Purushottam Maas Adhyay 7: मलमास बना भगवान का सबसे प्रिय मास

Purushottam Maas Adhyay 7

Purushottam Maas Adhyay 7

जब भगवान श्रीकृष्ण ने मलमास को दिया अपना नाम “पुरुषोत्तम”

अधिमास, जिसे पहले लोग तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे, आज वही मास सनातन धर्म में सबसे पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक उपेक्षित मलमास स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय “पुरुषोत्तम मास” बन गया?
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के सातवें अध्याय में इसी दिव्य रहस्य का वर्णन मिलता है। यह अध्याय केवल एक कथा नहीं, बल्कि भक्ति, दया और भगवान की अनंत कृपा का अद्भुत संदेश देता है।

सातवें अध्याय की शुरुआत: नारदजी का प्रश्न

पुराणों में वर्णित है कि सूतजी ऋषियों से कहते हैं कि आपने जो प्रश्न किया है, वही प्रश्न कभी देवर्षि नारद ने भगवान नारायण से किया था। नारदजी ने पूछा—

जब भगवान विष्णु अधिमास के दुखों को लेकर भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुँचे और मलमास ने अपना अपार दुःख सुनाकर मौन धारण कर लिया, तब भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने क्या कहा?

तब भगवान नारायण इस गुप्त और दिव्य रहस्य का वर्णन करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने मलमास को अपनाया

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवान विष्णु से कहा कि आपने मलमास को यहाँ लाकर बहुत उत्तम कार्य किया है। जिसको आपने स्वीकार किया है, उसे अब मैं भी स्वीकार करता हूँ।

यहीं से अधिमास का भाग्य बदल जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि आज से यह मलमास मेरे समान सम्मान प्राप्त करेगा। जिस प्रकार संसार मुझे “पुरुषोत्तम” नाम से जानता है, उसी प्रकार अब यह मास भी “पुरुषोत्तम मास” कहलाएगा।

यह केवल नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि भगवान ने अपने सभी दिव्य गुण इस मास को प्रदान कर दिए—

  • कीर्ति
  • ऐश्वर्य
  • पराक्रम
  • भक्तों को वरदान देने की शक्ति
  • मोक्ष प्रदान करने की सामर्थ्य

इसी कारण पुरुषोत्तम मास सभी महीनों में श्रेष्ठ माना गया।

क्यों सबसे महान है पुरुषोत्तम मास?

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि यह मास समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाला है।
जो मनुष्य इस मास में श्रद्धा और भक्ति से व्रत, जप, दान, स्नान और पूजा करता है, उसके जन्मों-जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

यहाँ तक कहा गया है कि बड़े-बड़े योगी, तपस्वी और ब्रह्मचारी कठोर तप करके भी जिस परम पद को कठिनाई से प्राप्त करते हैं, वही परम धाम पुरुषोत्तम मास का व्रत करने वाला भक्त सरलता से प्राप्त कर सकता है।

पुरुषोत्तम मास में किया गया पुण्य करोड़ों गुना बढ़ता है

भगवान श्रीकृष्ण इस अध्याय में एक अद्भुत उपमा देते हैं।
वे कहते हैं कि जैसे खेत में बोया गया बीज कई गुना बढ़कर फल देता है, वैसे ही पुरुषोत्तम मास में किया गया पुण्य करोड़ों गुना बढ़ जाता है।

अर्थात—

  • थोड़ा सा दान भी महान फल देता है
  • छोटा सा जप भी अत्यंत प्रभावशाली बन जाता है
  • साधारण पूजा भी भगवान को अत्यंत प्रिय हो जाती है

इसीलिए इस मास को “अक्षय पुण्य देने वाला महीना” कहा गया है।

पुरुषोत्तम मास का व्रत क्यों करना चाहिए?

