क्या भोग और ऐश्वर्य ईश्वर से दूर कर देते हैं?

Bhagavad gita Chapter 2 Verse 44 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् |व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते || 44 || अर्थात भगवान कहते हैं, जिनका विवेक अलंकृत वाणी से पराजित हो गया है, अर्थात् भोगों की ओर आकर्षित हो गया है, तथा जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन्हें परमात्मा का दृढ़ ज्ञान नहीं होता। Shrimad Bhagavad […]
क्या सुख की तलाश आत्मज्ञान से दूर कर देती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 42 43 यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: |वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: || 42 ||कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् |क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति || 43 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पृथानन्दन! जो कामनाओं में लिप्त हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानते हैं, वेदों में वर्णित सकाम कर्मों में ही प्रीति रखते हैं, भोगों के […]
क्या हमारे फोकस की कमी है बहुशाखा बुद्धि का परिणाम?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 41 व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || 41 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे कुरुनंदन यह सम बुद्धि की प्राप्ति के विषय में व्यावसायित्मिका बुद्धि एक ही होती हैं और अव्यावसायि मनुष्य की बुद्धि अनंत और बहु शाखाओ वाली ही होती है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 41 […]
क्या थोड़ी सी समता भी जन्म-मरण से मुक्ति दे सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 40 नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || 40 || अर्थात भगवान कहते हैं मनुष्य लोक में यह सम बुद्धि रूपी धर्म के आरंभ का नाश नहीं होता, इसका अनुष्ठान उल्टा फल नहीं देता, और इसका थोड़ा भी अनुष्ठान जन्म मरण रूपी बड़े भय से रक्षण कर […]
भगवद गीता में ‘समबुद्धि’ का रहस्य क्या है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 39 एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || 39 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे पार्थ! इस समता का उल्लेख पहले सांख्य योग में किया गया था, अब तुम इसे कर्म योग के संदर्भ में सुनो, कि जो समता से संपन्न है, वह कर्म […]
क्या सुख-दुख लाभ-हानि और जय-पराजय में समभाव ही सच्चा धर्म है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 38 सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || 38 || अर्थात भगवान कहते हैं, जय पराजय लाभ हानि और सुख-दुख को सामान समझ कर फिर युद्ध में जुड़ जाओ l इस तरह युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं बनोगे। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 […]
भगवद गीता हमें क्या सिखाती है कर्तव्य के बारे में?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 37 हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: || 37 || अर्थात भगवान अर्जुन को कहते हैं, अगर तुम युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे तो तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी और अगर तुम युद्ध को जीत लोगे तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे, इसलिए […]
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपमान से क्यों डराया?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 35 36 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: |येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || 35 ||अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता: |निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् || 36 || अर्थात भगवान कहते हैं, महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से उपराम हुआ मानेंगे, जिनकी धारणा में तू बहुमान्य हो चुका है, […]
क्या अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक है? गीता से जानें उत्तर

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 33 34 अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि || 33 ||अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् |सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते || 34 || अर्थात भगवान कहते हैं, अब जो तू यह धर्ममय युद्ध नहीं करता तो अपने धर्म और कीर्ति का त्याग करके पाप को प्राप्त […]
बर्बरीक जी कौन थे? खाटू श्याम जी के रहस्यमयी रूप की कथा

जब भी भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का उल्लेख होता है, तो कई दिव्य पात्रों की कहानियाँ सामने आती हैं। इन्हीं में एक महान योद्धा हैं – बर्बरीक, जिनका नाम आज खाटू श्याम जी के रूप में श्रद्धा और भक्ति से लिया जाता है। बर्बरीक की कथा केवल वीरता की नहीं, बल्कि त्याग, भक्ति और भगवान […]
क्यों भगवान ने युद्ध को स्वर्ग का द्वार कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२॥ अर्थात भगवान कहते है, अपनी इच्छा से जीती गई लड़ाई स्वर्ग का खुला द्वार है। हे पृथानन्दन! वे क्षत्रिय बहुत प्रसन्न होते हैं, जिन्हें ऐसा युद्ध प्राप्त होता है। Shrimad Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 Meaning in […]
स्वधर्म निभाना क्यों है जीवन का सबसे बडा कर्तव्य?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 31 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || 31 || अर्थात भगवान कहते हैं, खुद के धर्म को देखकर भी आपको विकंपित अर्थात कर्तव्य कर्म से विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि धर्म में युद्ध से बड़ा क्षत्रिय के लिए दूसरा कुछ कल्याण कारक कर्म नहीं। Shrimad Bhagavad Gita […]