अंग माना गया है। भोजन करने से पहले भगवान का स्मरण करना चाहिए और कुछ अन्न देवताओं, पितरों तथा अन्य प्राणियों के लिए अर्पित करना चाहिए। भोजन शांत मन और एकाग्र चित्त से करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार पहले मधुर पदार्थ, फिर नमकीन और खट्टे पदार्थ तथा अंत में कड़वे और तीखे पदार्थ ग्रहण करने चाहिए। इस प्रकार भोजन करने से शरीर स्वस्थ रहता है और पाचन शक्ति मजबूत होती है।
JOIN OUR WHATSAPP CHANNEL : CLICK HEAR
भोजन के बाद आध्यात्मिक चिंतन का महत्व
भोजन के पश्चात आचमन करके मुख और हाथों को शुद्ध करना चाहिए तथा भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए। इसके बाद समय का उपयोग आध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन, सत्संग और धर्मश्रवण में करना चाहिए। भगवान ने कहा कि श्रवण से मनुष्य धर्म को समझता है, पापों का त्याग करता है, मोह से मुक्त होता है और ज्ञानरूपी अमृत प्राप्त करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय आध्यात्मिक ज्ञान के लिए अवश्य निकालना चाहिए।
सायंकालीन संध्या और गायत्री जप का महत्व
सूर्यास्त के समय स्नान या शुद्धि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और सायंसंध्या करनी चाहिए। गायत्री मंत्र का जप, सूर्यनारायण का स्मरण और भगवान का ध्यान इस समय विशेष फलदायी माना गया है। भगवान नारायण ने बताया कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल तीनों संध्याओं का पालन करता है, उसका तेज और आध्यात्मिक बल निरंतर बढ़ता रहता है।
रात्रि में शयन के नियम
रात्रि में शयन करने से पूर्व भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए और शुभ मंत्रों का जप करना चाहिए। अपने घर में पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोना श्रेष्ठ माना गया है। ससुराल में दक्षिण दिशा और परदेश में पश्चिम दिशा की ओर सिर रखकर सोना उचित बताया गया है। उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोना शास्त्रों में निषिद्ध माना गया है। सोने से पहले भगवान का स्मरण करने से मन शांत और पवित्र रहता है।
गृहस्थ धर्म के मुख्य सिद्धांत
भगवान नारायण ने गृहस्थ जीवन के मूल धर्मों का भी वर्णन किया। अहिंसा, सत्य बोलना, सभी प्राणियों पर दया करना, यथाशक्ति दान देना और धर्मपरायण जीवन जीना गृहस्थ के प्रमुख कर्तव्य हैं। परस्त्री से दूर रहना, अपनी धर्मपत्नी की रक्षा करना, बिना दी हुई वस्तु ग्रहण न करना तथा मांस और मधु का त्याग करना भी गृहस्थ धर्म का महत्वपूर्ण भाग बताया गया है। इन सिद्धांतों का पालन करने वाला व्यक्ति संसार में सुख और परलोक में उत्तम गति प्राप्त करता है।
अध्याय 29 की मुख्य शिक्षाएँ
यह अध्याय हमें सिखाता है कि भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए केवल बाहरी दिखावा आवश्यक नहीं है, बल्कि सच्चे भाव और पुण्य कर्म ही वास्तविक साधन हैं। पुरुषोत्तम मास का प्रभाव इतना महान है कि अनजाने में किए गए उपवास, दान और तप भी जीव को ऊँचे आध्यात्मिक पद तक पहुँचा सकते हैं। साथ ही यह अध्याय गृहस्थ जीवन को धर्म, सेवा, करुणा, संयम और भगवान की भक्ति से जोड़ने की प्रेरणा देता है।
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का 29वाँ अध्याय भगवान की असीम कृपा, पुरुषोत्तम मास की महिमा और आदर्श गृहस्थ जीवन का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। कदर्य ब्राह्मण की कथा यह प्रमाणित करती है कि भगवान कभी भी किसी जीव के छोटे से छोटे पुण्य कर्म को व्यर्थ नहीं जाने देते। जो श्रद्धापूर्वक पुरुषोत्तम मास में स्नान, दान, जप, तप, सत्संग और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करते हैं, वे न केवल इस जीवन में सुख और शांति प्राप्त करते हैं, बल्कि अंततः भगवान के परम धाम गोलोक की प्राप्ति के अधिकारी भी बनते हैं।
Read Also : Purushottam Maas Adhyay 26 : व्रत पूरा होने पर कौन-सा दान करें? जानें वैकुण्ठ प्राप्ति का रहस्य