इस अध्याय में भगवान स्पष्ट कहते हैं कि यह व्रत सभी साधनों में श्रेष्ठ है।
जो भक्त विधिपूर्वक इस मास का पालन करता है, वह केवल स्वयं ही नहीं बल्कि अपने पूरे कुल का उद्धार कर देता है।

पुरुषोत्तम मास का व्रत करने वाले भक्त—

  • धन और सुख प्राप्त करते हैं
  • संतान सुख पाते हैं
  • दरिद्रता से मुक्त होते हैं
  • अंत में गोलोक धाम को प्राप्त करते हैं

भगवान यह भी कहते हैं कि पुरुषोत्तम मास के भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं और उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण करने में मैं कभी विलंब नहीं करता।

जो लोग पुरुषोत्तम मास का निरादर करते हैं

सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण चेतावनी भी देते हैं कि जो लोग इस पवित्र मास में स्नान, जप, दान और धर्मकर्म नहीं करते, वे जीवन में सुख से वंचित रहते हैं।

जो मनुष्य पुरुषोत्तम मास का उपहास करते हैं या इसे महत्व नहीं देते, वे दुःख, दरिद्रता और मानसिक कष्टों का सामना करते हैं।

पुराणों में यहाँ तक कहा गया है कि ऐसे लोग नरक के दुःखों को भोगते हैं और संसार में भी शांति प्राप्त नहीं कर पाते।

स्त्रियों के लिए पुरुषोत्तम मास का महत्व

इस अध्याय में विशेष रूप से महिलाओं के लिए भी पुरुषोत्तम मास का महत्व बताया गया है।

जो स्त्रियाँ इस मास में—

  • स्नान
  • दान
  • पूजा
  • व्रत
  • भगवान का स्मरण

करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य, संतान सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।

इसलिए भारतीय परंपरा में महिलाएँ पुरुषोत्तम मास में विशेष पूजा और व्रत करती हैं।

भगवान का सबसे प्रिय मास

भगवान श्रीकृष्ण अंत में घोषणा करते हैं कि—

“यह अधिमास और इसका स्वामी मैं स्वयं हूँ।”

यानी पुरुषोत्तम मास सीधे भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ महीना है।
इसी कारण इस मास में की गई छोटी सी भक्ति भी अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

भगवान यह भी कहते हैं कि वे अपने भक्तों के अपराध कभी-कभी देख लेते हैं, लेकिन पुरुषोत्तम मास के भक्तों के दोषों की गणना नहीं करते।

यह भगवान की अनंत करुणा का सबसे सुंदर उदाहरण है।

विष्णु भगवान मलमास को लेकर लौटे बैकुण्ठ

जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के मुख से ये अमृतमय वचन सुने, तब वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और गरुड़ पर बैठकर पुरुषोत्तम मास को अपने साथ लेकर बैकुण्ठ लौट गए।

यहीं सातवें अध्याय का समापन होता है।

पुरुषोत्तम मास से मिलने वाली प्रमुख शिक्षाएँ

1. भगवान कभी किसी को तिरस्कृत नहीं रहने देते

जिस मलमास को संसार ने अस्वीकार किया, भगवान ने उसे सबसे श्रेष्ठ बना दिया।

2. भक्ति सबसे बड़ा साधन है

कठोर तपस्या से भी जो फल कठिन है, वह सच्ची भक्ति से सहज प्राप्त हो सकता है।

3. दान और जप का विशेष महत्व

पुरुषोत्तम मास में किया गया छोटा सा पुण्य भी अक्षय फल देता है।

4. भगवान का नाम ही मुक्ति का मार्ग है

पुरुषोत्तम मास स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना गया है।

पुरुषोत्तम मास में क्या करें?

इस पवित्र महीने में श्रद्धापूर्वक ये कार्य अवश्य करने चाहिए—

  • प्रातः स्नान
  • भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा
  • गीता पाठ
  • मंत्र जप
  • तुलसी पूजा
  • दीपदान
  • गरीबों को दान
  • व्रत और सत्संग

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा का सातवां अध्याय हमें यह सिखाता है कि भगवान की कृपा से तिरस्कृत व्यक्ति भी महान बन सकता है। जिस मलमास को कोई स्वीकार नहीं करता था, भगवान श्रीकृष्ण ने उसे अपना नाम देकर संसार का सबसे श्रेष्ठ मास बना दिया।

इसलिए पुरुषोत्तम मास केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि भगवान की करुणा, भक्ति और मोक्ष का दिव्य अवसर है। जो भक्त श्रद्धा से इस मास का पालन करता है, उसे सांसारिक सुखों के साथ-साथ भगवान का परम धाम भी प्राप्त होता है।

Read Also : Purushottam Maas Chapter 4:मलमास पर भगवान विष्णु की कृपा

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